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'रोहीना नागपाल', सिर्फ 15 साल की उम्र में नौकरी, आज दो उद्यमों का संचालन

बच्चों के अपने कमरे के लिये फर्नीचर इत्यादि उपलब्ध करवाने और इंटीरियर डिजाइनिंग से संबंधित Atelier and L’Orange की हैं संस्थापक15 साल की उम्र में गर्मियों की छुट्टियों में क्रेडिट कार्ड बेचकर पहली बार पैसे कमाने में रही थीं सफलवर्ष 2008 में पुणे के बाहरी इलाके में 1000 वर्गफुट में फैले Atelier Homes की शुरुआत कीमाँ बनने पर अपने बच्चे के लिये अलग कमरा तैयार करने में आई दिक्कतों के चलते की L’Orange की स्थापना

18th Aug 2015
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Atelier and L’Orange की संस्थापक रोहीना नागपाल का कहना है कि, ‘‘हमें अपने सामने आने वाली हर चुनौती तबतक सबसे बड़ी लगती है जबतक हमारा सामना अगली चुनौती से नहीं होता है। मेरा मानना है कि हर चुनौती अपने साथ एक समाधान लेकर आती है और कुछ भी हमारी हिम्मत से बड़ा नहीं है।’’

और शायद उनका यही विश्वास और धारणा उन्हें आगे ले जाते हुए सफलता के नये पायदानों तक ले जाने वाला मुख्य कारक है।

रोहीना नागपाल

रोहीना नागपाल


चूंकि उनके पिता सेना में कार्यरत थे इसलिये वे देश के विभिन्न हिस्सों में सफर करते हुए बड़ी हुईं लेकिन वे बहुत छोटी उम्र में ही अपने अनुभवों के आधार पर जीवन की कई सत्यताओं से रूबरू हो चुकी थीं।

रोहीना अपने पांवों पर बहुत कम उम्र में ही खड़ी हो गई थीं और मात्र 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी गर्मियों की छुट्टियों में क्रेडिट कार्ड बेचने का काम करते हुए अपने जीवन की पहली नौकरी शुरू कर दी थी। 18 लोगों की एक टीम, जिसमें अधिकतर 12 से 24 वर्ष की उम्र थे वे पुरुष थे जो अपनी एमबीए की पढ़ाई का समर प्रोजेक्ट पूरा करने के लिये इस काम को कर रहे थे, की वे सबसे कम उम्र की सदस्य थीं।

वे कहती हैं, ‘‘सिर्फ एक दिन के प्रशिक्षण के बाद मैं अपने काम के उस पहले दिन को ताउम्र नहीं भुला सकती हूँ।’’

पहले ही दिन उनके बाॅस ने उन्हें कहते हुए फील्ड में भेज दिया कि अगर कोई दिक्कत या परेशानी हो तो वे उन्हें फोन कर सकती हैं और रोहीना निकल पड़ीं।

रोहीना कहती हैं, ‘‘मैं एक ऐसी वास्तविक दुनिया में कूद पड़ी जहां मुझे बिल्कुल अनजान लोगों से मिलना था। मैं पास के ही एक दफ्तर में जा घुसी और मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है कि बिना मेरे वहां आने का मकसद जाने वहां के मैनेजर ने बहुत बुरी तरह से चिल्लाते हुए मुझे दफ्तर से बाहर निकलने का फरमान सुना दिया और यह नामंजूरी या अस्वीकृति के साथ मेरा पहला सामना था।’’

उस जमाने में आज की तरफ मोबाइल फोन का प्रचलन नहीं था और सिर्फ लैंडलाइन फोन ही संचार के माध्यम थे। ऐसे में बुरी तरह से टूटी हुई रोहीना किसी तरह से अपने बाॅस तक पहुंची और उन्हें अपनी आपबीती सुनाई। हालांकि उनके बाॅस ने उनकी पूरी बात को बहुत धैर्य के साथ सुना और पूरी बात सुनने के बाद समझाया कि इस तरह की परेशानियों और चुनौतियों से उन्हें खुद ही पार पाना होगा।

’’यह मेरे जीवन में पहला और आखिरी मौका था जब मैं अपने परेशानी लेकर किसी के सामने शिकायत करने के इरादे गई थी।’’

इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखने का फैसला किया और मात्र 2500 रुपये महीने की तनख्वाह और इन्सेंटिव वाली नौकरी की शुरुआत की। हालांकि वे उस 60 दिनों के गर्मियों के काम में 15500 रुपये कमाने में सफल रहीं और इस तरह से पूरी टीम में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली सदस्य रहीं।

और जो चीज़ इस दौर में उनके लिये सबसे अधिक मददगार सरबित हुई वह थी आलू के परांठों की रिश्वत। रोहीना बताती हैं, ‘‘मेरे अधिकतर उपभोक्ता घर की यादों से गुजर रहे युवा होते थे जो मात्र आलू के परांठों की रिश्वत मेें ही मान जाते थे। ऐसे में मैं सुबह-सवेरे ही परांठे पका लेती और उसके बाद सुबह के 9 बजे से पहले ही उनके आवेदनपत्र इकट्ठा कर लेती थी। इन 60 दिनों के दौरान मैं अस्वीकृति, प्रतिस्पर्धा और उपलब्धियों से कैसे निबटना है यह सीखने में सफल रही।’’

इसके अलग वर्ष इन्होंने अपनी सूची में मोबाइल फोन को शामिल कर लिया। ‘‘उस समय मोबाइल फोन बाजार में नए-नए आए थे और लोग पेजर के प्रयोग के प्रति जागरुक हुए थे। इसके अलावा उस दौरान काॅल करना भी बहुत महंगा था जो 16 रुपये प्रति मिनट की दर से लगती थी और ऐसे में इन्हें बेचना इतना आसान नहीं था।’’

उस दौर में जब वे उत्पादों को बेचने का आनंद ले रही थीं उसके एक वर्ष के बाद ही उन्होंने खुद को जीवन एक ऐसे दोराहे पर खड़ा पाया जहां उन्हें अपने भविष्य की योजनाओं का खाका खींचना के साथ-साथ यह भी तय करना था कि वे कैसे अपने भीतर कर रचनात्मक भूख को शांत करें।

मात्र 20 वर्ष की उम्र आते-आते उन्होंने Knots and Krosses की स्थाना की जिसके माध्यम से वे पुणे के बड़े होम स्टोर को तकिये और गढ़े हुए लोहे के मामबत्ती स्टैंड के अलावा सजावट के अन्य सामान बेच रही थीं। उनका पहला ‘इंटीरियर डिजाइन’ का उपभोक्ता उनका एक ऐसा यहयात्री था जो उन्हें मुंबई से पुणे आते हुए ट्रेन में तब मिला था जब वे अपनी एक साल की जमा की हुई बचत से अपने कमरे को बदलाव देने के लिये पेंट खरीदकर लौट रही थीं। यह बात वर्ष 2000 की है।

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उन्होंने पुणे से अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद सिम्बायोसिस से वाणिज्य की उच्च शिक्षा ली। इसके अलावा उन्होंने अहमदाबाद के नेश्नल इंस्टीट्यूट आॅफ डिजाइन से इंटररियर डिजाइन के अलावा लाईटिंग डिजाइन इत्यादि का भी लघु कोर्स कर रखा है।

वर्ष 2005 में इन्होंने Interno Moda के नाम से एक डिजाइनिंग कंपनी की नींव रखी जो मुख्यतः इंटीरियर डिजाइनिंग मेें विशेषज्ञता रखने वाली एं कंपनी थी लेकिन जल्द ही उन्होंने अपना रास्ता बदलते हुए एक डिजाइन उद्यमी बनने की राह को चुना।

वर्ष 2008 में रोहीना ने पुणे के बाहरी इलाके की गली के एक कोने में 1000 वर्गफुट में फैले Atelier Homes की नींव रखी जिसके बारे मेें गर्व से बताते हुए वे वहती हैं, ‘‘अब यह पुणे के प्रमुख आवासीय क्षेत्रों में से एक में स्थितझार की सजावट का सामान उपलब्ध करवाने वाले बुटीक के रूप में अपना नाम बना चुका है।’’

जब यह इंटीरियर डिजाइनर पहली बार माँ बनी और अपने होने वाले बच्चे के लिये कमरे की सजावट शुरू की तब इन्हें इस बात का अहसास हुआ कि बाजार में ऐसे उत्पादों की बहुत कमी है जिनका इस्तेमाल बच्चे के कमरे की सजावट में किया जा सकता है। इस दौरान वे इस नतीजे पर पहुंची कि भारत में फर्नीचर का बाजार बिल्कुल संगठित है और इनमें से किसी ने भी बच्चों के कमरों की सजावट से संबंधित फर्नीचर के बारे में अबतक नहीं सोचा है और ऐसे में बच्चों के कमरों की साज-सज्जा का काम एक बेहतरीन भविष्य है। और परिणतिस्वरूप L’Orange (एल‘ आॅरेंज) की स्थापना हुई।

यहां पर आप बच्चों की दुनिया से संबंधित प्रत्येक सामान पा सकते हैं फिर चाहे वह फर्नीचर, पर्दें, कुशन, बेड लिनन, टाईबैक, सजावट का सामान और बिछौनी इत्यादि ही क्यों न हों। यह एक ऐसा गंतव्य है जहां आकर कोई भी अपने बच्चे के लिये एक कमरा और उसमें प्रयुक्त होने वाला फर्नीचर इत्यादि डिजाइनन कर सकता है।

रोहीना का अबतक का सफर काफी चुनौतियों और उतार-चढ़ाव स भरा रहा है। वे कहती हैं, ‘‘एक रीटेलर के रूप में आप हमेशा सीखते रहते हैं। एक ब्रांड को तैयार करने में अपनी ही चुनौतियां आती हैं और आपकोे अपने कार्यों से होने वाले दीर्घकालिक परिणामों के बारे में पहले से ही सोचना होता है। एक उद्यमी के रूप में मुझे अपने लिये रास्तों और मंजिलों का खुद ही निर्माण करना पड़ा।’’

साथ ही वे कहती हैं, ‘‘चूंकि एल‘ आॅरेंज इस क्षेत्र के प्रारंभिक ब्रांडों में से एक है इसलिये हमारे सामने कई तरह की चुनौतियां थीं। सबसे पहले तो हमें परंपरागत खुदरा विक्रेताओं को यह समझाने में काफी दिक्कतेें आईं कि हम क्या पेश कर रहे हैं क्योंकि हमनें वर्ष 2013 में प्रारंभ किया था और उस दौर में अधिकतर पारंपरिक विक्रेता नई अवधारणाओं से दूर ही रहना पसंद करते थे।’’

आत्मानुशासन, समय का उचित प्रबंधन करने के साथ प्रबंधन करना और कड़ी मेहनत वे प्रमुख कारक हैं जो इन्हें अपनी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन साधने में मदद करते हैं।

इसी वर्ष मार्च के महीने में बेनेट एंड कोलोमन ने मार्केटिंग के लिये विज्ञापनों के माध्यम से इनके उद्यम में निवेश किया है। मार्च के महीने में मुंबई और पुणे में नए स्टोर खोलने के बाद अब इनका लक्ष्य दिल्ली में अपने स्टोर खोलने के अलावा मुंबई में इनकी संख्या में इजाफा करना है।

भविष्य की योजनाओं के बारे में बताते हुए रोहीना कहती हैं, ‘‘हम ‘हर बच्चे के अपने कमरे’ की अवधारणा को अमली जामा पहनाते हुए हम अगले 4 से 5 वर्षों में देशभर में एल‘आॅरेंज के 100 स्टोर खोलना चाहते हैं और इसके अलावा हमारा इरादा अगले 36 महीनों में स्वयं को एशिया के अन्य देशों में विस्तारित करने का है।’’

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