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ताकि एक्सिडेंट न हों: रेलवे का रिटायर्ड अधिकारी अपनी पेंशन से भरता है सड़कों के गढ्ढे

रिटायर्ड इंजीनियर की समाजसेवा...

17th Dec 2017
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 रिटायरमेंट के बाद एक ओर जहां आमतौर पर लोग अपनी जिंदगी आराम से बिताने की ख्वाहिश रखते हैं तो वहीं दूसरी ओर तिलक ने सड़कों के गढ्ढे भरने का काम करके अपनी जिंदगी को समाजसेवा की खातिर समर्पित करने का फैसला कर लिया... 

सड़क पर काम करते गंगाधर तिलक

सड़क पर काम करते गंगाधर तिलक


 उन्होंने इसके बारे में पुलिस से बात भी की और कहा कि सड़क पर मौजूद गढ्ढे ही दुर्घटना का प्रमुख कारण हैं। उनकी शिकायत पर एक गढ्ढा तो पाट दिया गया, लेकिन तिलक के मन में ये बात कौंधती ही रही। 

इसी से 'श्रमदान' पहल की शुरुआत हुई। इसके तहत कॉलेज के बच्चे और युवा उनकी मदद करने के लिए आगे आए। लोगों ने अपने इलाकों के गढ्ढों को पटवाने के लिए तिलक को फोन करना शुरू कर दिया। 

सफेद बाल, मोटे फ्रेम वाला चश्मा, वृद्धावस्था की अवस्था की ओर अग्रसर आंध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जिले के रहने वाले गंगाधर तिलक कत्नम पिछले काफी दिनों से अपने मिशन पर लगे हैं। किसान परिवार में जन्में तिलक दक्षिण रेलवे में इंजिनियर के पद पर तैनात थे। 2008 में उनका रिटायरमेंट हो गया। रिटायरमेंट के बाद एक ओर जहां आमतौर पर लोग अपनी जिंदगी आराम से बिताने की ख्वाहिश रखते हैं तो वहीं दूसरी ओर तिलक ने सड़कों के गढ्ढे भरने का काम करके अपनी जिंदगी को समाजसेवा की खातिर समर्पित करने का फैसला कर लिया। उन्होंने तब से लेकर अब तक 1,124 गढ्ढे भरे हैं।

गंगाधर तिलक ने पूरे 35 सालों तक रेलवे में नौकरी की। उसके बाद लगभग एक सालों तक वे सोचते रहे कि क्या किया जाए। उसी दौरान वे अमेरिका में रहने वाले अपने बेटे से मिलने गए। वहां कुछ दिन बिताने के बाद वे वापस हैदराबाद लौट आए और एक सॉफ्टवेयर एजेंसी में सलाहकार के रूप में काम करने लगे। उन्होंने बताया, 'सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करने के दौरान मुझे श्रमदान नाम की पहल के बारे में पता चला जिसके माध्यम से लोग शारीरिक रूप से समाजाकि कार्यों में अपना योगदान देते थे।' इसी दौरान वे अपनी कार से कहीं जा रहे थे। तभी सड़क पर एक गढ्ढा आया और उनकी कार उसमें से होकर बाहर निकली। इसी दौरान वहां से गुजर रहे कुछ स्कूली बच्चों की ड्रेस पर कीचड़ गया और वे गंदे हो गए।

श्रमदान के तहत की जा रही मदद

श्रमदान के तहत की जा रही मदद


इस घटना के बाद उन्हें इन्हीं गढ्ढों की वजह से कुछ दुर्घटनाओं के बारे में मालूम चला। उन्होंने इसके बारे में पुलिस से बात भी की और कहा कि सड़क पर मौजूद गढ्ढे ही दुर्घटना का प्रमुख कारण हैं। उनकी शिकायत पर एक गढ्ढा तो पाट दिया गया, लेकिन तिलक के मन में ये बात कौंधती ही रही। वह बताते हैं, 'पुराने शहर में लैंगर हाउस के पास वाले इलाके में मैंने तीन -चार दिन पहले ही एक ऐक्सिडेंट देखा था। एक सरकारी बस ने ऑचो में टक्कर मार दी थी जिससे ऑटो ड्राइवर की मौके पर ही मौत हो गई। यह देखकर मेरे होश उड़ गए। मुझे लगा कि अगर सड़कों पर ये गढ्ढे नहीं होते तो कितनी जानें बचाई जा सकती थी।'

इसके बाद तिलक ने सड़कों के गढ्ढे भरने का काम शुरू कर दिया। वे अपनी कार में हमेशा टाट के बोरे रखते थे और जहां कहीं भी गढ्ढा देखते उसे भरने की कोशिश करते। इस दौरान वे नौकरी भी कर रहे थे और जब भी वक्त मिलता गढ्ढों को पाटने के लिए निकल जाते। इसके बाद उन्होंने 2011 में एक साल के लिए नौकरी छोड़ दी और पेंशन के पैसों से सड़कों को सही करने का जिम्मा संभाल लिया। इससे उनकी पत्नी को थोड़ा अजीब लगा क्योंकि वो नहीं चाहती थीं कि उनके पति कड़कती धूप में ऐसा काम करें। उन्होंने तो अमेरिका में रह रहे बेटे को भी फोन कर दिया कि वह यहां आकर देखे कि उनके पापा क्या कर रहे हैं।

सड़कों के गढ्ढे पाटते पुलिसकर्मी

सड़कों के गढ्ढे पाटते पुलिसकर्मी


लेकिन बेटा तो पिता के मिजाज का निकला। उसने तिलक को इस काम के लिए मना करने के बजाय उनके लिए एक फेसबुक पेज और एक वेबसाइट बना दी। ताकि उनकी इस मुहिम पर सरकार ध्यान दे और बाकी लोग भी उनकी मदद कर सकें। इसी से 'श्रमदान' पहल की शुरुआत हुई। इसके तहत कॉलेज के बच्चे और युवा उनकी मदद करने के लिए आगे आए। लोगों ने अपने इलाकों के गढ्ढों को पटवाने के लिए तिलक को फोन करना शुरू कर दिया। तिलक के बेटे ने इलाके के कमिश्नर से भी बात की और अपने पिता की मुहिम के बारे में बताया, लेकिन कमिश्नर ने तिलक को बुलाकर उन्हें आश्वासन दिया कि वो यह काम न करें। कमिश्नर ने कहा कि सरकार की ओर से यह काम किया जाएगा।

तिलक को सरकारी मदद का भरोसा नहीं था इसलिए उन्होंने यह बात नहीं मानी और अपने काम में लगे रहे। इसके बाद जून 2012 में कमिश्नर की ओर से उन्हें गढ्ढे भरने की सामग्री दी जाने लगी। तिलक बताते हैं कि इससे सरकार और आम लोगों में गजब का परिवर्तन हुआ। लोग भी जागरूक हुए और सरकार पर दबाव बनाने लगे। तिलक बताते हैं कि मीडिया ने ही उनकी बात को लोगों तक पहुंचाने में मदद की है, बाकी नेताओं ने इस बारे में कुछ नहीं सोचा। खास बात यह है कि इस काम के लिए तिलक किसी प्रकार का आर्थिक दान नहीं लेते हैं। वे सिर्फ श्रमदान की बात कहते हैं, शायद यही वजह है कि आज हैदराबाद में तिलक को सड़कों के डॉक्टर के नाम से जाना जाता है।

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