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महिलाएं गाय का मास्क पहनकर क्यों निकल रही हैं घरों से बाहर

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4th Sep 2017
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एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में 34,000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे, लेकिन इनमें से केवल 21% मामलों में आरोपियों को सजा मिली है।

फोटो साभार: सोशल मीडिया

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 23 साल के स्वतंत्र फोटोग्राफर सुजात्रो घोष ने एक फोटो-प्रोजेक्ट करवाया है। जिसके तहत महिलाओं को महिलाओं की सुरक्षा पर ध्यान आकर्षित करने के लिए 'गाय मास्क' पहनने को कहा जा रहा है। घोष ने पहले अपने दोस्तों और जान-पहचान वालों को फोटो खींचने के लिए प्रोत्साहित किया।

भारत में हर 15 मिनट में एक बलात्कार की रिपोर्ट सामने आती है। एक प्रश्न ये उठता है यदि सरकार गायों के मामले को जरूरी समझती है तो आधी आबादी की सुरक्षा के लिए इस तरह की कोई आवश्यकता सरकार को क्यों नहीं दिखती।

गाय की सुरक्षा हालिया समय में देश के सबसे बड़े मुद्दों में से एक है। वहीं महिलाओं के खिलाफ निरंतर बढ़ते अपराधों के प्रति सरकार और समाज की उदासीनता से लोगों में काफी गुस्सा है। गो सुरक्षा पर कुछ संगठन इतना ध्यान दे रहे हैं, इसके लिए हत्याएं हो रहीं, हिंसा हो रहीं। लेकिन बात जब औरतों की सुरक्षा पर हो तो एक चुप्पी नजर आती है। 

लोगों के दिमाग में एक धारणा बनती जा रही है कि हम कभी महिलाओं के साथ हो रहे अपराध, बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाओं की परवाह नहीं करते है लेकिन देश में जब गायों के साथ कोई भी घटना होती है तो हम तुरंत उसके खिलाफ कदम उठाते है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि गाय को हम माता मानते है। उसकी रक्षा करना हमारा फर्ज है। भारत में महिलाओं की तुलना में गायें ज्यादा सुरक्षित है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में 34,000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे, लेकिन इनमें से केवल 21% मामलों में आरोपियों को सजा मिली है।

फोटो साभार: सोशल मीडिया

फोटो साभार: सोशल मीडिया


एक फोटोग्राफर की अनोखी मुहिम

इसी गुस्से को उकेरने के लिए 23 साल के स्वतंत्र फोटोग्राफर सुजात्रो घोष ने एक फोटो-प्रोजेक्ट करवाया है। जिसके तहत महिलाओं को महिलाओं की सुरक्षा पर ध्यान आकर्षित करने के लिए 'गाय मास्क' पहनने को कहा जा रहा है। घोष ने पहले अपने दोस्तों और जान-पहचान वालों को फोटो खींचने के लिए प्रोत्साहित किया। 

सुजात्रो महिलाओं की सुरक्षा के लिए खुद के खर्च पर एक अभियान शुरु कर रहे हैं। अब तक, उन्होंने दिल्ली और कोलकाता में इसे शुरु किया है। अगली यात्रा, मुंबई और बेंगलुरु में होगी। सुजात्रो बताते हैं कि गाय को लेकर पिछले एक साल में जितनी घटनाएं हुई हैं, उन सब के बारे में सोचकर मैंने यह प्रोजेक्ट शुरू करने का फैसला लिया। लोगों तक ये संदेश पहुंचाने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया का प्रयोग किया। उनका ये मैसेज सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

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प्रोजेक्ट के ऑनलाइन वायरल होने के बाद उनके पास भारत ही नहीं विदेशों से इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने के लिए कॉल और संदेश आने शुरू हो गए हैं। सुजात्रो के मुताबिक, अपने देश में उस महिला को न्याय मिलने में बहुत अधिक समय लगता है, जिसका बलात्कार होता है लेकिन किसी गाय पर हमला होता है या ऐसी अफवाह भी उड़ती है तो भीड़ ही न्याय करने लग जाती है। 

भारत में हर 15 मिनट में एक बलात्कार की रिपोर्ट सामने आती है। एक प्रश्न ये उठता है यदि सरकार गायों के मामले को जरूरी समझती है तो आधी आबादी की सुरक्षा के लिए इस तरह की कोई आवश्यकता सरकार को क्यों नहीं दिखती।

फोटो साभार: सोशल मीडिया

फोटो साभार: सोशल मीडिया


लोगों को काफी प्रभावित कर रहा है ये प्रोजेक्ट

सुजात्रो के इस प्रोजेक्ट को मिलीं प्रतिक्रियाएं काफी हद तक सकारात्मक हैं लेकिन कुछ लोगों ने इसका मजाक बनाया। घोष को नकारात्मक प्रतिक्रियाओं की परवाह नहीं है। सुजात्रो बताते हैं, 'मेरा इरादा कभी भी गाय का मजाक बनाने का नहीं है। मैं चाहती हूं कि जो लोग गायों को माताओं के रूप में मानते हैं, लड़कियों के लिए भी उनके मन में सुरक्षा और सम्मान की भावना हो।' सुजात्रो घोष ने सरकार से सवाल किया है कि महिलाओं से ज्यादा गाय की सुरक्षा पर ध्यान क्यों दिया जा रहा है। हमारे देश में क्या हो रहा है? देश के संविधान की तरह मेरी सोच भी धर्मनिरपेक्ष है। महिलाओं की असुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। 

महिलाएं बस में, ट्रेन में, पर्यटन स्थलों में कहीं भी सुरक्षित नहीं है ऐसे में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं। मैं जगह जगह जाकर लोगों के बीच महिलाओं की सुरक्षा को बताना चाहती हूं उन्हें दिखाना चाहती हूं कि जिस तरह गौहत्या के खिलाफ पूरा देश खड़ा है, अगर ऐसे ही महिला सुरक्षा के लिए खड़ा हो जाए तो कोई भी लड़की घर से बाहर निकलने में नहीं डरेगी।

घोष के इस प्रोजेक्ट में साथ देने वाली रित्वीजा चक्रवर्ती का कहना है कि 'मुझे यह मुखौटा पहनकर सुरक्षित होने का एहसास तो नहीं होता लेकिन भीड़ में इस मुखौटे को पहन कर जाना मेरे अंदर हिम्मत जरूर लाता है। लोग मुझे आश्चर्य भरी निगाहों से देखते हैं, जिससे ये महसूस होता है कि मैं सबसे अगल हूं।' वहीं एक और कैम्पेनर निकोल का कहना है, 'कम से कम अगर मैं एक गाय मास्क में सड़कों पर चलना चाहती हूं, तो मुझे परेशान होने की संभावना शायद ही होगी। कोई भी किसी को किसी देवी या देवता के प्रतिनिधि को परेशान नहीं करना चाहता है।'

ये भी पढ़ें- 'साहस' बना रहा झुग्गी के बच्चों को शिक्षित और उनके मां-बाप को आत्मनिर्भर

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