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इस डॉक्टर की विदाई पर रो रहा था पूरा गांव

एक ऐसा डॉक्टर जिसकी विदाई पर रोने लगा पूरा गाँव...

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21st Jun 2018
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किशोर चंद्र दास जब गांव में गए तो उन्होंने देखा कि ग्रमीण स्वास्थ्य देखभाल केंद्र बुरी दशा में है। हालांकि इस बीच ग्रामीणों को लगा कि किशोर भी दूसरे डॉक्टरों की तरह शायद ही उनके समुदाय के लिए कुछ करें। एक दशक से भी कम समय में, डॉ किशोर ने अपनी मेहनत के दम पर उसी स्वास्थ्य केंद्र को आधुनिक चिकित्सा सुविधा में बदल दिया।

फोटो साभार - हिंदुस्तान टाइम्स

फोटो साभार - हिंदुस्तान टाइम्स


डॉक्टर किशोर जब गांव से जा रहे थे तो न केवल ग्रामीण बल्कि खुद डॉक्टर किशोर की आंखें नम थीं। बेंगलुरू में राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज के पूर्व छात्र, किशोर जब पहली बार गांव पहुंचे थे तो चिकित्सा क्षेत्र में 80 प्रतिशत पद खाली थे।

कहतें हैं कि दूसरों की सहायता के लिए किया गया आपका काम ही आपको इस दुनिया में सबसे अलग बनाता है। जब आठ साल पहले उड़ीसा के नबरंगपुर जिले के तेंतुलिखुन्ति गांव में डॉ किशोर चंद्र दास को नियुक्त किया गया तो शायद हर गांववालों को पुराने डॉक्टर्स की तरह ही लगा होगा कि ये कुछ नहीं करेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। किशोर चंद्र दास जब गांव में गए तो उन्होंने देखा कि ग्रमीण स्वास्थ्य देखभाल केंद्र बुरी दशा में है। हालांकि इस बीच ग्रामीणों को लगा कि किशोर भी दूसरे डॉक्टरों की तरह शायद ही उनके समुदाय के लिए कुछ करें। एक दशक से भी कम समय में, डॉ किशोर ने अपनी मेहनत के दम पर उसी स्वास्थ्य केंद्र को आधुनिक चिकित्सा सुविधा में बदल दिया।

उनके इस काम के बाद लोगों ने उन्हें बहुत प्यार व सम्मान दिया। खुद डॉ किशोर बताते हैं कि, लोग दूर दराज के गांवों से 300 से 400 रुपए खर्च करके यहां आते हैं। दरअसल, डॉ. दास भुवनेश्वर में एक निजी मेडिकल कॉलेज-सह-अस्पताल में ऑर्थोपेडिक्स में स्नातकोत्तर डिग्री करने के लिए गए हैं। जिसके चलते उन्हें गांव से अलग होना पड़ा। हिंदुस्तान टाइम्स की एक खबर के मुताबिक, एक ग्रामीण तुलु ने बताया कि, “मानो पूरा शहर रो रहा हो। लोगों ने डॉ. दास को गले लगाया और अपनी स्टडी पूरी करने के बाद उन्हें वापस गांव लौटने के लिए भी कहा। इतने सारे लोग उन्हें देखने के लिए आए कि शहर की मुख्य सड़क पर लगभग एक घंटे तक जाम लग गया था।"

डॉक्टर किशोर जब गांव से जा रहे थे तो न केवल ग्रामीण बल्कि खुद डॉक्टर किशोर की आंखें नम थीं। बेंगलुरू में राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज के पूर्व छात्र, किशोर जब पहली बार गांव पहुंचे थे तो चिकित्सा क्षेत्र में 80 प्रतिशत पद खाली थे। डॉ किशोर ने अन्य सुविधाओं के साथ एक एसी डिलीवरी रूम, एक ऑपरेशन थिएटर और एक ऑक्सीजन कक्ष स्थापित करके ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र को बदल दिया। उन्होंने स्वास्थ्य केंद्र को पुनर्जीवित करने के लिए अपनी ड्यूटी से अधिक घंटों तक काम किया।

2014 में, जब पास के गांव में दस्त का प्रकोप बढ़ा, तो उन्होंने संक्रमित लोगों के इलाज के लिए एक समर्पित टीम को अपने साथ रखा। ज्यादातर ग्रामीण पेयजल के कारण बीमार पढ़े थे क्योंकि जो पानी वो पीते थे वो पास के सीवेज के साथ मिक्स था। डॉ किशोर ने खसरा प्रकोप से निपटने के लिए भी पूरे गांव के लोगों को टीका लगाया। समय के साथ-साथ, उन्होंने अपने काम से ग्रामीणों का दिल लिया। वो ग्रामीण अब खुश थे जो बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल से वंचित थे। अपने विदाई के दिन, उन्होंने अस्पताल परिसर में 500 पौधे लगाए और जाते-जाते सभी को नम आखों से छोड़ गए। 

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