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“कचरे वाली पूनम” जो सिखा रही हैं कचरे से पैसा बनाने के गुर

कचरे से कमाल करने वाली हुनरमंद “पूनम’...“डेली डम्प” देता है कचरे से निपटने की ट्रेनिंग ...रसोई के कचरे से बनाए घर की खाद ...

15th Oct 2016
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कभी आपने सोचा कि हम हर रोज कितना कूड़ा पैदा करते हैं और उसका क्या होता है ? ऐसे बहुत कम लोग होंगे जो इस बारे में सोचते हैं। ऐसी ही एक महिला हैं पूनम बीर कस्तूरी। जिनको लोग प्यार से “कचरे वाली” भी कहते हैं। ये पिछले कई सालों से कूड़े को नई शक्ल देने का काम कर रही हैं। घर या बाहर का कूड़ा कितने काम का होता है शायद ही इनसे बेहतर कोई नहीं जानता। तभी ये कूड़े से कई तरह की चीजों का निर्माण करने की कला जानती हैं। उन्ही की कोशिशों का नतीजा है कि हजारों लोग अब कूड़े का बेहतर इस्तेमाल कर रहे हैं।

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जानकारों का कहना है कि अगर हम यूं ही कूड़ा बढ़ाते रहे तो साल 2025 तक दुनिया भर में 6 मिलियन टन सोलिड वेस्ट होगा। ये पांच हजार किलोमीटर में खड़े ट्रक पर रखे कूड़े के समान होगा। किसी भी खराब चीज को फेंकना बड़ा आसान होता है लेकिन अगर कोई उस खराब चीज से कोई नई चीज का निर्माण करे जो ना सिर्फ बदबू से मुक्त हो बल्कि रोज की दिनचर्या में भी काम आये तो कितना अच्छा होगा। पूनम पिछले सात सालों से इसी कोशिश में लगी हुई हैं। वो मानती हैं कि घर के कूड़े में 80 प्रतिशत कूढ़े का इस्तेमाल दोबारा हो सकता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होने “डेली डम्प” की शुरूआत की। जिसकी मदद से घर के कूड़े को ना सिर्फ खाद में बदला जा सकता है। बल्कि टेराकोटा से जुड़े कई सामान बनाये जा सकते हैं जो देखने में सुंदर, साफ, सुविधाजनक और जिनको बनाने में मजा भी आता है।

“डेली डम्प” एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो देश में ही नहीं विदेशों में भी काम कर रहा है। इस वक्त देश में जहां इसके 12 सेंटर हैं वहीं 2 विदेश में हैं। यहां पर लोगों को मुफ्त में तकनीकी ज्ञान दिया जाता है। ताकि वो टेराकोटा से जुड़े उत्पाद बना सकें और इस काम को दूसरों को भी सिखा सकें। पूनम के मुताबिक “ये एक तरीका है जहां पर हम लोगों को कूड़े की समस्या के बारे में बता सकते हैं। इसके अलावा बेकरी, खानपान की जगह, धोबी, टेलर और दूसरे लोगों के बीच हम इसका प्रचार करना चाहते हैं।”

कोई भी आर्गेनिक सामान चाहे वो बर्बाद हो चुका खाना हो, उसे खाद में बदला जा सकता है। हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण के लिए ये कितना अच्छा है बावजूद हम में से ज्यादातर लोग इसे विकल्प के तौर पर नहीं देखते। इसकी मुख्य वजह है समय की कमी, स्थान और जागरूकता। लेकिन अगर इसका कोई आसान तरीका हो तो कम से कम शहरी कूड़े की समस्या से काफी हद तक निजात पाया जा सकता है। “डेली डम्प” ऐसी ही बातों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

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ये बहुत ही आसान प्रक्रिया है जिसे आप अपनी दिनचर्या में भी शामिल कर सकते हैं। भले ही आप छोटे से अपार्टमेंट में रहते हों या फिर आपका अपना घर हो। एक बार इसका निर्माण करने के बाद आर्गेनिक कूड़े को सही जगह रखने के लिए किसी को भी इस पर रोज सिर्फ 5 मिनट खर्च करने होते हैं। कूड़े के अलग अलग कंटनेर बनाने के बाद इसमें एक खास तरह का पाउडर मिलाना होता है जो डेली डम्प के ऑनलाइन या ऑफलाइन स्टोर में आसानी से मिल जाता है। इसके लिए आप घर में भी मदद ले सकते हैं और अगर ये भी संभव नहीं है तो “डेली डम्प” की भी मदद ली जा सकती है। फर्ज करिये कि आपके घर में पार्टी है और उसमें काफी सारा खाना बच जाता है जिसमें मांसाहारी भोजन होता है, पनीर और दूसरी चीजें होती हैं इसके लिए आपको सिर्फ उनको गहराई में दबाकर और ढेर सारा खास तरह का पाउडर मिलाकर कंटेनर को ढक देना होता है।

अगर आपके घर में बगीचा या पौधे ना हों जहां पर आप घर में बनी खाद को डाल सकें तो इसके लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। आप घर में बनी खाद को सड़कों के किनारे लगे पेड़ों के आसपास भी डाल सकते हैं। ऐसा कर आप एक तरह से पृथ्वी को खाना खिला रहे होते हैं। बावजूद इसके अगर कोई ज्यादा खाद बना रहा हो तो डेली डम्प उसे खरीदता भी है ताकि वो खाद दूसरे जरूरतमंद लोगों को दी जा सके।

पूनम का परिवार ही है जिसने उनको कोई भी काम करने के लिए अपने पैर मजबूती से रखना सिखाया, तो अहमदाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन की पढ़ाई ने उनको दुनिया को नए तरीके से देखना। पूनम उद्यमिता में दिलचस्पी लेने से पहले विनिर्माण, शिल्प, और शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर चुकी हैं। 1990 की शुरूआत में उन्होने “इंडस क्रॉफ्ट” की शुरूआत की थी। जो कारीगरों की मदद से विभिन्न तरह के भारतीय शिल्प के उत्पाद ना सिर्फ डिजाइन कर बनाने का काम करता था बल्कि उनको निर्यात भी करता था। इसके अलावा वो बेंगलौर के सृष्टि स्कूल ऑफ आर्ट, डिजाइन एंड टेक्नॉलिजी की संस्थापक रह चुकी हैं। विभिन्न तरह के अनुभवों से उन्होने सीखा कि आने वाली समस्याओं को कैसे दूर किया जा सकता है। उनके मुताबिक बस जरूरत है अपनी क्षमता को पहचानने की।

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