पुरुषों को टक्कर देने के लिए अब शिमला में टैक्सी चलाएंगी महिलाएं

By yourstory हिन्दी
June 13, 2017, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:16:30 GMT+0000
पुरुषों को टक्कर देने के लिए अब शिमला में टैक्सी चलाएंगी महिलाएं
ड्राइविंग सीट पर बैठी महिला सामाजिक बदलाव का प्रतीक है...
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शिमला के जिला प्रशासन और रूरल सेल्फ एम्प्लॉयमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट ने एक बेहतरीन पहल को अंजाम देते हुए महिलाओं को टैक्सी चालक के रूप में खड़ा करने का फैसला किया है। ये पहल काफी सकारात्मक मानी जा रही है, जिसके चलते महिलाओं को अपने आसपास बिखरी हुई रुढ़िवादी सोच से पीछा छुड़ाने में मदद मिलेगी।

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शिमला की महिलाओं ने ड्राइविंग को अपना करियर चुन शुरुआत कर दी है समाज में व्याप्त स्टीरियोटाइप सोच को तोड़ने की।

हमारे समाज में पुरुष और महिलाओं के लिए अनौपचारिक रूप से अलग-अलग पेशे तय कर दिए जाते हैं और मोटे तौर पर यह मान लिया जाता है, कि महिलाएं घर का काम करेंगी और पुरुष बाहर का। फिर भी जहां महिलाओं को छूट मिलती है वहां भी कुछ नियम शर्तें लागू कर दी जाती हैं और उन्हें सिर्फ टीचिंग या बुटीक जैसे प्रोफेशन में ही करियर बनाने की आजादी दी जाती है। ड्राइविंग जैसे प्रोफेशन में आने का तो वो कभी सोच भी नहीं सकतीं, लेकिन हिमाचल के शिमला में 21 ग्रामीण लड़कियों ने ड्राइविंग को अपना करियर चुनकर समाज में व्याप्त स्टीरियोटाइप तोड़ने की कोशिश की है।

महिलाओं को आत्मनिर्भर और सबल बनाने के लिए 21 महिलाओं को ड्राइविंग की ट्रेनिंग दी गई। इन लड़कियों में कॉलेज में पढ़ने वाली स्टूडेंट्स से लेकर हाउस वाइफ तक शामिल हैं। इस प्रोग्राम में शामिल सुमन लता कहती हैं, 'हमारा पितृसत्तात्मक समाज लड़कियों को कार चलाने की बात सुनते ही उनका मज़ाक उड़ाता है। लड़कियों और महिलाओं के लिए आत्मनिर्भर होना और महिलाओं के लिए बनाई गई बंदिशों को तोड़ना इतना आसान नहीं हैं। ड्राइविंग सीट पर बैठी महिला दरअसल सामाजिक बदलाव का प्रतीक है।' महिलाओं के लिए यह पहल जिला प्रशासन और रूरल सेल्फ एम्प्लॉयमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की तरफ से सफल हो पाई है। इसके लिए लगभग 200 महिलाओं ने काम करने की इच्छा जताई थी, लेकिन 21 महिलाओं का चुनाव करके उन्हें कार चलाने की ट्रेनिंग दी गई और साथ ही टैक्सी खरीदने के लिए फिनेंशियल मदद की भी व्यवस्था की गई।

महिलाओं के लिए यह पहल जिला प्रशासन और रूरल सेल्फ एम्प्लॉयमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट की तरफ से सफल हो पाई है। इसके लिए लगभग 200 महिलाओं ने काम करने की इच्छा जताई थी, लेकिन 21 महिलाओं का चुनाव करके उन्हें कार चलाने की ट्रेनिंग दी गई और साथ ही टैक्सी खरीदने के लिए फाइनैंस की भी व्यवस्था की गई।

नालदेहरा इलाके की रहने वाली निशा गर्ग ने कहा कि उनके घर में दो कमर्शल वाहन हैं। उन्होंने कहा, 'मैं काफी दिनों से कार चलाना सीखना चाहती थी, जिससे मैं अपने पति और उनके बिजनेस में मदद कर सकूं, लेकिन मुझे कभी मौका ही नहीं मिला।' ड्राइवर सीट पर बैठने को आतुर निशा ने कहा कि वह इस प्रोग्राम का हिस्सा बनकर बेहद खुश हैं।

महिलाओं को ट्रैफिक रूल्स और सिग्नल के बारे में बुनियादी जानकारी दी जा रही है। इन सभी 21 महिलाओं ने अपने-अपने क्षेत्र से तमाम बंदिशों को तोड़ते हुए यहां तक का सफर किया है। इन सभी की इच्छा है कि ये खुद का बिजनेस भी शुरू करें और उद्यमी बनें। इनमें से एक प्रीति चौहान भी हैं, जो हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी से एमएम (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) की पढ़ाई कर रही हैं। उन्होंने कहा, 'मैं पहली बार ड्राइवर की सीट पर बैठी। मैं ड्राइवर बनकर आत्मनिर्भर बनना चाहती हूं।' हालांकि उनका कहना है कि ड्राइवर बनने का फैसला लेने पर उनके घर का कोई सदस्य नाराज नहीं हुआ और उनके फैसले का सम्मान करते हुए परिवार ने उन्हें सपोर्ट किया। वह खुद को खुशनसीब मानती हैं कि उन्हें ऐसा परिवार मिला। उनके परिवार वाले कहते हैं, कि ऐसा कोई काम नहीं है जिसे महिलाएं नहीं कर सकती हैं। प्रीती कहती हैं, कि वह अपने गांव की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाएंगी और खुद का काम करने के लिए प्रेरित करेंगी।

ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के डारेक्टर सुरेंद्र सिंह चौहान ने बताया, 'ड्राइविंग सीखने के लिए लगभग 200 महिलाओं ने आवेदन किया था। इंटरव्यू माध्यम से 21 महिलाओं को चयनित किया गया। हम इस कार्यक्रम के माध्यम से महिलाओं को प्रोत्साहित करने और सशक्त बनाने के लिए काम कर रहे हैं।' शिमला के डिप्टी कमिश्नर आरसी ठाकुर ने कहा, 'एक साल पहले मुझे ये आइडिया सूझा था जब हमें टैक्सी ड्राइवर्स के व्यवहार से जुड़ी हुई कई शिकायतें सुनने को मिलीं। हमने सोचा कि अगर महिलाएं कार और टैक्सी चलाने लगेंगी तो इस समस्या का समाधान निकल सकता है। इससे उनकी कमाई भी होगी और शिमला को महिलाओं के लिए सुरक्षित शहर बनाया जा सकेगा।'