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शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक

जय प्रकाश जय
17th Jul 2017
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भाषा की बहस में उठे गुबार - 'हिन्दी की शब्दावली विश्व की भाषाओं में सर्वाधिक है, पर हिन्दी वाले नब्बे प्रतिशत उर्दू शब्दों के प्रयोग में अपना गौरव समझते हैं। एक अतिभ्रामक, भयावह शब्द 'हिन्दी ग़जल' चल गया है। क्या आपने 'उर्दू.सवैया', 'उर्दू कवित्त', 'उर्दू मंदाक्रान्ता' कहीं पढ़ा है। उर्दू वाले कहते हैं कि हिन्दी वाले हमारा छन्द चुरा लेते हैं।'

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'तेरे आने की जब ख़बर महके, तेरे ख़ुशबू से सारा घर महके, शाम महके तेरे तसव्वुर से शाम के बाद फिर सहर महके...' ये अल्फाज हैं मशहूर शायर नवाज देवबंदी के। आइए उनकी शायरियों के बहाने मौजू आबरू-ए-शायरी की बात करते हैं।

कोई ग़ज़ल को ‘आबरू-ए-शायरी’ कहता है, कोई मनहूस शैली की शायरी। ‘ग़ालिब’ लिखते हैं - 'बक़द्रे शौक़ नहीं ज़र्फे तंगना-ए-ग़ज़ल। कुछ और चाहिए वसुअत मेरे बयां के लिए।' फिलहाल, ग़ज़ल को ग़ालिब की इस लाइन के नाम करते हैं- 'शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक।' ग़जलों की बादशाहत जितनी पुरसकून रही है, उतने ही बहसों के, सवाल-जवाब के, नोक-झोंक भरे झमेले भी। कभी उम्दा तो कभी खराब ग़जल, कभी उर्दू तो कभी हिंदी ग़जल की बातें। वही बात कि, दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की, लोगों ने मेरे जेहन में रस्ते बना लिए। पिछले दिनो ग़ज़ल के बहाने कई सवाल उठे, गिरे और असहनीय होकर उलाहनों के मुकाम तक पहुंच गए। गंभीर प्रतिक्रिया हुई।

कृष्णकांत अक्षर कहते हैं- 'हिन्दी की शब्दावली विश्व की भाषाओं में सर्वाधिक है, पर हिन्दी वाले नब्बे प्रतिशत उर्दू शब्दों के प्रयोग में अपना गौरव समझते हैं। एक अतिभ्रामक, भयावह शब्द 'हिन्दी ग़जल' चल गया है। क्या आपने 'उर्दू.सवैया', 'उर्दू कवित्त', 'उर्दू मंदाक्रान्ता' कहीं पढ़ा है। उर्दू वाले कहते हैं कि हिन्दी वाले हमारा छन्द चुरा लेते हैं। क्या हिन्दी व्यर्थ की शब्दहीन, अर्थहीन भाषा है, केवल उर्दू में ही काव्य-रचना हो सकती है। सोम ठाकुर ने कहा था- 'हिन्दी वाले उर्दू के पिछलग्गू हो गये। हिन्दी का क्या होगा।' नीरज ने 'हिन्दी ग़ज़ल' शब्द पर ही आपत्ति की थी। आप नहीं जानते, जानते भी होंगे कि ग़ज़ल काव्य की विधा नहीं, उर्दू का एक छन्द है, जिसमें हुस्न-इश्क के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। हिंन्दी की रोटी खाने वाले विश्वासघाती लोग उर्दू ग़ज़ल लिखकर हिन्दी का गला घोट रहे हैं। इससे बडा़ पाप क्या होगा।

'अदम गोडवी, चन्द्रसेन विराट आदि ने शुद्ध हिन्दी में गीतिका (ग़ज़ल) लिखी हैं, पढ़िये, आप उर्दू का असंगत पक्षपात कर रहे हैं। हिन्दी, उर्दू से सौगुनी समर्थ भाषा है। इसमें बिना उर्दू शब्द प्रयोग किये उर्दू से अधिक प्रभावशाली ग़ज़लें लिखी जा रही हैं। वस्तुत: आज भारतीयता का विरोध चतुर्दिक् मुखर है। जो लोग हिन्दी को समाप्त करने का अभियान चला रहे हैं, उससे हिन्दी समाप्त नहीं होगी। जिनका जन्म, पालन पोषण, शिक्षा-दीक्षा उर्दू वातावरण में हुई है, जस सावन के अन्धहिं..., उनको केवल उर्दू ही एकमात्र महान भाषा लगती है। कोई भारतीयता और भारतीय संस्कृति से द्वेष रखनेवाला ही ऐसा सोच सकता है।

'बात अस्मिता की हो, स्वाभिमान की हो तो कम से कम मनस्वी व्यक्ति या लेखक, कवि अपमान कैसे सहन कर सकता है? मैं अंग्रेजी-उर्दू मुक्त हिन्दी का अभियान चला रहा हूँ। कारण है, उर्दू शायरों द्वारा हिन्दी वालों का पदे-पदे घोर अपमान। मुझे मंचों पर इनसे दो-चार होना पड़ता है। वे कहते हैं कि हिन्दी में लफ्ज नहीं, वे तो हमारे लफ्जों का इस्तेमाल करते हैं। हिन्दी बहुत गिरी हुई भाषा है। हिन्दी में माधुर्य या रस नहीं है। जबकि हिन्दी जितनी सरसता या माधुर्य विश्व की किसी भी भाषा में नहीं है, न इतना शब्द भण्डार विश्व की किसी भाषा में है, न इतना छन्द वैविध्य। यहाँ दो वर्ण का भी छन्द है। वस्तुत: हिन्दी वालों को उर्दू वाले भिगो-भिगो कर जूते मार रहे हैं परन्तु हिन्दी वाले इतने महा निर्लज्ज हैं कि उनके तलवे चाट रहे हैं।'

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भीमसेन सैनी का कहना है कि मैं 'विधा' के भेद में नहीं पड़ना चाहता। यह बात सत्य है कि 'गंगा-जमनी तहजीब' के नाम पर हिंदी पर बड़ा सफल आक्रमण हो रहा है। इसके पीछे हिंदी कविताओं में गेयता की कमी रही है और ग़ज़ल या नज़्म को यह सफलता, जिन्हें साधारण जन-मानस 'गाने' कहता है, फिल्मों ने दिलाई है। गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों, हिंदी के विस्तार के पीछे केवल हिंदी फिल्मों का योगदान है, जिसमें हमारे हिंदी संस्थानों का नाम-मात्र ही सहयोग है। अतः आज हिंदी को जो स्वरूप मिला हुआ है, वह फ़िल्मी हिंदी वाला है क्योंकि उसका स्रोत पाठ्यक्रम नहीं थे। मेरा विचार है, छायावादी कवियों के बाद खड़ीबोली की कविताओं का पतन होना शुरू हो गया था। पहला हमला तो स्वयं निराला जी ने मुक्त-छंद के रूप में ही कर दिया था। मैं, स्वयं अपने लेखन में फ़ारसी या अरबी के शब्दों के प्रयोग से बचता हूँ पर कुछ शब्दों का प्रयोग अवश्यम्भावी हो जाता है। उदाहरण के लिए मैं 'बाद' के स्थान पर 'पश्चात' का प्रयोग करता था। एक हिंदी के 'डॉक्टर' विद्वान ने ही मुझे उसके प्रयोग से मना कर दिया। आज शुद्ध हिंदी में लिखे उपन्यास प्रकाशक भी छापने को तैयार नहीं हैं। मैंने अपनी कुछ कहानियाँ एक प्रकाशक को दिखाईं, उसने यह कहकर मनाकर दिया कि इनमें तत्सम शब्दों की भरमार है। आप पूरी बहस को व्यवहारिक दृष्टि से भी देखें।

चपरासी वांट्स बख्शीस। ईडन-गार्डन ब्यूटीफुल गार्डन है। यह दो वाक्य हैं, जिनमें एक अंग्रेजी और दूसरा हिन्दी का है। 'क्रिया' जिस भाषा की हो, 'वाक्य' उसी का हो जाता है। और अगर हम हिंदी के तत्सम शब्दों से सजी भाषा को हिंदी मानें तो 'कबीरदास' को हिदीं से बाहर करना पड़ेगा। बहस व्यर्थ है और इसका कुछ परिणाम भी नहीं निकलेगा। आप सब विद्वानों से निवेदन है कि अगर ग़ज़ल लिखें तो उसे तत्सम शब्दों से बचाएँ और यदि कविता लिख रहे हों तो उसे फ़ारसी और अरबी शब्दों से बचाएँ।

मोहम्मद हसीन का कहना है कि साहित्यकार की सोच बहुत व्यापक होती है। साहित्य के सन्दर्भ में भाषा का उतना महत्व नहीं होता, जितना साहित्यकार की विचार धर्मिता का। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होती है, सोच नहीं। इसी प्रकार ग़ज़ल भी साहित्य की एक विधा है। बेशक ग़ज़ल का अर्थ आशिक़-माशूक़ की बातचीत ही है लेकिन ऐसी कोई चीज़ नहीं, जो कहीं एक स्थान पर ठहरी हो। ग़ज़ल ने भी समय के साथ प्रगति की है। 

दूसरी बात यह कि उर्दू भी हिंदी की तरह भारत में ही है। 

केशव शर्मा पूछते हैं, अक्सर क्या हिन्दी का शब्द है? ऐसे बहुत-से शब्द हैं जो आम हिन्दीभाषी की ज़ुबान और दिनचर्या में शामिल हैं। यह शामिल शब्द भी। हां, हिन्दी ग़ज़लकार को अपनी ग़ज़ल में दर्दे-दिल जैसे शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए, उसे दिल का दर्द ही कहना चाहिए क्योंकि दर्दे-दिल हिन्दी व्याकरण में नहीं है। ग़ज़ल शब्दावली से ज़्यादा कथन भंगिमा पर निर्भर है।

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