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ई-कचरे के लिए अलग कानून और प्राधिकरण का सुझाव

YS TEAM
12th Aug 2016
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 ई-कचरे के निपटान के लिए प्रभावी व्यवस्था के अभाव पर चिंता जताते हुए एक संसदीय समिति ने आज इसके प्रबंधन के लिए एक अलग कानून लाने का सुझाव दिया। समिति ने सुझाव दिया है कि इस तरह के कचरे को केंद्रीय प्राधिकरण के अधिकृत संग्रहण केंद्र पर जमा कराने को अनिवार्य करने के लिए एक अलग कानून लाया जाना चाहिए।

दिलीप कुमार मन्सुखलाल गांधी की अगुवाई वाली गौण अधिनियमों (2015-16) पर समिति की ई-कचरा प्रबंधन के नियमों पर 15वीं रिपोर्ट में ये सुझाव दिए गए हैं। ये रिपोर्ट हाल में लोकसभा में रखी गई।

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समिति ने कहा कि फिलहाल ई-अपशिष्ट प्रबंधन पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 तथा इसके तहत बनाए गए नियमों के अंतर्गत किया जाता है। यह कानून अभी तक वांछित नतीजे नहीं दे पाया है।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उसका विचार है कि ई-कचरे का निपटान और प्रबंधन प्रभावी तथा अर्थपूर्ण तरीके से करने के लिए सरकार को ई-कचरे पर एक अगले कानून लाना चाहिए।

समिति ने कहा कि इस तरह के कानून के लिए संभवत: एक केंद्रीय प्राधिकरण या केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम की स्थापना की जरूरत होगी। प्राधिकरण में आईटी और अन्य तकनीकी क्षेत्रों के विशेषज्ञ होने चाहिए जिनको ई-कचरे के निपटान, प्रबंधन तथा पुनर्चक्रीय तकनीकों की जानकारी हो। इसके प्रमुख शहरों में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के साथ ऐसे अपने केंद्र होने चाहिए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस कानून के तहत यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि विभिन्न सरकारी विभागों या सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों, इकाइयों या व्यक्तिगत लोगों, छोटे-बड़े उद्योग घरानों, शिक्षा संस्थानों के ई-कचरे को संबंधित सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम के संग्रहण केंद्रों पर जमा कराया जाए।

समिति का मानना है कि यदि किसी सरकारी निकाय को यह काम दिया जाएगा तो इसे सुरक्षित तरीके से किया जाएगा और यह सुनिश्चित हो सकेगा कि ई-कचरा किसी तरह का पर्यावरण प्रदूषण पैदा नहीं करे।

समिति ने इसके साथ ही कहा कि ई-कचरे के निपटान में प्रमुख भूमिका निभाने वाले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा राज्य बोर्ड के पास ई-कचरे के विभिन्न पहलुओं पर न तो दक्ष श्रमबल है और न ही तकनीकी विशेषज्ञता।

ई-कचरे के खतरनाक तरीके से बढ़ने पर चिंता जताते हुए समिति ने कहा कि यह क्षोभ का विषय है कि इसकी बढ़ती समस्या से निपटने को कोई स्वतंत्र और प्रभावी कानूनी ढांचा नहीं है।-पीटीआई

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