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एक बार फिर परिवार 'वाद' के भंवर में कांग्रेस

20th Nov 2017
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भारत की राजनीति में जातिवाद, सम्प्रदायवाद के साथ एक और छुतहा रोग राजनेताओं के बड़े काम का रहा है- परिवार वाद। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष होने की तैयारियों के बीच यह सवाल एक बार फिर बड़ा होने लगा है।

राहुल और सोनिया गांधी (फोटो साभार- इंडियन एक्सप्रेस)

राहुल और सोनिया गांधी (फोटो साभार- इंडियन एक्सप्रेस)


राहुल ने वर्ष 2004 में सक्रिय राजनीतिक में पहलकदमी की थी। वर्ष 2013 में उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था। मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कुछ समय से अस्वस्थ चल रही हैं। उनकी ग़ैरमौजूदगी में राहुल गांधी ही कांग्रेस का नेतृत्व करते रहते हैं।

गुजरात में मतदान से पहले उनकी ताजपोशी होती है तो इसका चुनावी समीकरण पर क्या असर पड़ेगा, यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल राजनीतिक गलियारों में तैर रहा है।

नई दिल्ली में आज सोनिया गांधी के आवास 10, जनपथ पर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पारित हो गया। सोनिया गांधी की अध्यक्षता में हुई बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित दल के सभी महत्वपूर्ण नेता और महासचिवों ने हिस्सा लिया। भारत की राजनीति में जातिवाद, सम्प्रदायवाद के साथ एक और छुतहा रोग राजनेताओं के बड़े काम का रहा है- परिवार वाद। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष होने की तैयारियों के बीच यह सवाल एक बार फिर बड़ा होने लगा है। पिछले साल नवंबर में कार्यसमिति ने सर्वसम्मति से राहुल से पार्टी की कमान संभालने का आग्रह किया था, लेकिन तब राहुल ने कहा था कि वह चुनकर अध्यक्ष बनना चाहते हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव के लिए पहली दिसंबर को अधिसूचना जारी होगी, दिसंबर को नामांकन किया जाएगा और अगले दिन नामांकन पत्रों की छंटनी के बाद 11 दिसंबर तक नामांकन पत्र वापस लिए जा सकेंगे। सोलह दिसंबर को मतदान, 19 दिसंबर को मतगणना के बाद अध्यक्ष का नाम घोषित कर दिया जाएगा। ऐसा भी हो सकता है कि राहुल गांधी ही सिर्फ नामांकन करें, ऐसे में 11 दिसंबर को ही उनके अध्यक्ष बनने की घोषणा हो सकती है। गौरतलब है कि राहुल गांधी ने वर्ष 2004 में सक्रिय राजनीतिक में पहलकदमी की थी। वर्ष 2013 में उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था। मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कुछ समय से अस्वस्थ चल रही हैं। उनकी ग़ैरमौजूदगी में राहुल गांधी ही कांग्रेस का नेतृत्व करते रहते हैं। इन दिनों गुजरात चुनाव के मोर्चे पर जमे हुए हैं। फिलहाल, कांग्रेस पार्टी के संविधान के अनुसार नये अध्यक्ष के निर्वाचन के लिए 31 दिसंबर 2017 तक का समय है।

राज्यों में चुनाव के बीच राहुल गांधी की ताजपोशी की तैयारियों ने सियासत के जानकारों को भी चौकन्ना कर दिया है। वे तरह-तरह के आकलन प्रस्तुत करने लगे हैं। गुजरात में मतदान से पहले उनकी ताजपोशी होती है तो इसका चुनावी समीकरण पर क्या असर पड़ेगा, यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल राजनीतिक गलियारों में तैर रहा है। राजनीति विशेषज्ञों का कहना है कि कांग्रेस के नेतृत्व में फेरबदल का यह तो बड़ा दिलचस्प समय है। एक ओर गुजरात का चुनाव चल रहा है, जहां कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है और कांग्रेस यहां अपना झंडा बुलंद कर पूरे देश की सियासत को एक अलग संदेश देने का मन बनाए हुए है, दूसरी तरफ पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में परिवर्तन का अंदरूनी मैराथन।

ऐसा माना जा रहा है कि अभी तक शीर्ष पर पार्टी में दो ध्रुव (सोनिया गांधी और राहुल गांधी) होने से प्रायः असमंजस की स्थितियां बनी रहती रही हैं। राहुल के अध्यक्ष हो जाने के बाद यह अंतर्द्वंद्व हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा और पार्टी अंदरूनी खींचतान से उबरकर बाहरी चुनौतियों पर और ताकत से अपना ध्यान एकाग्र कर सकेगी। ऐसे में एक सवाल और तैर रहा है कि यदि गुजरात में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो क्या राहुल की ताजपोशी से पार्टी हाथ पीछे खींच सकती है?

भारतीय राजनीति के जाने माने विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि आर्थिक नीतियों पर राहुल गांधी के विचार सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम आदि से अलग तरह के हैं। नोटबंदी हो और जीएसटी पर उनकी बातों से यह पहले ही स्पष्ट हो चुका है। राहुल के अध्यक्ष चुने जाने को लेकर आर्थिक नीतियों पर उनका अपना दृष्टिकोण इसलिए भी बहुत मायने रखता है कि गुजरात उद्योग और व्यवसाय की दृष्टि से देश का एक महत्वपूर्ण प्रदेश है। उनके अध्यक्ष बनने, न बनने पर राज्य के उद्यमी वर्ग की भी निगाहें लगी हुई हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लगभग एक माह पूर्व राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का संकेत किया था। उधर, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह सहित कांग्रेस के कई दिग्गज राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपने की कसरत जारी रखे हुए हैं। राहुल गांधी के हर बयान, हर ट्वीट, कमेंट्स को इस वक्त मीडिया भी काफी महत्व देने लगा है। बताया जा रहा है कि राहुल के पदारोहण का पूरा कथानक कुछ चेंज के साथ लगभग फाइनल हो चुका है। सियासत की समझ रखने वाले कहते हैं कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्ता पक्ष के तेवर का जवाब राहुल गांधी की शीर्ष उपस्थिति के रूप में देख रहे हैं। राहुल राष्ट्रीय राजनीति की अच्छी समझ रख रहे हैं। जनता में उनकी स्वीकार्यता भी पहले के मुकाबले इधर तेजी से बढ़ी है।

वह 17 मई 2004 से लगातार अमेठी के सांसद हैं। 25 सितंबर 2007 से 19 जनवरी 2013 तक कांग्रेस पार्टी के महासिचव और फिर उपाध्यक्ष बने। वह लगातार जनता के मुद्दों के साथ केन्द्र सरकार से दो-दो हाथ करते आ रहे हैं। जहां तक देश में परिवारवादी राजनीति का सवाल है, संभव है, आगे भाजपा का यह तर्क एक बार फिर सुर्खियां ले, लेकिन देश आर्थिक मोर्चे पर जिस तरह जूझ रहा है, जनसमस्याएं जिस तरह विकराल होती जा रही हैं, सत्ता पक्ष जिस तरह पंजाब के मोरचे पर विफल हुआ है और गुजरात-हिमाचल में कठिन चुनौती का सामना कर रहा है, ऐसे में इस तरह के आरोप जनता को रिझाने-बांटने में शायद ही ज्यादा कारगर सिद्ध हों।

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