संस्करणों
विविध

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सिनेमाहॉल में लोग मनोरंजन के लिए जाते हैं, राष्ट्रगान के लिए नहीं

24th Oct 2017
Add to
Shares
120
Comments
Share This
Add to
Shares
120
Comments
Share

जस्टिस चंद्रचूर्ण ने कहा कि अगली चीज ये होगी कि लोग टीशर्ट्स और शॉर्ट्स पहनकर हॉल नहीं जाएंगे क्योंकि इससे राष्ट्रगान का अपमान होगा। उन्होंने कहा कि समाज को नैतिक पहरेदारी की आवश्यकता नहीं है।

सांकेतिक तस्वीर (सोशल मीडिया)

सांकेतिक तस्वीर (सोशल मीडिया)


सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान को अनिवार्य तौर पर बजाने के फैसले की सुप्रीम कोर्ट समीक्षा कर सकता है। साथ ही सिनेमा हॉल में इस दौरान खड़े होने की बाध्यता भी खत्म हो सकती है।

जस्टिस दीपक मिश्रा के बाएं बैठे जस्टिस चंद्रचूर्ण ने ध्वज संहिता का हवाला देते हुए कहा कि कहा कि सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजते समय किसी का खड़ा होना जरूरी नहीं है क्योंकि लोग सिनेमाघरों में मनोरंजन के लिए जाते हैं और समाज को मनोरंजन की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूर्ण ने सोमवार को सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान गाने संबंधी बीते साल 30 नवंबर को जारी आदेश के पीछे दिए गए तर्क पर कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस ने कहा कि एक भारतीय के लिए देशभक्ति साबित करने के लिए सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के समय खड़ा होना जरूरी नहीं हैं। कोर्ट ने इसके साथ ही केंद्र सरकार से कहा कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने को नियंत्रित करने के लिए नियमों में संशोधन पर विचार किया जाए।

जस्टिस चंद्रचूर्ण चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय पीठ का हिस्सा थे जो केरल में कोडुंगाल्लूर फिल्म सोसाइटी द्वारा नवंबर के फैसले पर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर रही है। जस्टिस चंद्रचूर्ण ने कहा कि अगली चीज ये होगी कि लोग टीशर्ट्स और शॉर्ट्स पहनकर हॉल नहीं जाएंगे क्योंकि इससे राष्ट्रगान का अपमान होगा। उन्होंने कहा कि समाज को नैतिक पहरेदारी की आवश्यकता नहीं है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, की तीन सदस्यीय जैसी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगली बार सरकार चाहेगी कि लोग सिनेमाघरों में टी-शर्ट्स और शार्ट्स में नहीं जाएं क्योंकि इससे राष्ट्रगान का अपमान होगा। संयोगवश चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने ही पिछले साल नवंबर वाला फैसला सुनाया था। जस्टिस मिश्रा ने कहा था कि सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान गाने से देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना जाग्रत होगी।

जस्टिस दीपक मिश्रा के बाएं बैठे जस्टिस चंद्रचूर्ण ने ध्वज संहिता का हवाला देते हुए कहा कि कहा कि सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजते समय किसी का खड़ा होना जरूरी नहीं है क्योंकि लोग सिनेमाघरों में मनोरंजन के लिए जाते हैं और समाज को मनोरंजन की आवश्यकता है। पीठ ने केंद्र सरकार को कहा कि हम आपको हमारे कंधे पर रखकर बंदूक चलाने की अनुमति नहीं दे सकते। लोगों को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के समय खड़े होने की आवश्यकता नहीं है।

पीठ ने कहा कि केन्द्र सरकार देश भर के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय ध्वज संहिता में संशोधन करने पर विचार करे। इस मामले की सुनवाई के दौरान केन्द्र की ओर से अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि भारत एक विविधता वाला देश है और एकरूपता लाने के लिए सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना आवश्यक है। इस पर न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने कहा, आपको ध्वज संहिता में संशोधन करने से कौन रोक रहा है? आप इसमें संशोधन कर सकते हैं और प्रावधान कर सकते हैं कि राष्ट्रगान कहां बजाया जाएगा और कहां नहीं बजाया जा सकता। आजकल तो यह मैचों, टूर्नामेंट और यहां तक कि ओलंपिक में भी बजाया जाता है, जहां आधे दर्शक तो इसका मतलब भी नहीं समझते हैं।

हालांकि अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि सरकार इस पर ध्यान देगी। सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान को अनिवार्य तौर पर बजाने के फैसले की सुप्रीम कोर्ट समीक्षा कर सकता है। साथ ही सिनेमा हॉल में इस दौरान खड़े होने की बाध्यता भी खत्म हो सकती है। खुद कोर्ट ने इस बात के संकेत दिए हैं। बेंच ने ये भी कहा है कि अगर सिनमा हॉल में राष्ट्रगान नहीं बजता है तो इससे देशभक्ति खत्म नहीं हो जाएगी।

यह भी पढ़ें: प्लानिंग न होने की वजह से फिर से खराब हुई दिल्ली की हवा: ग्रीनपीस की रिपोर्ट 

Add to
Shares
120
Comments
Share This
Add to
Shares
120
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags