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ये 10 मॉडल विलेज विकास की असली मिसाल पेश कर देश को कर रहे हैं गौरान्वित

2nd Sep 2017
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देश के अधिकतर गांवों में बिजली पहुंच गई है और सड़कें भी पक्की हो गई हैं। इनमें से कुछ गांव तो ऐसे हैं जो साफ-सफाई से लेकर बिजली पानी के मुद्दे पर शहरों को भी मात दे रहे हैं। 

मेघालय का मवल्यनॉन्ग गांव 

मेघालय का मवल्यनॉन्ग गांव 


मेघालय में एक गांव है मवल्यनॉन्ग, जिसे कि भगवान का अपना बगीचा के नाम से भी जाना जाता है। सफाई के साथ साथ यह गांव शिक्षा में भी अव्वल है। यहां की साक्षरता दर 100 फीसदी है, यानी यहां के सभी लोग पढ़े-लिखे हैं।

इनमें से कई गांव के लोग घर से निकलने वाले कूड़े-कचरे को बांस से बने डस्टबिन में जमा करते हैं और उसे एक जगह इकट्ठा कर खेती के लिए खाद की तरह इस्तेमाल करते हैं। 

ग्लैमर और चकाचौंध की दुनिया से कोसों दूर भारत के गांवो की तस्वीर कुछ अलग ही है। गांव का नाम आते ही शहर के लोगों के चेहरे पर एक अजीब सा एक्सप्रेशन झलकने लगता है। गंदे और कच्चे रास्ते, जानवर, कच्चे घर और शाम होते ही घना अंधेरा। लेकिन वास्तव में आज ऐसे हालात नहीं हैं। देश के अधिकतर गांवों में बिजली पहुंच गई है और सड़कें भी पक्की हो गई हैं। इनमें से कुछ गांव तो ऐसे हैं जो साफ-सफाई से लेकर बिजली पानी के मुद्दे पर शहरों को भी मात दे रहे हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही देश के दस गांवों के बारे में।

मवल्यनॉन्ग मेघालय

मेघालय में एक गांव है मवल्यनॉन्ग, जिसे कि भगवान का अपना बगीचा के नाम से भी जाना जाता है। सफाई के साथ साथ यह गांव शिक्षा में भी अव्वल है। यहां की साक्षरता दर 100 फीसदी है, यानी यहां के सभी लोग पढ़े-लिखे हैं। इतना ही नहीं, इस गांव में ज्यादातर लोग सिर्फ अंग्रेजी में ही बात करते हैं। यह गांव 2003 में एशिया का सबसे साफ और 2005 में भारत का सबसे साफ गांव बना। इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां की सारी सफाई ग्रामवासी स्वयं करते हैं, सफाई व्यवस्था के लिए वो किसी भी तरह प्रशासन पर आश्रित नहीं हैं। इस पूरे गांव में जगह जगह बांस के बने डस्टबिन लगे हैं।

मवल्यनॉन्ग गांव को एशिया का सबसे साफ सुथरा गांव माना जाता है

मवल्यनॉन्ग गांव को एशिया का सबसे साफ सुथरा गांव माना जाता है


पूरे गांव में हर जगह कचरा डालने के लिए ऐसे बांस के डस्टबिन लगे हैं। मवल्यनॉन्ग गांव शिलांग से 90 किलोमीटर और चेरापूंजी से 92 किलोमीटर दूर स्थित है। 

खासी हिल्स डिस्ट्रिक्ट का यह गांव मेघालय के शिलॉन्ग और भारत-बांग्लादेश बॉर्डर से 90 किलोमीटर दूर है। साल 2014 की गणना के अनुसार, यहां 95 परिवार रहते हैं। यहां सुपारी की खेती आजीविका का मुख्य साधन है। यहां लोग घर से निकलने वाले कूड़े-कचरे को बांस से बने डस्टबिन में जमा करते हैं और उसे एक जगह इकट्ठा कर खेती के लिए खाद की तरह इस्तेमाल करते हैं। पूरे गांव में हर जगह कचरा डालने के लिए ऐसे बांस के डस्टबिन लगे हैं। मवल्यनॉन्ग गांव शिलांग से 90 किलोमीटर और चेरापूंजी से 92 किलोमीटर दूर स्थित है। दोनों ही जगह से सड़क के माध्यम से आप यहां पहुंच सकते हैं। आप चाहें तो शिलांग तक देश के किसी भी हिस्से से फ्लाइट के द्वारा भी पहुंच सकते हैं।

राजस्थान का गांव पिपलांत्री

राजस्थान का गांव पिपलांत्री


पिपलांत्री राजस्थान

राजस्थान की पिपलांत्री पंचायत इतनी अच्छी मिसाल पेश कर रही है कि शहर के लोग अपने ऊपर शर्मिंदा हो जाएं। इस गांव के लोग बेटी के जन्म लेने पर 111 पेड़ लगा कर बेटियों के साथ-साथ पर्यावरण रक्षा की अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं। राजस्थान की राजधानी जयपुर से 350 किलोमीटर की दूरी पर पिपलांत्री राजस्थान के राजसमंद जिले का एक गांव है, हालांकि यह इलाका संगमरमर की खदानों के लिए मशहूर है, मगर अब बेटियां और पर्यावरण बचाने के अभियान की वजह से सुर्खियों में है। पिपलांत्री पंचायत भी है. इस पंचायत में किसी भी परिवार में बेटी के जन्म लेने पर 111 पेड़ रोपे जाते हैं। गांव के लोग समुदाय के रूप में एक जगह जमा होते हैं और हर नवजात बालिका शिशु के जन्म पर पेड़ लगाये जाने का कार्यक्रम होता है इस अनूठी परंपरा की शुरुआत गांव के ही पूर्व सरपंच श्यामसुंदर पालीवाल ने कम उम्र में अपनी बेटी के गुजर जाने के बाद की थी। वर्ष 2006 से शुरू हुई परंपरा आज भी कायम है।

अकोदरा डिजिटल गांव

अकोदरा डिजिटल गांव


अकोदरा गांव गुजरात

अकोदरा गांव अहमदाबाद शहर से लगभग 90 किलोमीटर दूर है। इस गांव में कुल 200 घर हैं और यहां की आबादी लगभग 1200 है। कृषि और पशुपालन इस गांव के लोगों का मुख्य पेशा है। इस गांव को पहले से ही देश के पहले ऐनिमल हॉस्टल का दर्जा मिल चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तभी इसका लोकार्पण किया गया था। गुजरात के साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर उप जिले में यह गांव है। गांव के हरेक परिवार को एटीएम कार्ड और मोबाइल बैंकिंग से जोड़ा गया है। इस गांव में ब्लैकबोर्ड की जगह स्मार्ट बोर्ड ने ले ली है। यहां टीवी के जरिए पढ़ाई हो रही है। बस्ते का बोझ टैबलेट कम कर रहा है। नतीजा ये है कि पढ़ने में बच्चे दिलचस्पी ले रहे हैं, स्कूलों में एटेंडेंस बढ़ी है। गांव के ई-हेल्थ सेंटर में सभी गांववालों के मेडीकल रिकॉर्ड बटन दबाने से मिल जाता है।

मंजगाम की तस्वीर (साभार: सोशल मीडिया)

मंजगाम की तस्वीर (साभार: सोशल मीडिया)


मंजगाम जम्मू एवं कश्मीर

जम्मू और कश्मीर का नाम आते ही हम सबके मन में अशांति और सुरक्षाबलों से घिरे लोगों की तस्वीर कौंध जाती है। ऐसा माना जाता है कि कश्मीर अभी शांति और विकास से कोसों दूर है, लेकिन वहां का एक गांव की स्थिति इसके ठीक उलट है। श्रीनगर के मंजगाम एक ऐसा ही गांव है जहां मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी होने के बाद भी वहां सारे हिंदू-मुस्लिम मिलकर एक दूसरे का त्योहार मनाते हैं। मंजगाम जिले का पहला गांव है, जिसे गो डिजिटल गो कैशलेस प्रोग्राम के तहत पहला कैशलेस गांव बनाया गया है। गांव में हर व्यक्ति का अपना-अपना खाता है। गांव की आबादी करीब 2000 है और 200 से ज्यादा घर हैं जिसमें कम से कम एक सदस्य को ट्रेनिंग दी गई है।

कर्नाटक का गांव मत्तूर

कर्नाटक का गांव मत्तूर


मत्तूर गांव कर्नाटक

कर्नाटक के शिमोगा जिले का यह छोटा सा गांव अपने पुरानी परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए है। इस गांव में आज भी संस्कृत में पढ़ाई होती है। इस गांव में जब आप आएंगे तो देखेंगे कि लोग आम बोलचाल में भी संस्कृत का इस्तेमाल करते हैं। आम दुकानदार से लेकर मजदूर तक संस्कृत में बात करते और समझते हैं। यही नहीं गांव के बच्चे भी संस्कृत में बातचीत करते नजर आ जाएंगे। 1980 के शुरु तक इस गांव के लोग क्षेत्रीय भाषा जेसे कन्नड, तमिल बोलते थे। क्योंकि सदियों पहले तमिलनाडु से कई संख्या में लोग यहां आकर बस गए थे। यहां के युवा भले ही मोटरसाइकिल पर जींस पहनकर चलते हों, लेकिन उन्हें संस्कृत की जानकारी अच्छी होती है।

केरल के गांव पोतनिक्कड़ की बच्चियां

केरल के गांव पोतनिक्कड़ की बच्चियां


पोतनिक्कड़, केरल

एक तरफ जहां देश की बाकी आबादी अशिक्षा से जूझ रही है वहीं दूसरी तरफ केरल के इस गांव ने एक सपने को हकीकत में बदल दिया है। इस गांव में साक्षारता का दर 100 प्रतिशत है। यानी कि यहां इस गांव में हर व्यक्ति साक्षर है। यहां प्राइमरी से लेकर हायर स्कूलों तक अच्छी पढ़ाई होती है। शिक्षा के मामले में अगर इस गांव का अनुकरण कर लिया जाए तो पूरा भारत भी 100 फीसदी शिक्षित हो सकता है।

हिवरे बाजार, महाराष्ट्र

हिवरे बाजार, महाराष्ट्र


हिवरे बाजार, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में किसानों की बात आते ही सूखा और किसानों की आत्महत्या की तस्वीर जेहन में उभर आती है। लेकिन महाराष्ट्र का एक गांव ऐसा भी है जहां न तो पानी का संकट है और न ही किसानों की गरीबी। बल्कि इस गांव में 50 से ज्यादा किसान ऐसे हैं, जो करोड़पति भी हैं। जब समूचा महाराष्ट्र पानी की कमी से जूझ रहा है, सूखे की चपेट में है, तब इस हिवरे बाजार में पानी का कोई संकट नहीं है। सालों तक लगातार श्रमदान, ग्रामीणों में कमाल की एकता, नो पॉलिटिक्स, सरकारी पैसे का सही इस्तेमाल और पानी के जबर्दस्त मैनेजमेंट ने हिरवे बाजार को ग्राम विकास की असाधारण मिसाल बना दिया है।

शनि शिंगणापुर के बैंक में खुला गेट

शनि शिंगणापुर के बैंक में खुला गेट


शनी शिंगणापुर, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र राज्य का यह गांव लूटमार और क्राइम से अछूता है। यहां के लोग अपने आप को सबसे सुरक्षित समझते हैं। आप यकीन नहीं करेंगे, लेकिन यहां के लोग अपने घर का दरवाजा बंद करना भी भूल जाते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां चोरी की घटनाएं नहीं होंगी। और सच भी यही है। आप हैरान हो जाएंगे कि यहां के बैंकों में भी ताला नहीं लगता। इतने से भी यकीन न हो तो जान लीजिए कि इस इलाके में पुलिस स्टेशन भी नहीं है। वाकई जब यहां के लोग इतने ईमानदार और सभ्य हों तो फिर थाना-पुलिस की क्या ही जरूरत।

तिलोनिया गांव की महिलाएं (फोटो साभार बेयरय़फुट कॉलेज)

तिलोनिया गांव की महिलाएं (फोटो साभार बेयरय़फुट कॉलेज)


तिलोनिया, राजस्थान

कहते हैं अगर सही दिशा में ईमानदारी के साथ काम किया जा रहा है तो उसका अंजाम तो बेहतर निकलता ही है। इसमें सफल न होने का प्रतिशत बहुत कम है। ऐसे में अगर सारा समाज आपके साथ हो तो फिर कहना ही क्या। सफलता की पूरी गारंटी है। बल्कि कहना चाहिए सिर्फ सफल ही नहीं सार्थक भी होता है ऐसा काम। जयपुर से करीब 100 कि.मी. किशनगढ़ का तिलोनिया गांव, महज दो हजार लोगों की आबादी वाला ये गांव बाहर से तो किसी भी सामान्य गांव की तरह ही दिखता है, लेकिन दुनिया के नक्शे पर यह गांव रोशनी बिखेरने के लिए जाना जाता है। राजस्थान का यह एक छोटा सा गांव पूरी दुनिया में रौशनी फैला रहा है। वो भी ऐसी औरतों की वजह से जिन्होंने ठीक से स्कूल का मुंह नहीं देखा।

इस गांव की अनपढ़ औरतों ने सौर उर्जा में इंजीनियरिंग कर दुनियाभर से आई गांव के औरतों को सौर उर्जा से गांव को रौशन करने की तकनीक सीखा रही है। दादी-नानी की उम्र की महिलाओं को सौर उर्जा की प्लेट बनाते और सर्किट लगाते देख आप हैरान रह जाएंगे। इस उर्जा क्रांति ने जहां गांव की औरतों को दुनिया भर में पहचान दी है वहीं गांव में भी शहर की तरह सौर उर्जा के स्ट्रीट लाईटें जगमगाती नजर आती है। दरअसल यहां बुनकर रॉय द्वारा स्थापित एक सामाजिक संस्था बेयरफुट कॉलेज करीब 40 सालों से कार्यरत है। इसी बेयरफुट कॉलेज ने 2009 में सौर उर्जा का प्रोजेक्ट शुरु किया गया था, जिसने गांव के औरतों की पूरी जिंदगी ही बदल दी।

बीकानेर के गांव की तस्वीर

बीकानेर के गांव की तस्वीर


यहां के लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चलाए गए स्वच्छ भारत अभियान के काफी पहले ही शौचालय बनवा लिए थे। यहां पब्लिक टॉयलट भी अच्छी खासी तादाद में हैं।

नलबाड़ी, बीकानेर (राजस्थान)

एक तरफ जहां पूरे राजस्थान में पानी की किल्लत होती है वहीं दूसरी ओर राज्य के ही बीकानेर जिले के लोगों ने पानी की उत्तम व्यवस्था कर रखी है। यहां के लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चलाए गए स्वच्छ भारत अभियान के काफी पहले ही शौचालय बनवा लिए थे। यहां पब्लिक टॉयलट भी अच्छी खासी तादाद में हैं। 

खुले में शौच से मुक्ति के लिए जिले में चल रहे ‘बंको बीकाणो’ अभियान को केवल राष्ट्रव्यापी पहचान मिली है, बल्कि विश्व के अनेक संगठनों ने भी इस की सराहना की है। यहां की पंचायतों ने स्वच्छ भारत को हकीकत का जामा पहना दिया है। इसीलिए यह गांव स्वच्छता के मामले में अव्वल है।

यह भी पढ़ें: पीसीओ बूथ को आर्ट गैलरी में बदल देने वाले सुरेश शंकर

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