संस्करणों

...ताकि गरीबों को मिले दवाएं, खुद नुकसान सहकर बेचती है दवाईयां 'हेल्पलाइन फार्मेसी'

17th Oct 2015
Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share
image


‘मैं कहां रुकता हूं अर्श ओ फर्श की आवाज से

मुझको जाना है बहुत ऊंचा हदे परवाज से.’’

विष्णु कुमार सुरेका की भी सोच ऐसी ही है. 65 साल के सुरेका दिल्ली में हेल्पलाइन फार्मेसी के संस्थापक हैं. सुरेका का एक मात्र लक्ष्य है, कोई भी मरीज महंगी दवा के एवज में अपनी जान न गंवाए. वह हेल्पलाइन फार्मेसी के जरिए गरीब और जरूरतमंदों को बाजार से सस्ती दवाएं देते हैं. 2003 में उन्होंने हेल्पलाइन फार्मेसी की शुरुआत की. शुरुआत छोटी थी लेकिन मानवता की सेवा के लिए एक बड़ा कदम. आज की तारीख में ऐसे बहुत कम लोग है जो मुनाफा कमाने के बजाए मानवता की सेवा में लगे हुए हैं. सुरेका एक बड़े उद्योगपति हैं और हेल्पलाइन फार्मेसी को चलाने के लिए पूंजी दूसरे उद्योग से होने वाले मुनाफे से लगाते हैं. सुरेका का उद्देश्य साफ है, जितना हो सके उतना गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करो. हेल्पलाइन फार्मेसी उन लोगों की मदद करती है जो समाज के कमजोर तबके से ताल्लुक रखते हैं और महंगी, जीवन रक्षा दवाई, सर्जिकल आइटम और मेडिकल सामग्री खरीदने के असमर्थ हैं. हेल्पलाइन फार्मेसी ऐसी चीजें अत्याधिक सब्सिडाइज्ड रेट में मुहैया कराती है. दिल्ली के ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन के पास यूसुफ सराय में हेल्पलाइन फार्मेसी की दुकान है. यह दुकान तीन हजार स्कावयर फीट पर बनी है और इसे सुरेका ने किराये पर लिया है. यह दुकान देश के दो मशहूर अस्पताल एम्स और सफदरजंग अस्पताल के बेहद नजदीक है. इस वजह से यहां जरूरतमंदों की भारी भीड़ होती है. बकौल विष्णु कुमार सुरेका-


‘जीवन में हर इंसान नाम और पैसा कमाने के लिए या तो नौकरी करता है या फिर बिजनेस. नौकरी और बिजनेस से पैसा और नाम तो कमाया जा सकता है लेकिन जिंदगी का मिशन पूरा नहीं होता है. जिंदगी का मिशन है पीड़ितों की मदद करना. जिंदगी गुजारने के लिए पैसे तो चाहिए होते है क्योंकि वे जरूरतें पूरी करता है लेकिन मिशन नहीं पूरा होता है. मिशन है ऐसा कुछ करना जिससे जिंदगी का लक्ष्य हासिल हो सके और इसके लिए मानवता की मदद कर रहा हूं.’
image


महीने में दो करोड़ की दवा बेचते हैं

हेल्पलाइन फार्मेसी से जरूरतमंद डॉक्टर की पर्ची दिखाकर सब्सिडाइज्ड रेट में दवा खरीद सकता है. सुरेका का कहना है कि ऐसा नहीं है कि यहां से सिर्फ गरीबों को ही दवा बेची जाती है, कई बार अच्छे परिवार के लोग भी सब्सिडाइज्ड रेट पर दवा खरीदते हैं. वे कहते हैं अगर दवा में एक रुपये का भी मुनाफा कमाएंगे तो वह मानवता की सेवा का अवसर खो देंगे. सुरेका, मौरिया उद्योग लिमिटेड के चेयरमैन हैं और इसके अलावा उनका कारोबार टेरी टॉवल्स मैनुफैक्चरिंग और रियल एस्टेट में भी है. उनकी एक कंपनी एलपीजी सिलेंडर का भी उत्पादन करती है. हेल्पलाइन फार्मेसी के संचालन का सारा खर्च वे खुद अन्य उद्योगों से होने वाले मुनाफे से करते हैं. हर महीने वह हेल्पलाइन फार्मेसी के जरिए दो करोड़ रुपये की दवा और मेडिकल सामग्री बेचते हैं. फार्मेसी का ऑपरेटिंग कॉस्ट करीब छह से सात लाख रुपये के बीच है. या यूं कहें वे अपने जेब से ऑपरेटिंग कॉस्ट भर रहे हैं. सिर्फ दवा ही नहीं चैरिटेबल संस्था गरीब और जरूरतमंदों को आर्थिक सहायता भी देती है. संस्था ब्रांडेड कंपनियों से दवाई थोक में खरीद उसे ज्यादा से ज्यादा डिस्काउंट के साथ जरूरतमंद मरीजों को मुहैया कराती है.

संस्था का काम यहीं नहीं खत्म होता है. सस्ती दवा के अलावा संस्था मुफ्त शेल्टर और अन्य सुविधा भीे देती है. एम्स और सफदरजंग अस्पताल के पास ही 200 कमरे का शयनकक्ष है जिसका इस्तेमाल गरीब मरीज और उनके सहायक कर सकते हैं. इस शेल्टर में एक मुफ्त कैंटीन भी चलती है जहां मुफ्त/सब्सिडाइज्ड रेट में रोजाना पांच सौ लोगों को दोपहर और रात का भोजन कराया जाता है. संस्था तीन सौ एनजीओ और सरकारी अस्पतालों की भी मदद करती है. एनजीओ को मेडिकल सामग्री मुफ्त या फिर सब्सिडाइज्ड रेट में दी जाती है जिससे समाज के कमजोर तबके के लोगों तक सही तरीके से मदद पहुंच सके. सुरेका कहते हैं, ‘हेल्पलाइन फार्मेसी को चलाने का सारा खर्च हम निजी तौर पर उठाते हैं और जो भी पैसे सेवा के काम में लगता है वह अपने बिजनेस से लगाते हैं. हम किसी संस्था, विदेशी नागरिक या फिर सरकार की आर्थिक मदद नहीं लेते हैं.’

दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से ग्रैजुएशन करने के बाद सुरेका ने फैमिली बिजनेस को चुना. चूंकि सुरेका उद्योगपति परिवार से ताल्लुक रखते हैं इसलिए उनके परिवार के सभी सदस्य बिजनेस से ही जुड़े हैं. परिवार का कोई भी सदस्य घर पर नहीं बैठता, वह सुरेका के बिजनेस में हाथ बंटाता है और साथ ही ट्रस्ट के कामों को भी देखता है.

कैसे बनी सुरेका पब्लिक ट्रस्ट

सुरेका बताते हैं कि एक दिन वह अपने पिता की दवा खरीदने दवा की दुकान पर गए. वहां उन्होंने देखा कि हर कंपनी की दवा की कीमत अलग अलग है और लाइफ सेविंग दवा पर रिटेलर का मुनाफा कहीं अधिक है. उन्होंने सोचा कि अगर बिना मुनाफा दवा बेचा जाए तो कइयों की मदद हो जाएगी. इसी उद्देश्य के साथ उन्होंने हेल्पलाइन फार्मेसी की नींव रखी. वैसे तो सुरेका पब्लिक ट्रस्ट 1965 से गरीबों के बीच काम कर रहा है लेकिन बड़े पैमाने पर काम 2003 से शुरू हुआ. आज हेल्पलाइन फार्मेसी रोजाना औसतन 14 लाख रुपये की दवा सात लाख रुपये में बेचती है. औसतन सात लाख रुपये की बचत गरीब कर पाते हैं.

हर शहर में हो सब्सिडाइज्ड दवा की दुकान

सुरेका का कहना है कि उनके अंदर सेवा भाव का जुनून सवार है और इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकते है. वे एम्स के अंदर हेल्पलाइन फार्मेसी की शुरुआत करने की भी योजना बना रहे हैं ताकि देश के कोने कोने से इलाज कराने आ रहे गरीब मरीजों को कम से कम कीमत में दवा उपलब्ध हो सके. सुरेका का कहना है कि वह चाहते हैं कि सिर्फ दिल्ली ही नहीं देश के हर शहर में सब्सिडाइज्ड रेट में दवा की दुकान हो और इसका सीधा लाभ गरीबों और जरूरमंदों को मिले. दिल्ली के बाद सुरेका ने मथुरा और बनारस में भी ऐसी ही दो दुकानें खोली हैं. उनका कहना है कि मथुरा और बनारस के हजारों जरूरतमंद सस्ती दवा पाकर सही समय पर अपना इलाज करा पाने में सफल हो रहे हैं.

Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags