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कॉफी और कॉफी प्रेमियों की बीच की कड़ी है ‘द फ्लाईंग स्क्विरिल’

पीने वालों को ताजी और खुशबूदार कॉफी देने के लिये शुरू की ऑनलाइन बिक्रीकुर्ग के अपने बागानों में उगी कॉफी को पहुंचाते हैं उपभोक्ताओं तकबचपन के कॉफी के प्रति लगाव को दिया ऑनलाइन व्यवसाय कर रूपकॉफी के वास्तविक प्रशंसकों तक ताजी कॉफी पहुंचाना है लक्ष्य

24th Apr 2015
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कुर्ग में स्थित ‘द फ्लाईंग स्क्विरिल‘ के बागानों में कॉफी की झाडि़यों की कतारों के बीच से झांकती डालियों पर लटकते चटख लाल रंग के बीज हर आने-जाने वाले का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। संस्थापक आशीष डाबरेओ अपनी इस खेती को ‘विज्ञान और कला के संयोजन’ के रूप में परिभाषित करते हैं। इसके अलावा इन बागानों में बड़े पैमाने पर उगाए गए वनीला, नींबू, केला, इलायची और अन्य मसाले कॉफी में अपनी सुगंध मिलाकर उसे और स्वादिष्ट बना देते हैं। बड़ी-बड़ी मशीनों में इन कॉफी के बीजों को धोकर अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजारने के बाद विभिन्न रंग और स्वाद में विकसित किया जाता है। इसके बाद इन करोड़ों बीजों को कई चक्रों में सूखने के लिये मिट्टी की भट्टियों में झोंका जाता है।

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अपने उत्पादों के साथ नित नए प्रयोग करना, उच्च गुणवत्ता वाली कॉफी के उत्पादन और बेचने वाली इस कंपनी के प्रमुख जादुई अवयवों में से एक है। मंगलौर में बिताये गए बचपन के दिन कॉफी उगाने के जुनून और इस कंपनी की सफलता के सूत्रधार हैं, जहां दोस्त और रिश्तेदार अपने यहां उगाए गए कॉफी के बीजों को आपस में उपहार के तौर पर देते हैं। कॉफी के प्रति अपनी दीवानगी के बारे में आशीष कहते हैं कि, ‘‘बचपन में हम लोग छुट्टियां बिताने कॉफी के बागानों में जाते थे और वहीं से कॉफी के प्रति प्रारंभिक लगाव की जड़ें गहरी हुईं।’’


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कॉफी पीने के शौकीन आशीष को भारत में जब गुणवत्ता वाली कॉफी पीने के लिये नहीं मिली तो उन्होंने 2011 में अपनी कंपनी शुरू करने का फैसला किया। आशीष का कहना है कि, ‘‘जब हमने कॉफी की खेती और सम्मिश्रण की दिशा में अनुसंधान और विकास का काम शुरू किया था तब इस क्षेत्र में ताजी और स्वादिष्ट भुनी हुई कॉफी उपलब्ध करवाने के लिये एक पूरा ऑनलाइन बाजार मौजूद था। साथ ही हमें कोई प्रतिस्पर्धी न होने का भी बहुत फायदा मिला।’’ अपने उद्गम के समय से ही यह टीम अपने उपभोक्ताओं के चयन को लेकर काफी संजीदा रही है और उसकी नजर कॉफी के वास्तविक प्रशंसको और उसके स्वाद के जानकारों पर है न कि उन लोगों पर जो कॉफी को केवल ‘सुबह के झटके’ या ‘कैफीन की खुराक’ के रूप में देखते और इस्तेमाल करते हैं। दो साल के इंतजार और शोध और विकास के बाद, ‘द फ्लाईंग स्क्विरिल‘ कॉफी की अपनी पहली खेप के साथ बाजार में उतरा। आशीष टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि, ‘‘दो सालों के अंतराल में कॉफी के बाजार में बहुत परिवर्तन आया और इस दौरान कुछ कॉफी प्रेमी इसकी ऑनलाइन बिक्री शुरू कर चुके थे। अगर हम बीते 6 महीनों का अध्ययन करें तो ऑनलाइन कॉफी ब्रांड्स के बाजार में कई गुना की वृद्धि हुई है और उपभोक्ता के सामने अब कई विकल्प मौजूद हैं।’’ आशीष आगे जोड़ते हुए कहते हैं, ‘‘अपने प्रतिस्पर्धियों के विपरीत हम सिर्फ अपने बागानों में उगाई कॉफी ही उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवाते हैं और हमारे पूर्वज भी ऐसा ही करते थे।’’ आशीष के कॉलेज के मित्र तेज जो अब एक किसान के रूप में उनके साथ काम कर रहे हैं, कुर्ग में ही रहकर बागानों में कॉफी बीजों के उगने से लेकर उनके सूखने तक देखभाल का काम संभालते हैं और फिर आगे सूखे हुए बीजों को बैंगलोर रवाना कर देते हैं। आशीष कहते हैं, ‘‘तेज बागानों का काम संभालते हैं और उन्होंने उनके जैसा कॉफी के उत्पदान के प्रति पूरी तरह समर्पित व्यक्ति नहीं देखा है। उन्हें कॉफी की खेती के बारे में बहुत गहन जानकारी है और वे इसमें तकनीक का मिश्रण करने से भी नहीं चूकते हैं। इस तरह हम कॉफी के उत्पादन के पुराने तरीकों को तकनीक के सम्मिश्रण के साथ बदलकर कई नए स्वादों और सुगंध वाली कॉफी के बीजों का उत्पादन करने में सफल होते हैं।’’ इसके अलावा इनकी पूरी टीम को ब्रांडिंग, डिजाइनिंग, विज्ञापन आदि में महारत हासिल है जो इनके कौशल और व्यापार की तरक्की के मुख्य कारक हैं।

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‘‘कॉफी प्रेमियों की बदलती हुई मांगों को देखते हुए इस व्यापार में तरक्की की असीम संभावनाएं हैं। जल्द ही कॉफी लोगों की दिनचर्या में शामिल होती जा रही और ‘द फ्लाईंग स्क्विरिल‘ इस परिवर्तन में उनकी मदद करने के लिये मौजूद है। हम एक अच्छी और बुरी कॉफी के बीच से बारीक अंतर को बखूबी जानते हैं और हम इसका फायदा लाखों वास्तविक कॉफी प्रेमियों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।’’ आशीष बताते हैं कि कंपनी की अधिकतर बिक्री ऑनलाइन होती है, ‘‘क्योंकि यही एकमात्र ऐसा तरीका है जिसके द्वारा आप ताजी भुनी और असली स्वाद वाली कॉफी शीघ्रातिशीघ्र उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकते हैं,’’ आशीष का कहना हैं। ‘‘हम बड़े नाम वाले सुपरबाजारों और मॉल्स में अपना उत्पाद बेचने की अपेक्षा उत्पाद के पारखी छोटे विक्रेताओं को अपने साथ जोड़ने में रुचि रखते हैं। इसके अलावा कई कार्यालयों, एयरपोर्ट लाउंज, होटल इत्यादि भी हमारे राजस्व को बढ़ाने वाले प्रमुख उपभोक्ता हैं जो अपने ग्राहकों को सर्वश्रेष्ठ उत्पाद परोसने में यकीन रखते हैं।’’


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इस टीम का मानना है कि अबतक के सफर में इन्होंने बहुत कुछ सीखा है और यह अनंत प्रक्रिया अब भी चालू है। ‘‘हम लोग लगभग रोज़ ही कुछ न कुछ नया सीखते हैं। चाहे वह उपभोक्ता का व्यवहार हो, बाजार की वास्तविकताएं या फसलों पर मौसम का प्रभाव, गूगल एनेलेटिक की व्याख्या हो या कॉफी के बीजों को मिट्टी की भट्टी में पकाने और ऊंचे तख्तों पर सुखाने के बीच के सूक्ष्म अंतर को जानना हो या सोशल मीडिया का इस्तेमाल के साथ ई-कॉमर्स को अपने व्यापार में शामिल करना, हम लोग हर समय कुछ नया सीख रहे हैं और पहले से बेहतर हो रहे हैं।’’ आशीष आगे जोड़ते हुए वे कहते हैं, ‘‘यह सूचि वास्तव में अंतहीन है धैर्य की कला ने जीवन और व्यापार के प्रति हमारे नजरिये को बदलने में काफी मदद की है।’’?

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‘द फ्लाईंग स्क्विरिल‘ के समाने अब दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं जिनमें से पहली तो बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा का सामना करना है, लेकिन आशीष इस चुनौती को भी एक मौके के रूप में देखते हैं। ‘‘प्रतिस्पर्धा हमें लगातार कुछ नया और बेहतर करने के लिये प्रेरित करती है और हमें अपने व्यापार के विस्तार में इससे बहुत मदद मिलती है।’’ दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है अपने आप को अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे रखकर बाजार में पहली पायदान पर बने रहना। ‘‘चूंकि हमारे पास विज्ञापन आदि के लिये बड़ा बजट नहीं है ओर न ही हमारा इरादा भविष्य में ऐसा करने का है इसलिये अपने ग्राहकों को आधार बनाकर उनमें लगातार इजाफा करना अपने आप में एक कठिन चुनौती है।’’


आशीष का मानना है कि असल में सबसे बड़ी पब्लिसिटी होती है मौखिक प्रशंसा। एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे और इसी तरह कारवां बनता है और कॉफी प्रेमी उनके साथ जुड़ते चले जाते हैं। असल में अगर अच्छी नीयत के साथ एक काम किया जाता है तो उसकी सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है। ग्राहकों का ध्यान और उनतक अच्छी क्लाविटी की चीज़ें पहुंचाना ही ‘द फ्लाईंग स्क्विरिल‘ का मकसद है।

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