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बैंकिंग घोटालों और बढ़ते डिफाल्टर्स जैसे मुद्दों पर इलाहाबाद बैंक के जीएम दिनेश कुमार से बातचीत

समाज के वित्तीय एवं संर्वांगीण उत्थान में नींव के पत्थर की भूमिका निभा रहा है बैंक

प्रणय विक्रम सिंह
14th May 2018
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फिर एक बार नोटबन्दी के बाद बैंक चर्चा में हैं। बैंक क्या समूची बैंकिंग व्यवस्था ही समाचारों की सुर्खी बनी हुई है। एक तरफ बैंक समाज की वित्तीय व्यवस्था की रीढ़ हैं तो दूसरी तरफ उसे आधुनिक महाजन का खिताब देकर सवालों के दायरे में खड़ा किया जा रहा है। एक तरफ ऋण ग्रस्त किसान कर्जा न चुका पाने के कारण आत्महंता बनने को विवश हो रहा है वहीं दूसरी ओर बैंक को हजारों करोड़ की चपत लगाने वाला पूंजीपति विलास कर रहा है। ऐसे अनेक विरोधाभासी स्थितियों के मध्य गति कर रही बैंकिंग सेवा को और अधिक नजदीक से समझने के लिए प्रस्तुत है देश के प्रतिष्ठित बैंक, इलाहाबाद बैंक के उ.प्र. के महाप्रबन्धक दिनेश कुमार से योरस्टोरी की खास बातचीत...

दिनेश कुमार, यूपी जीएम, इलाहाबाद बैंक

दिनेश कुमार, यूपी जीएम, इलाहाबाद बैंक


किसान बहुत सम्मानित उपभोक्ता है बैंकों का। हमारा देश भी कृषि प्रधान है। अत: किसान के साथ निर्ममता और पूंजीपतियों के साथ सरलता का इल्जाम बेबुनियाद है। आधारभूत सत्य यह है कि बैंकिंग का कार्य पूंजी पर ही गति करता है। 

योरस्टोरी: बैंक धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार का केंद्र बनते जा रहे हैं। इन्हें रोकने के लिये बुनियादी जोखिम प्रबंधन क्या हो सकता है?

दिनेश कुमार: देखिये, बैंकों का परिचालन परिपत्रों के माध्यम से किया जाता है। इस आलोक में बैंकों के नियामक भी समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करते रहते हैं, जिनका अनुपालन करना बैंकों के लिये जरूरी होता है। आमतौर पर फर्जीवाड़े को बैंकों में तभी अंजाम दिया जाता है, जब विविध परिपत्रों में निर्देशित नियमों की अवहेलना की जाती है। वैसे, परिपत्रों से इतर, जोखिम प्रबंधन के माध्यम से भी धोखाधड़ी के वारदातों को रोका जा सकता है। बीते सालों में धोखाधड़ी के प्रकारों में बढ़ोतरी होने से जोखिम प्रबंधन के दायरे को बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है, जिसकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा जोखिम की पहचान करने में बैंककर्मियों की दक्षता में कमी और पहचान होने के बाद इसकी रिपोर्टिंग में देरी होना है। बैंककर्मियों को जागरूक बनाना जरूरी है। इस क्रम में बैंक कर्मियों को प्रशिक्षण देना एवं प्रोत्साहित करना मुफीद हो सकता है। बैंकिंग व्यवस्था में धोखाधड़ी के डेटाबेस को मजबूत करने से भी लाभ हो सकता है। धोखाधड़ी का पता लगाने में डेटाबेस की अहम भूमिका हो सकती है। बैंकों द्वारा संबंधित सूचनाओं को आपस में साझा करने से जोखिम को कम किया जा सकता है। इस संदर्भ में बैंकों को स्वयं को तकनीक कुशल बनाना भी फायदेमंद होगा।

योरस्टोरी: एनपीए सरकार, रिजर्व बैंक और जनता के लिए चिंता एवं चर्चा का विषय बने हुए हैं। बड़े बकायोदारों के अतरिक्त छोटे और मझोले कजर्धारकों को कहां तक जिम्मेदार मानते हैं एनपीए के लिये?

दिनेश कुमार: देखिये, एनपीए बढ़ने के बहुत से कारण हैं जैसे-दैवी आपदा, आर्थिक जगत में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विपरीत परिस्थितियां, राजनीतिक कारणों से जानबूझकर ऋण न चुकाने की बढ़ती प्रवृत्ति। लेकिन जहां तक छोटे और मझोले कजर्धारकों की बात है तो, उनमें भी उधार न वापस करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। कारण कुछ भिन्न हैं। कभी आपदाएं तथा कभी आर्थिक नीतियां व कभी आर्थिक मंदी इसके लिए जिम्मेदार होती हैं। किसानों के मामले में सूखा पड़ जाना, ओलावृष्टि, बाढ़ जैसे कारण उनकी ऋण चुकाने की क्षमता को क्षीण कर देते हैं।

किसान मजबूरी वश सरकार से ऋण माफ करने की अपेक्षा करते हैं। यह होना भी चाहिए, परंतु वोटों को प्रभावित करने के इरादे से लिया गया लोन माफी का फैसला दुष्प्रभाव भी डालता है। जिन्होंने समय से ईमानदारी पूर्वक किस्तें अदा की होती हैं, उनमें कुंठा पैदा होती है और आगे भुगतान नहीं करने की प्रवृत्ति पनपती है। ऐसे बहुत से ऋण एनपीए श्रेणी में आ जाते हैं। अत: यदि ऋण माफी की जाये तो निर्धारित अवधि व मानक में यह व्यवस्था हो कि दोनों प्रकार के किसान (जिन्होनें ऋण चुका दिया और दूसरे वे, जो ऋणग्रस्त हैं) लाभार्थी होंगे। साथ ही देखा गया है कि चाहे छोटे और मझोले व्यापारी हों या स्वरोजगार में लगे लोग, वे सभी भी बैंकों के ऋण को चुकाने में आनाकानी करते हैं।

योरस्टोरी: बैंकों की उपेक्षा के शिकार छोटे किसान हो रहे हैं। बैंक उनसे ऋण वसूली के सम्बन्ध में इतनी निर्ममता से पेश आता है कि किसान को आत्महत्या तक को विवश होना पड़ता है, जबकि उद्योगपतियों द्वारा सैकड़ों करोड़ की राशि के ऋण माफ कर दिए जाते हैं। ऐसा क्यों?

दिनेश कुमार: देखिये, किसान बहुत सम्मानित उपभोक्ता है बैंकों का। हमारा देश भी कृषि प्रधान है। अत: किसान के साथ निर्ममता और पूंजीपतियों के साथ सरलता का इल्जाम बेबुनियाद है। आधारभूत सत्य यह है कि बैंकिंग का कार्य पूंजी पर ही गति करता है। अत: जो पूंजी ऋण स्वरूप प्रदान की जाती है उसका बैंक में वापस आना अत्यन्त आवश्यक है। दीगर बात यह है कि ऋण वसूली हेतु प्रक्रिया के सम्बन्ध में किसान अथवा पूंजीपति के आधार पर कोई विभेद नहीं किया गया है। अत: सारा खेल व्यवस्था के क्रम में बनता है। पूंजीपति सक्षम है तो कोर्ट आदि का बेहतर उपयोग कर राहत पा जाता है और किसान उस स्तर पर प्रयास नहीं कर पाता है। लेकिन बैंक द्वारा कार्यवाही की दिशा सबके लिए एक ही है। बैंक आम आदमी की सुविधा के लिए है।

योरस्टोरी: बैंकिंग में महिलाओं की स्थिति और उनका भविष्य कैसा है?

दिनेश कुमार: यह देख कर खुशी मिलती है कि बैंकिंग जगत में महिलाओं की संख्या में अनेपक्षित इजाफा हुआ है। इससे बड़ा हर्ष का विषय यह है कि महिला कर्मचारी/अधिकारी अपने दायित्वों का निर्वहन अत्यन्त सम्वेदनशीलता के साथ कर रही हैं। सुदूर ग्रामीण अंचलों की शाखाओं में भी ïवह बड़ी कुशलता के साथ अपने कार्यों को अंजाम दे रही हैं। किंतु महिलाओं की जीवनशैली में परिवार अत्यंत महत्वपूर्ण मुकाम रखता है। अत: देखा गया है अनेक प्रतिभाशाली महिला कर्मचारी/अधिकारी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण करियर में रिस्क लेने से घबराती हैं और उन ऊंचाइयों को हासिल करने से वंचित रह जाती हैं, जिनके लायक वह थीं।

योरस्टोरी: बैंकों में बढ़ रही लेन-देन (भ्रष्टाचार)की प्रवृत्ति व दलालों के वर्चस्व ने आमजन की राह कठिन कर दी है। जनसामान्य को अपने कारोबार, गृह निर्माण, कृषि कार्य, शिक्षा ऋण आदि प्राप्त करने हेतु भगीरथ प्रयास करने के पश्चात भी अक्सर निराशा ही हाथ आती है। पर्सेन्टेज मिलने के बाद बैंक अधिकारी सारे नियम कानून ताक पर रखकर ऋण प्रदान करते हैं?

दिनेश कुमार: देखिये, मैं बैंक के विषय में यह दावे के साथ कह सकता हूं कि यहां भ्रष्टाचार व्यक्तिगत स्तर पर हो सकता है किन्तु संस्थागत स्वरूप में कतई नहीं है। और जो भी केस भ्रष्टाचार के आते हैं उनकी पूर्ण विवेचना कर दोषी को दण्डित किया जाता है। अब आनलाइन का दौर है। सभी चीजें एक क्लिक पर मौजूद हैं इसलिए ऋण आदि से सम्बन्धित समस्त जानकारियां सभी को सहज उपलब्ध हैं। अत: अब उपभोक्ता को कोई बरगला नहीं सकता है। फिर भी यदि ऐसा होता है तो प्रत्येक दर्ज शिकायत को तुरन्त संज्ञान में लेकर मामले को निस्तारित करने की प्राथमिकता रहती है।

योरस्टोरी: तकनीकीकरण के साथ बढ़ती बैंक जालसाजी की समस्या से निपटने की क्या कार्य योजना है?

दिनेश कुमार: तकनीकी ने व्यवस्था के संचालन को सरल तो किया है किन्तु कुछ समस्याएं भी सामने आ रही हैं। जैसाकि आपने जालसाजी की बात कही तो उससे बचने के लिए उपभोक्ताओं को जानकारी बैंक द्वारा प्रदान की जाती है। और तकनीकी जालसाजी का प्रतिशत भी काफी सूक्ष्म है किन्तु हमारे लिए प्रत्येक उपभोक्ता महत्वपूर्ण है। इसी कारण बैंक अपने तंत्र को अभेद्य बनाने के लिए उसे लगातार अपडेट करता रहता है।

योरस्टोरी: बैंकों के एकीकरण (मर्जर) के सन्दर्भ में आपका दृष्टिकोण क्या है?

दिनेश कुमार: देखिये, बैंकों का एकीकरण स्वयं में व्यापकता लिए है और विलय भारतीय बैंकिंग के लिए कोई रामबाण भी नहीं है। मर्जर से समाधान होगा या समस्या गहराएगी यह इस बिन्दु पर आधारित होगा कि मर्जर किसके साथ हो रहा है। यदि किसी कमजोर बैंक का मर्जर सदृढ़ बैंक के साथ होता है तो परिणाम बेहतर प्राप्त होने की सम्भावना बढ़ जाएगी। इसी तरह दो कमजोर बैंकों का मर्जर अपेक्षित परिणाम देने के बजाय समस्या बन जाएंगे। यहां नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि बैंकों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए कोई आसान राह नहीं है। सरकार ने उन क्षेत्रों में सुधार करने की कोशिश की है जिन पर सरकारी बैंकों का भारी कर्ज है। हाल ही में इस्पात उत्पादन और उसकी खपत बढ़ाने के लिए नीति जारी की गई है। दूरसंचार और बिजली क्षेत्र पर भी भारी कर्ज है और वे चिंता का सबब बने हुए हैं। सरकारी बैंकों की हालत इसलिए भी खराब है कि उनको जमा खूब मिलता है जबकि ऋण विस्तार बहुत धीमा है। आखिरकार सरकार को यह मानना होगा कि खस्ता सरकारी बैंकों का पुनर्पूंजीकरण करना ही होगा।

योरस्टोरी: समूचे बैंकिंग तंत्र में सुधार के क्या उपाय हो सकते हैं?

दिनेश कुमार: बैंकिंग सेक्टर को मजबूत बनाना होगा। इसके लिए कुछ सुधारों पर विचार किया जा सकता है। पहला, भारतीय रिवर्ज बैंक के कार्यवृत्त को बढ़ाने की दिशा में प्रयास किया जा सकता है ताकि बहुस्तरीय जांच जैसे प्रावधानों को समाप्त करके सिंगल विंडो सर्विस जैसी व्यवस्था लागू की जा सके। इससे बैंकों को रिजर्व बैंक के निर्देशों के अनुपालन एवं सुधारात्मक कार्रवाई करने में सरलता का अहसास होगा। इस समय बैंकों का पर्याप्त समय एवं वर्कफोर्स विभिन्न एजेंसियों की रिपोर्टो के अनुपालन में ही लगा रहता है। साथ ही रिजर्व बैंक मात्र पेपर टाइगर ही बनकर न रह जाए इस पर भी विचार करना होगा। त्रुटियों के लिए दोषी कर्मचारियों को समन करने, उनका स्टेटमेंट रिकॉर्ड करने और दंडात्मक कार्रवाई के लिए सिफारिश करने का अधिकार रिजर्व बैंक को दिए जाने पर विचार किया जा सकता है।

दूसरा, बैंक प्रबंधन विशेषकर बैंक-बोर्ड बैंक के हितों के संरक्षण के लिए कार्य करे। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बड़े ऋण प्रस्तावों पर रिजर्व बैंक के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए विचार किए जाएं। सिफारिशों, ट्रांसफर, पोस्टिंग आदि पर बैंक प्रबंधन का समय बर्बाद न हो। तीसरा, बैंकों को यथासंभव गैर बैंकिंग सेवाओं से मुक्त रखा जाना चाहिए। चौथा, रिजर्व बैंक की स्वायत्तता बरकरार रखना देश की मजबूत आर्थिक व्यवस्था के लिए अति आवश्यक है। केंद्रीय बैंक की सिफारिशों की विवेचना सरकार द्वारा गुण-दोष के आधार पर की जानी चाहिए और उसी के अनुसार आर्थिक नीतियों का निर्धारण एवं क्रियान्वयन भी किया जाना चाहिए।

योरस्टोरी: सरकारी बैंको की कार्यशैली में प्राइवेट बैंकों का पेशेवर रुख नहीं दिखाई पड़ता है, ऐसा क्यों ?

दिनेश कुमार: यह तुलना ही बेमानी है। यह कुछ ऐसी ही है जैसे उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद और चेतन भगत में तुलना करना। एक तरफ प्राइवेट बैंक अपने उपभोक्ता का खाता ही दस हजार रुपये से खोलता है, दूसरी तरफ सरकारी बैंक, शून्य बैलेंस पर करोड़ों खातों की धारक है। वित्तीय समावेशन की कुल जंग ही सरकारी बैंकों की सामथ्र्य पर लड़ी जा रही है। सरकारी बैंकों की एक-एक शाखा कई-कई सैकड़ा उपभोक्ताओं को सरकारी योजनाओं के अंतर्गत 500-500 रूपये का वजीफा बांटता है। और प्राइवेट बैंक इन सब गैर-उत्पादक कार्यों से दूर हैं। दरअसल सरकारी बैंक पूरा भारतवर्ष हैं तो प्राइवेट बैंक अतुल्य भारत के कास्मोंपोलिटन शहरी कल्चर की वित्तीय झांकी। तो तुलना कैसे हो सकती है?

योरस्टोरी: बैंक की समाज में कोई उपयोगिता है।

दिनेश कुमार: बैंक, समाज की हर छोटी-बड़ी रचनात्मक घटना/विकास/प्रयोग/दु:ख-दर्द/समाधान में शामिल है। बिटिया की पढ़ाई से लेकर विदाई तक बैंक आपके साथ है। घर के अरमान से लेकर गाड़ी के सपने तक बैंक करता है पूरे। दरअसल समाज की आर्थिक उन्नति का मूलाधार है बैंक। किसान से लेकर जागीरदार तक, दुकानदार से लेकर उद्यमी तक, विद्यार्थी से लेकर प्रोफेसर तक आदि सभी महकमों, विभागों में बैंक समाधान और सहयोगी की भूमिका निर्वाहित करता है। शायद ही कोई ऐसा प्रतिष्ठान हो जिसके निर्माण में बैंक की भूमिका न हो।

योरस्टोरी: आपके अनुसार बैंकिंग सेवा में युवा क्यों आये ? उसे क्यों बैंकिंग सेक्टर में अपना करियर बनाना चाहिए ?

दिनेश कुमार: बैंकिंग सेवा समाज निर्माण, समाज उत्थान का कार्य है। अर्थव्यवस्था की रीढ़ है बैंकिंग व्यवस्था। ऐसी सेवा से जुड़ कर युवा प्रत्येक प्रकार के संतोष को प्राप्त कर सकता है। वह अपने करियर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ऊंचाइयां हासिल कर सकता है तो अपने रचनात्मक व नवाचारी प्रयोगों के द्वारा समाज में उद्यमिता एवं आर्थिक विकास के अनेक नव आयाम विकसित कर समाज के वित्तीय उत्थान का सहभागी भी बन सकता है। इसलिये युवाओं को बैंकिंग सेवा में आना चाहिये।

यह भी पढ़ें: बिहार की मधुमिता शर्मा को गूगल ने दिया एक करोड़ आठ लाख का पैकेज

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