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विकास की अहम कड़ी के तौर पर युवाओं को जागरुक करने की कोशिश जुटा एक युवक

18th Feb 2016
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प्रखर भारतीय के माता-पिता उत्तर प्रदेश के कानपुर के एक छोटे से गांव से आते हैं। जिस वर्ष उनका जन्म हुआ उनके माता-पिता ने उन्हें शहर के शीर्ष स्कूलों में से एक में दाखिला दिलवाने के लिये कानपुर का रुख करने का फैसला किया। वह उस झुग्गी बस्ती से बिलकुल इतर जगह थी जहां प्रखर को अपने हमउम्र ऐसे बच्चे देखने को नहीं मिलते जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह ही नहीं देखा हो। हर वर्ष गर्मियों की छुट्टियों में प्रखर माता-पिता उन्हें एक बार वापस गांव जरूर लेकर जाते जहां बिजली और बुनियादी स्वच्छता का नामोनिशान तक नहीं था। और स्पष्ट विभिन्नता ने इस युवा के मन को परेशान करना प्रारंभ कर दिया।

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अब 30 वर्ष के हो चुके प्रखर बताते हैं कि ये अवलोकन असमानता के साथ उनका पहला वास्ता थे और खासकर जब शिक्षा शिक्षा की बात हो तो। जाहिर है, आज वे जो भी कर रहे हैं और उनके अपरंपरागत करियर विकल्प के बीज तभी रोपित हो गए थे जब वे एक छोटे बच्चे थे।

आज के युग में जब हम तेजी से वाई-फाई और लाई-फाई के क्षेत्र में तेजी से कदम बढ़ाते जा रहे हैं प्रखर के गांव में आज भी बिजली और बुनियादी स्वच्छता का अभाव है। कितनी हैरानी की बात है किअभी भी हमारे देश के कुछ हिस्से इस प्रकार के माहौल में हैं।

काॅलेज के दिनों में प्रखर ने युवा भारतीयों को जोड़ते हुए अपने सामजिक दायित्यों की पूर्ति करने के उद्देश्य से यूथ एलायंस नामक समूह तैयार किया। वर्ष 2009 में प्रखर टीच फाॅर इंडिया का प्राथमिक फेलो बनने में कामयाब रहा। वर्ष 2011 में उन्होंने यूथ एलायंस को पुर्नजीवित किया और भारत में चहुंओर व्याप्य सामाजिक समस्याओं के निदान को युवाओं को एकत्रित करने के उद्देश्य से औपचारिक रूप से पंजीकरण करवाया।

प्रखर का सफर

प्रखर ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल करने के लिये उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के एक इंजीनियरिंग काॅलेज में दाखिला लिया।

प्रखर कहते हैं, 

‘‘मेरे काॅलेज में 2500 से भी अधिक छात्र थे और उनमें से मुश्किल से 25 ऐसे थे जिन्हें वास्तव में यह पता था कि वे इंजीनियरिंग क्यों कर रहे हैं। पहले तो आप चार वर्षों तक इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पढ़ते हैं और फिर कोई आईटी कंपनी आपको जावा कोडिंग करने के लिये नौकरी देती है! इसके पीछे कोई तर्क है क्या? इसके अलावा ग्रामीण और शहरी भारत के बीच की खाई हमेशा से ही मुझे सालती रहती थी। मुझे हमेशा से ही यह लगता था कि ग्रामीण भारत में युवाओं की एक पूरी फौज है जिसके लिये कुछ भी करना असंभव नहीं है लेकिन फिर भी वह जमीनी हकीकत से कितनी दूर है। मुझे महसूस होता था कि अगर एक बार वे जागरुक हो जाएं तो वे भी इस दिशा में कुछ जरूर करना चाहेंगे।’’


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एक बदलाव लाने की आशा के साथ प्रखर ने यूथ एलायंस (यूए) की नींव रखी। इन्होंने वृक्षारोपण सफाई अभियान, पानी बचाओ इत्यादि अभियानों के माध्यम से काम करना प्रारंभ किया। वर्ष 2009 में अपना दायरा बढ़ाते हुए प्रखर ने टाटा चाय के जनागृह जागो रे अभियान के साथा हाथ मिलाया और गाजियाबाद के प्रभावी बन गए। इसका मुख्य उद्देश्य सुवाओं को आगामी आम चुनावों से पहले मतदाता पहचान पत्र बनवाने के लिये जागरुक करना था। इनका यह अभियान काफी सफल साबित हुआ और प्रखर को प्रेरणा मिली कि युवाओं को अपने साथ जोड़कर ग्रामीण और शहरी भारत के बीच की खाई को पाटा जा सकता है।

इसके बाद टेक फाॅर इंडिया ने बिल्कुल सही समय पर इनके सामने दस्तक दी। इसके माध्यम से प्रखर को वंचित समाज के लोगों के साथ काम करते हुए उनके सामने आने वाली परेशानियों को जानने का मौका मिला। वे आगे कहते हैं, ‘‘मैंने टीएफआई का भाग बनने का फैसला सिर्फ इसलिये किया क्योंकि मैं असली भारत की जरूरतों को समझना चाहता था। मैं इन लोगों के साथ जुड़कर, इनके जीवन का एक भाग बनकर आखिरकार युवाओं को इस वास्तविक भारत से जोड़ने का रास्ता चाहता था ताकि वे समस्या को सुलझाने में मेरा हाथ बंटा सकें।’’ टीएफआई में इनके साथी इनकी ही समान विचारधारा वाले थे जो बदलाव के वाहक बनना चाहते थे। इसने युवाओं की ताकत को लेकर प्रखर के विश्वास को और मजबूती दी। कक्षा और समाज ने उन्हें उन बुनियादी समस्याओं को और नजदीकी से समझने का मौका दिया जिन्हें समाज और सरकार हाशिये पर रखती आई है।

यूथ एलायंस का कायाकल्प

दो वर्षो तक टीएफआई के साथ काम करने के दौरन प्रखर को वाईए और अधिक जतन के साथ प्रारंभ करने के लिये आवश्यक आत्मविश्वास, स्पष्टता और एक्सपोजर मिल गया था।

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इसके अंतर्गत दो फ्लैगशिप कार्यक्रम हैं। पहला है ग्राम्य मंथन जो अपने संचालन के पांचवे वर्ष में है यह एक नौ दिवसीय आवासीय कार्यक्रम है जिसमें शहरी युवाओं को कानपुर देहात में ग्रावों मे रहकर वास्तविक भारत से रूबरू करवाया जाता है और इनका दूसरा कार्यक्रम ओनस कहलाता है। यह काॅलेजज जाने वाले छात्रों के लिये सालभर चलने वाला एक कार्यक्रम है जिसमें उन्हें एक खोजपूर्ण यात्रा पर निकलकर अपने उद्यमिता और कौशल नेतृत्व गुणों को निखारने का मौका मिलता है। इसके अलावा वाईए कौशल निर्माण अभ्यासों के रूप में डिजाइन सोच, संसाधन जुटाने, प्रभावी संचार आकद पर आधारित विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन भी करता रहता है।

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प्रेरित करने वाली कहानियां

अपनी औपचारिक स्थापना के बाद से वाईए 350 से भी अधिक लोगों के साथ सीधे तौर पर काम कर चुका है। इसके पूर्व साथी विभिन्न प्रकार के संगठनों के साथ 35 प्रकार के अलग-अलग नए प्रयास कर रहे हैं। इनमें से 80 फिलहाल सामाजिक विकास के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। 

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प्रखर उन युवाओं के प्रयासों का हवाला उदाहरण के तौर पर देते हैं जिन्हें अपने मनमर्जी का काम करने के लिये कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। उदाहरण के लिये वे एक बेहद अमीर परिवार से ताल्लुक रखने वाली पल्लवी कका जिक्र करते हैं जिसे सामाजिक क्षेत्र में काम करने के अपने फैसले के बारे में अपने परिवार को समझाने और मनाने के लिये जमीन-आसमान एक करना पड़ा था। ऐसी ही एक और लड़की जो उनके ग्राम्य मंथन कार्यक्रम का एक हिस्सा थी जो अब बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय है।

मुश्किल सफर

वाईए के सामने आने वाली एक प्रमुख चुनौती के बारे में बताते हुए प्रखर कहते हैं, 

‘‘हमारा काम मुख्यतः मानसिकता को बदलने से संबंधित है जिसमें काफी समय लगता है। ऐसे में इसके प्रभाव को जानना काफी मुश्किल होता है इसीलिये फंड पाना और भी अधिक कठिन काम होता है।’’


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इसके अलावा वाईए के बारे में अभिभावकों को समझाना एक और बेहद कठिन चुनौती है क्योंकि क्योंकि इसके कार्यक्रम उनके जिगर के टुकड़ों को एक बिल्कुल ही अलग रास्ते पर ले जाने के लिये प्रेरित करते हैं जो किसी भी माता-पिता के दृष्टिकोण से बिल्कुल जुदा होते हैं। प्रारंभिक दौर में बिल्कुल ऐसा ही उनके अपने परिवार के साथ भी हुआ। समय के साथ उनके परिवार ने देखा कि जो काम वे कर रहे हैं उससे उन्हें खुशी मिलती है और उसके बाद से उन्होंने उनका पूरा समर्थन किया।

भविष्य की योजनाएं

प्रखर का इरादा आने वाले तीन वर्षों तक इस काम को पूर्णकालिक रूप से करने के बाद इसे किसी दूसरे को सौंपने का है। वे बताते हैं,

’’यह संगठन एक ऐसी विचारधारा की तरह फैलना चाहिये जो युवा रोल माॅडलों और सामाजिक उद्यमियों को फलने-फूलने में सक्षम बना सके। मैं इसके बाद भी युवाओं के साथ काम करना जारी रखूंगा लेकिन एक ऐसी संस्था के निर्माण के माध्यम से जो ‘‘राष्ट्र निर्माण’’ से संबंधित कार्यक्रम चलाया करेगी। हो सकता है कि मैं ‘‘इंडियन स्कूल आॅफ डेमोक्रेसी’’ की स्थापना करूं जो उन युवाओं के लिये एक पूर्णकालिक आवासीय कार्यक्रम हो जो लोकतंत्र के चारों खंबों, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया का हिस्सा बनकर भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने का एक हिस्सा बनने के आतुर हों।’’

उनके जीवन का मुख् उद्देश्य सिर्फ एक अधिक मानवीय, सम्मानजनक दुनिया के निर्माण के सपने को पूरा करना है। अंत में प्रखर कहते हैं, ‘‘यह एक सतत और लंबी प्रक्रिया है जिसमें कुछ सदियों का समय भी लग सकता है और मैं इस काम में अपनी भूमिका एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखता हूं जो सिर्फ प्रेम, आशा और विश्वास के बीज रोपित कर सकता है।’’

लेखिकाः स्निग्धा शर्मा

अनुवादकः पूजा

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