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दृष्टिहीन लोगों के लिए पहली ब्रेल मैग्जीन छापने वाली उपासना मकती

26th Sep 2017
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उपासना मकती, जब वो 25 साल की थीं तो ऐसे ही एक दिन बाजार में पत्रिकाओं और किताबों की दुकानें टटोल रही थीं। वहां कई घंटे बिताने के बाद उन्होंने पाया कि दुकानों में एक भी पत्रिका दृष्टिहीनों के लिए नहीं थी। फिर उन्होंने पता किया तो ये बात सामने आई कि दृष्टिहीनों के लिए कोई पत्रिका छपती ही नहीं है।

साभार: सोशल मीडिया

साभार: सोशल मीडिया


मई, 2015 में उपासना ने भारत में पहली बार ब्रेल (दृष्टिहीनों के लिए खास लिपि) में मासिक अंग्रेजी पत्रिका लॉन्च की। अब वे बच्चों के लिए ब्रेल में किताबें लिख रही हैं। अपनी मैगजीन के लिए उनकी योजना टैक्टाइल इमेज प्रिंटिंग की भी है।

दृष्टिहीन व्यक्ति उपासना से अक्सर यह सवाल करते थे, ‘हमारे लिए आप यह सब क्यों करती हैं?’ या ‘क्या आप दृष्टिहीन हैं?’ ये लोग यह जानने के लिए उत्सुक रहते थे कि कनाडा के ओटावा यूनिवर्सिटी में कॉरपाेरेट कम्युनिकेशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद उपासना इस तरह का काम क्यों करती हैं।

उपासना मकती। जब वो 25 साल की थीं तो ऐसे ही एक दिन बाजार में पत्रिकाओं और किताबों की दूकानें टटोल रही थीं। वहां कई घंटे बिताने के बाद उन्होंने पाया कि दूकानों में एक भी पत्रिका दृष्टिहीनों के लिए नहीं थी। फिर उन्होंने पता किया तो ये बात सामने आई कि दृष्टिहीनों के लिए कोई पत्रिका छपती ही नहीं है। उपासना के मुताबिक, 'इसी दौरान मैंने नोटिस किया कि आज बाजार में सामान्य लोगों के लिए लाइफस्टाइल से जुड़ी एक नहीं, बल्कि अनेक भाषाओं में सैकड़ों पत्रिकाएं उपलब्ध हैं, लेकिन आंखों की रोशनी के बिना जीनेवाले लोगों के लिए ऐसी एक भी पत्रिका नहीं है, जिसे पढ़ कर वे समाज में आये बदलावों को जान सकें। तभी मेरे जेहन में ऐसी किसी मैगजीन को लॉन्च करने का ख्याल आया। 

इसके बाद मैंने कई दृष्टिहीनों से मिल कर यह जानने की कोशिश की थी कि यदि मैं उनके लिए लाइफस्टाइल मैगजीन तैयार करूंगी, तो क्या वे उसे पढ़ना पसंद करेंगे। मेरे इस विचार को ज्यादातर लोगों ने पसंद किया। उन्हें यह जान कर अच्छा लगा कि बाजार में उनके लिए भी एक ऐसी पत्रिका आ सकती है, जो उन्हें फैशन, सेहत और फिटनेट के क्षेत्र में होनेवाले परिवर्तनों की जानकारी देगी। लोगों से मिली इस सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद मैंने ‘व्हाइट प्रिंट’ को लॉन्च करने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया।'

मई, 2015 में उपासना ने भारत में पहली बार ब्रेल (दृष्टिहीनों के लिए खास लिपि) में मासिक अंग्रेजी पत्रिका लॉन्च की। अब वे बच्चों के लिए ब्रेल में किताबें लिख रही हैं। अपनी मैगजीन के लिए उनकी योजना टैक्टाइल इमेज प्रिंटिंग की भी है। हैदराबाद के एलवी प्रसाद आइ इंस्टीट्यूट में सर्जन एंथोनी विपिन दास का कहना है, ‘बतौर डॉक्टर दृष्टिहीनों के इलाज की हमारे लिए कुछ सीमाएं हैं और हम उसी दायरे में उनके लिए कुछ कर पाते हैं, लेकिन ‘व्हाइट प्रिंट’ के रूप में एक मैगजीन उनके लिए बहुत कुछ कर सकती है। 

उपासना का यह प्रयास इन लोगों के लिए सार्थक दिशा में किया जानेवाला एक सराहनीय प्रयास है। दृष्टिहीन व्यक्ति उपासना से अक्सर यह सवाल करते थे, ‘हमारे लिए आप यह सब क्यों करती हैं?’ या ‘क्या आप दृष्टिहीन हैं?’ ये लोग यह जानने के लिए उत्सुक रहते थे कि कनाडा के ओटावा यूनिवर्सिटी में कॉरपाेरेट कम्युनिकेशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद उपासना इस तरह का काम क्यों करती हैं।

दरअसल, उपासना ने बुजुर्गों की एक सीख याद कर रखी थी कि बिजनेस कभी पैसे बटोरने के लिए नहीं करना चाहिए बल्कि बिजनेस समाज में बदलाव लाने के लिए करना चाहिए। उपासना के मुताबिक, ‘मार्च, 2012 के आसपास का समय ऐसा था, जब मैं बहुत निराश थी। मैं अपने पब्लिक रिलेशन के जॉब से संतुष्ट नहीं थी। एक दिन मैंने यह महसूस किया कि जिस तरह से मैं अपने दिन की शुरुआत करती हूं, क्या दृष्टिहीन भी उसी तरह से करते होंगे। मैंने सोचा कि आखिर वे कैसे पढ़ते होंगे? लिहाजा मैंने उस पर काम शुरू किया। नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड के डायरेक्टर से मिलने के बाद मुझे पता चला कि दुनियाभर में इनकी संख्या करीब डेढ़ करोड़ है। कारोबार की अपनी चुनौतियां होती हैं। खासतौर से जब कुछ नया काम शुरू कर रहे हों, तो नयी चुनौतियों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है।

‘व्हाइट प्रिंट’ टाइटल को रजिस्टर कराने के लिए आठ महीने का समय लगा। पहले दो बार इस नाम को रिजेक्ट कर दिया गया। तीसरी बार में इसका रजिस्ट्रेशन पूरा हुआ। दूसरी चुनौती थी मैगजीन के प्रकाशन के लिए रकम का इंतजाम करना। उपासना चाहती थीं कि इस पत्रिका का प्रकाशन किसी प्रकार की चैरिटी से न हो। शुरू से ही वे इसे व्यवसाय का रूप देना चाहती थीं, इसीलिए फंड के लिए अनेक कंपनियों से विज्ञापन लेना ठीक समझा। विज्ञापन हासिल करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। इस तरह से पत्रिका का काम आगे बढ़ने लगा और एक टीम तैयार करके पत्रिका के कंटेंट पर जोर देना शुरू कर दिया।

उपासना की इस अनोखी मैग्जीन के पाठक दूरदराज क्षेत्रों के भी हैं। इस मैग्जीन के लिए उपासना के ऑफिस में ऐसे ऐसे गांवों से फोन आते हैं जिनका उन्होंने नाम तक नहीं सुना है। उन लोगों तक ये मैग्जीन पहुंचाने का एक ही रास्ता है, उसे डाकघर में पोस्ट करना। उन तक पहुंचने में काफी वक्त लग जाता है। और इस दरम्यान वो लोग उपासना के पास लगातार कॉल करते रहते हैं कि उनकी मैग्जीन कब तक आएगी। लोगों की इस चाहत और प्यार को देखकर उपासना की आंखें भर आती हैं। 

ये भी पढ़ें: चौदह साल का ह्यूमन कैलकुलेटर बना यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर

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