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पैसे न होने पर भी मुफ्त में पहुंचा देते हैं ऑटो चालक मुनेस मानगुली

लाखों में एक ये नेकदिल ऑटो चालक 

जय प्रकाश जय
19th Jun 2018
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ऐसे नेकदिल ऑटो चालक और भी होंगे, जैसे कि चेन्नई के कुमारन, गुड़गांव के रामकुमार, हैदराबाद के वासुदेव और डबवाली के रामधन, लेकिन किराए के ऑटो से घर-गृहस्थी की गाड़ी खींचने वाले कर्नाटक के मुनेस मानगुली का संकल्प तो बेमिसाल है। वह सैनिकों, गर्भवती स्त्रियों, दिव्यांगों को मुफ्त में उनके ठिकाने तक पहुंचाते हैं। अब तक वह ऐसे दो हजार से अधिक लोगों की सहायता कर चुके हैं।

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दिन-रात ऑटो चलाने के बाद मुनेस को जो कमाई हो जाती है, उसमें से ढाई सौ रुपए वह किराए पर ऑटो देने वाले को थमा देते हैं। वह बताते हैं कि यात्रियों की मदद के लिए उन्होंने ऑटो पर ही साफ-साफ लिख रखा है कि वह किन लोगों को बिना किराए के पहुंचा देते हैं।

जिन दिनो देश में नोटबंदी के थपेड़े से लोग जूझ रहे थे, चेन्नई के ऑटो चालक कुमारन ने लोगों की मदद का एक अनोखा तरीका निकाला। अपने ऑटो यात्रियों से बड़े नोट लेते और बदले में उन्हें छोटे देकर उनकी मुश्किल आसान कर देते। वह बताते हैं कि ‘जब वह पुराने नोट बैंक में जमा करवा सकते हैं तो फिर अपने ग्राहकों के लिए परेशानी का कारण क्यों बनें! ऐसा करके वह अपने ग्राहकों, विशेषकर बुजुर्गों को, नोट बदलवाने के लिए लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े होने के झंझट से बचाते हैं।’ उसी दौरान गुरुग्राम (गुड़गांव) में ऑटो चालक रामकुमार, नोटबंदी के कारण जिन यात्रियों के पास खुले पैसे नहीं होते, उन्हें बिना किराया लिए उनके ठिकानों तक पहुंचा दिया करते थे।

आज भी तमाम ऐसे ऑटो चालक राह चलते मिल जाते हैं, जिनके तौर-तरीके यात्रियों को भावुक कर देते हैं। ऐसे ही एक ऑटो चालक हैं कर्नाटक के मुनेस मानगुली, जो दिव्यांगों, वृद्धों और गर्भवती स्त्रियों को बिना किराये के उनके ठिकानों तक पहुंचाते हैं। ऐसे ही एक डबवाली के ऑटो चालक रामधन वर्ष 1991 से लगातार रक्तदान करते आ रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले ही आंध्रा में तो एक अजीब सा वाकया सामने आया। वृजाश्री वेणुगोपाल अपने वीज़ा इंटरव्यू के लिए हैदराबाद पहुंचीं। अनायास उन्हें पांच हजार रुपए की ज़रूरत पड़ गई। उनके पास केवल दो हजार रुपए थे। वह तीन हजार रुपए निकालने के लिए एटीएम के चक्कर लगाने लगीं। काफी वक्त गुजर गया, किसी एटीएम से पैसा नहीं निकला। इसके बाद वह एक दुकानदार के पास पहुंचीं और मदद मांगी कि वह कार्ड स्वाइप कर उन्हें तीन हजार रुपए दे दे। दुकानदार से भी मदद नहीं मिली। जिस ऑटो से वह एटीएम तक भागदौड़ कर रही थीं, उसका चालक वासुदेव (काल्पनिक नाम) उनकी परेशानी से द्रवित हो गया। उसने अपनी जेब से तीन हजार रुपए ये कहकर उनको थमा दिए कि जब आपके पास पैसे हो जाएं, लौटा दीजिएगा। वृजाश्री का काम चल गया। उन्होंने जब इस आपबीती को अपने एफबी वॉल पर लिखा तो ऑटो चालक की नेकदिली का लोगों को पता चला।

कर्नाटक निवासी ऑटो चालक मुनेस मानगुली स्नातक तक पढ़े-लिखे हैं। बयालीस वर्षीय मुनेस विगत ग्यारह वर्षों से किराए का ऑटो चला रहे हैं। इतने वर्षों में उनके पास इतना भी पैसा जमा नहीं हो सका कि वह खुद का ऑटो खरीद सकें लेकिन वह दिल के बड़े अमीर हैं। वह ऐसा नेकदिल काम कर रहे हैं, जो हर किसी के वश की बात नहीं। और आज के जमाने में तो नामुमकिन सा माना जाता है। दिन-रात ऑटो चलाने के बाद मुनेस को जो कमाई हो जाती है, उसमें से ढाई सौ रुपए वह किराए पर ऑटो देने वाले को थमा देते हैं। वह बताते हैं कि यात्रियों की मदद के लिए उन्होंने ऑटो पर ही साफ-साफ लिख रखा है कि वह किन लोगों को बिना किराए के पहुंचा देते हैं।

उन्होंने इसके लिए अपना फोन नंबर भी तमाम लोगों को दे रखा है। जब वह किसी हॉस्पिटल से आ रहे होते हैं तो ऐसे लोगों को उनकी जरूरत के हिसाब से उनके घर या रेलवे स्‍टेशन पर छोड़ देते हैं। दरअसल, वर्ष 1992 में की आंखों के सामने एक प्रेग्‍नेंट महिला की सिर्फ इस वजह से जान चली गई थी कि उसे अस्‍पताल ले जाने के लिए तीमारदारों को वक्‍त पर कोई वाहन नहीं मिला था। जब मुनेस ने किराए पर ऑटो चलाना शुरू किया तो उस दिन से ही ये भी तय कर लिया कि किसी ऐसे जरूरतमंद से वह बिना पैसा लिए मदद करते रहेंगे। पिछले तीन साल तो वह इस काम की बाकायदा लॉग बुक भी मेंटेन कर रहे हैं, जिसमें मुफ्त मदद पाने वाले लोगों के नाम भी दर्ज हैं। अब तक वह ऐसे दो हजार से ज्यादा लोगों का सहयोग कर चुके हैं। वह वक्‍त-बेवक्‍त ऐसे जरूरतमंद लोगों की मदद करने में जरा भी लापरवाही नहीं बरतते हैं। वह प्रेग्‍नेंट महिलाओं के अलावा नई मांओं, दिव्यांगों और सैनिकों को मुफ्त में ऑटो में बैठाकर उनके गंतव्य तक छोड़ते हैं।

आज के वक्त में जहां लोग बिना मतलब किसी को अपना कुछ पल भी देना मुनासिब नहीं समझते हैं, डबवाली के रामपुरा बिश्नोइयां के नेक दिल ऑटो चालक रामधन 1991 से लोगों को अपना खून दान कर रहे हैं। चूंकि उनका रेयर ब्लड ग्रुप-बी है, जो आसानी से मिलता नहीं है, यह मालूम होने के बाद से ही वह रक्तदान करने लगे हैं। सूचना मिलते ही वह तुरंत सारा काम छोड़कर सबसे पहले रक्‍तदान करने मौके पर पहुंच जाते हैं। वह पिछले ढाई दशक से ज्यादा के वक्त में कुल एक सौ इक्कीस बार रक्तदान कर तमाम अजनबी लोगों तक की जान बचा चुके हैं। अपने साठ किलोमीटर के कार्यक्षेत्र में कहीं भी खून की जरूरत होती है, वह ऑटो लेकर दौड़ पड़ते हैं। पहली बार उन्होंने हनुमानगढ़ जंक्शन जाने के वक्त रक्तदान किया था। उस वक्त उन्होंने अस्पताल में जब एक महिला को रक्त के लिए तड़पते देखा तो अपनी पत्नी के विरोध के बावजूद उन्होंने रक्तदान किया और उस महिला की जान बच गई।

इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि वह ऐसे जरूरतमंदों को खून देने से कभी पीछे नहीं हटेंगे। अब तक वह सिरसा, लुधियाना, चंडीगढ़, बीकानेर, जयपुर, हनुमानगढ़ के साथ-साथ कई और इलाको में आयोजित होने वाले शिविरों में रक्तदान कर चुके हैं। उनके परिजन बताते हैं कि दूसरों की जान बचाने के चक्कर में वह खुद की जिंदगी दांव पर लगा चुके हैं। चार साल पहले हनुमानगढ़ के नजदीक एक सड़क हादसा हुआ था, जिसमें काफी संख्या में स्कूली बच्चे घायल हो गए थे। सार्वजनिक जगहों पर बच्चों के लिए रक्‍तदान की घोषणा हो रही थी। जैसे ही बात रामधन को पता चली, वह रक्तदान करने पहुंच गए। उन्‍होंने 10 दिन पहले ही रक्तदान किया था। इसके बावजूद बच्‍चों की जान बचाने के लिए अपना खून दे दिया। डॉक्टर तीन माह में एक ही बार रक्तदान की सलाह देते हैं। जब रामधन ने जान का जोखिम उठाकर रक्तदान किया तो खून देने वालो की वहां लाइन लग गई।

यह भी पढ़ें: परिवारवालों ने किया इनकार तो डॉक्टर ने किया निपाह वायरस से जान गंवाने वालों का अंतिम संस्कार

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