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साहित्यिक लेख पर भगत सिंह को मिला था 50 रुपए इनाम

शहीदे आजम भगत सिंह के बलिदान दिवस पर विशेष...

24th Mar 2018
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23 मार्च शहीदे आजम भगत सिंह का बलिदान दिवस है। देश के लिए वह हंसत-हंसते फांसी पर चढ़ गए थे। वह अमर क्रांतिकारी ही नहीं साहित्य के गहरे अध्येता, प्रगतिशील पत्रकार और गंभीर रचनाकार भी थे। उनके प्राणों की तरह उनका साहित्य भी अंग्रेजों की साजिश का शिकार हो गया था। ग़ालिब, मीर उनके प्रिय शायर थे। एक बार साहित्यिक भाषा और लिपि पर उन्होंने एक लंबा लेख लिखा था, जिस पर उन्हें 50 रुपए का इनाम भी मिला था। 

फोटो क्रेडिट: निरंजन

फोटो क्रेडिट: निरंजन


किसी भी जाति के उत्थान के लिए ऊँचे साहित्य की आवश्यकता हुआ करती है। ज्यों-ज्यों देश का साहित्य ऊँचा होता जाता है, त्यों-त्यों देश भी उन्नति करता जाता है। देशभक्त, चाहे वे निरे समाज-सुधारक हों अथवा राजनीतिक नेता, सबसे अधिक ध्यान देश के साहित्य की ओर दिया करते हैं।

शहीद भगत सिंह को आज भी ज्यादातर लोग क्रान्तिकारी संगठनकर्ता के रूप में जानती है। यह कम ही लोगों को पता है कि वह गंभीर अध्येता ही नहीं, प्रगतिशील पत्रकार और गंभीर रचनाकार भी थे। उनके प्राणों की तरह उनका साहित्य भी अंग्रेजों की साजिश का शिकार हो गया था। हाल के कुछ वर्षों में जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, संगठनों, प्रकाशकों ने भगतसिंह और उनके साथियों का साहित्य आम जनता तक पहुँचाया है, उनके विचारों से आम आदमी के अवगत होने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई है। ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’, उनके महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ और जेल नोटबुक आदि आज लाखों पाठकों के हाथों तक पहुंच चुके हैं। भगत सिंह कहते हैं कि नौजवान जब भी जागे हैं, इतिहास ने करवट बदली है। आजादी के आंदोलन के दौरान सन् 1924 में पंजाब में जब भाषा का विवाद चल रहा था, पंजाबी भाषा की लिपि के प्रश्न पर उर्दू और हिन्दी के पक्षधरों में बहस के दौरान पंजाब हिन्दी साहित्य सम्मेलन के आमन्त्रण पर भगतसिंह ने भी एक लेख लिखा, जिस पर उनको 50 रुपए का इनाम भी मिला था। बाद में शहीदे आजम का वह लेख पंजाबी हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमन्त्री भीमसेन विद्यालंकार ने 28 फ़रवरी, 1933 के ‘हिन्दी सन्देश’ में प्रकाशित किया था। उस लेख में भगत सिंह लिखते हैं- 'किसी समाज अथवा देश को पहचानने के लिए उस समाज अथवा देश के साहित्य से परिचित होने की परमावश्यकता होती है, क्योंकि समाज के प्राणों की चेतना उस समाज के साहित्य में भी प्रतिच्छवित हुआ करती है।....

किसी भी जाति के उत्थान के लिए ऊँचे साहित्य की आवश्यकता हुआ करती है। ज्यों-ज्यों देश का साहित्य ऊँचा होता जाता है, त्यों-त्यों देश भी उन्नति करता जाता है। देशभक्त, चाहे वे निरे समाज-सुधारक हों अथवा राजनीतिक नेता, सबसे अधिक ध्यान देश के साहित्य की ओर दिया करते हैं। यदि वे सामाजिक समस्याओं तथा परिस्थितियों के अनुसार नवीन साहित्य की सृष्टि न करें तो उनके सब प्रयत्न निष्फल हो जायें और उनके कार्य स्थायी न हो पायें।...कबीर के साहित्य के कारण उनके भावों का स्थायी प्रभाव दीख पड़ता है। आज तक उनकी मधुर तथा सरस कविताओं को सुनकर लोग मुग्ध हो जाते हैं।...ठीक यही बात गुरु नानकदेव जी के विषय में भी कही जा सकती है। सिक्ख गुरुओं ने अपने मत के प्रचार के साथ जब नवीन सम्प्रदाय स्थापित करना शुरू किया, उस समय उन्होंने नवीन साहित्य की आवश्यकता भी अनुभव की और इसी विचार से गुरु अंगददेव जी ने गुरुमुखी लिपि बनायी। शताब्दियों तक निरन्तर युद्ध और मुसलमानों के आक्रमणों के कारण पंजाब में साहित्य की कमी हो गयी थी। हिन्दी भाषा का भी लोप-सा हो गया था। इस समय किसी भारतीय लिपि को ही अपनाने के लिए उन्होंने कश्मीरी लिपि को अपना लिया। तत्पश्चात गुरु अर्जुनदेव जी तथा भाई गुरुदास जी के प्रयत्न से आदिग्रन्थ का संकलन हुआ। अपनी लिपि तथा अपना साहित्य बनाकर अपने मत को स्थायी रूप देने में उन्होंने यह बहुत प्रभावशाली तथा उपयोगी क़दम उठाया था।'

भारत के लिए तू हुआ बलिदान भगत सिंह।

था तुझको मुल्को-कौम का अभिमान भगत सिंह।

फांसी पै चढ़के तूने जहां को दिखा दिया,

हम क्यों न बने तेरे कदरदान भगत सिंह।

भगत सिंह का मानना था कि 'क़ानून की पवित्रता तभी तक बनी रह सकती है जब तक की वह लोगों की इच्छा की अभिव्यक्ति करे।...स्वतंत्रता सभी का एक कभी न ख़त्म होने वाला जन्म-सिद्ध अधिकार है। श्रम समाज का वास्तविक निर्वाहक है। मैं एक मानव हूँ और जो कुछ भी मानवता को प्रभावित करता है उससे मुझे मतलब है। सुधार तो युवकों के परिश्रम, साहस, बलिदान और निष्ठा से होते हैं, जिनको भयभीत होना आता ही नहीं और जो विचार कम और अनुभव अधिक करते हैं। आजादी की लड़ाई में सबसे ज्यादा छात्र ही तो अगली पांतों में लड़ते हुए शहीद हुए।'

दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उलफत,

मेरी मिट्‌टी से भी खुशबू-ए वतन आएगी।

भगत सिंह ने उन दिनो अमेरिका में पढ़ रहे अपने मित्र अमरचन्द को 1927 में प्रेषित पत्र में लिखा था कि 'अर्ज़ है कि इस दफ़ा अचानक माँ के बीमार होने पर इधर आया और आपकी मोहतरिमा वाल्दा (आदरणीया माँ) के दर्शन हुए। आपका ख़त पढ़ा। इनके लिए यह ख़त लिखा। साथ ही दो-चार अल्फ़ाज़ लिखने का मौक़ा मिल गया। क्या लिखूँ, करम सिंह विलायत गया है, उसका पता भेजा जा रहा है। अभी तो उसने लिखा है कि लॉ पढ़ेगा, मगर कैसे चल रहा है, सो ख़ुदा जाने, ख़र्च बहुत ज़्यादा हो रहा है। भाई, हमारी मुमालिक ग़ैर (विदेश) में जाकर तालीम हासिल करने की ख़्वाहिश ख़ूब पायमाल (बरबाद) हुई। अच्छा, तुम्हीं लोगों को सब मुबारक़, कभी मौक़ा मिले तो कोई अच्छी-अच्छी क़ुतब (पुस्तकें) भेजने की तकलीफ़ उठाना। आख़िर अमेरिका में लिट्रेचर तो बहुत है। ख़ैर, अभी तो अपनी तालीम में बुरी तरह फँसे हुए हो। सानफ्रांसिस्को वग़ैरह की तरफ़ से सरदारजी (अजीत सिंह जी) का शायद कुछ पता मिल सके। कोशिश करना। कम अज़ कम ज़िन्दगी का यक़ीन तो हो जाये। मैं अभी लाहौर जा रहा हूँ। कभी मौक़ा मिले तो ख़त तहरीर फ़रमाइयेगा। पता सूत्र मण्डी लाहौर होगा। और क्या लिखूँ? कुछ लिखने को नहीं है। मेरा हाल भी ख़ूब है। बारहा (कई बार) मुसायब (मुसीबतों) का शिकार होना पड़ा। आख़िर केस वापस ले लिया गया। बादवाँ (बाद में) फिर गिरफ्तार हुआ। साठ हज़ार की जमानत पर रिहा हूँ। अभी तक कोई मुक़दमा मेरे ख़िलाफ़ तैयार नहीं हो सका और ईश्वर ने चाहा तो हो भी नहीं सकेगा। आज एक बरस होने को आया, मगर जमानत वापस नहीं ली गयी। जिस तरह ईश्वर को मंज़ूर होगा। ख़्वाहमख़्वाह तंग करते हैं। भाई, ख़ूब दिल लगाकर तालीम हासिल करते चले जाओ। अपने मुताल्लिक और क्या लिखूँ, ख़्वाहमख़्वाह शक का शिकार बना हुआ हूँ। मेरी डाक रुकती है। ख़तूत खोल लिये जाते हैं। न जाने मैं कैसे इस क़दर शक की निगाह से देखा जाने लगा। ख़ैर भाई, आख़िर सच्चाई सतह पर आयेगी और इसी की फतह होगी।'

आलोक रंजन बताते हैं कि आज भी इस देश के शिक्षित लोगों का एक बड़ा हिस्सा भगत सिंह को एक महान वीर तो मानता है, पर वह नहीं जानता कि 23 वर्ष का वह युवा एक महान चिन्तक भी था। राजनीतिक आज़ादी मिलने के पचास वर्षों बाद भी सम्पूर्ण गाँधी वाङमय, नेहरू वाङमय से लेकर सभी राष्ट्रपतियों के अनुष्ठानिक भाषणों के विशद्ग्रन्थ तक प्रकाशित होते रहे पर किसी भी सरकार ने भगत सिंह और उनके साथियों के सभी दस्तावेज़ों को अभिलेखागार, पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तिगत संग्रहों से निकालकर छापने की सुध नहीं ली। छिटपुट पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों, अजय कुमार घोष, शिव वर्मा, सोहन सिंह जोश, जितेन्द्र नाथ सान्याल आदि भगत सिंह के समकालीन क्रान्तिकारियों की विभिन्न पुस्तकों-लेखों, भगत सिंह के अनुज की पुत्री वीरेन्द्र सिन्धु की पुस्तकों तथा गोपाल ठाकुर, जी. देवल, मन्मथनाथ गुप्त, बिपन चन्द्र, हंसराज रहबर, कमलेश मोहन आदि इतिहासकारों-लेखकों के विभिन्न लेखों एवं पुस्तकों से भगत सिंह के विचारक व्यक्तित्व पर रोशनी अवश्य पड़ती रही है, पर बहुसंख्यक शिक्षित आबादी भी इससे बहुत कम ही परिचित रही है। भगत सिंह के कुछ ऐतिहासिक बयानों-दस्तावेज़ों को सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध में दिल्ली से कुछ संस्कृतिकर्मियों की पहल पर प्रकाशित होने वाली ‘मुक्ति’ पत्रिका ने प्रकाशित किया। इसके बाद कई पत्रिकाओं ने और ग्रुपों ने पुस्तिकाओं के रूप में भगत सिंह के चुने हुए कुछ लेखों को छापने का काम किया। भगत सिंह के साथी शिववर्मा ने उनके चुनिन्दा लेखों का संकलन अंग्रेज़ी और हिन्दी में प्रकाशित किया। मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर तक़ी मीर, डॉ मुहम्मद इकबाल आदि भगत सिंह के प्रिय शायरों में थे। शहीदे आजम को मिर्ज़ा ग़ालिब की ये ग़ज़ल काफी पसंद थी -

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता।

अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता।

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना,

कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता।

तिरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहद बोदा,

कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता।

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को,

ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह,

कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता।

रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता,

जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता।

ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है,

ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता।

कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है,

मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।

हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया,

न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता।

उसे कौन देख सकता कि यगाना है वो यकता,

जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता।

ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान 'ग़ालिब',

तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मीर तक़ी मीर की ये पंक्तियां भी शहीदे आजम के पसंदीदा शेरों में शुमार होती हैं -

ऐ हुबे-जाह वालो जो आज ताजवर है।

कल उसको देखीयो तुम न ताज है न सर है।

अब के हवा-ए-गुल में सेराबी है निहायत,

जू-ए-चमन पे सबज़ा मिज़गाने-चशमेतर है।

इससे स्पष्ट होता है कि भगत सिंह देश पर कुर्बान होने वाले अमर क्रांतिकारी ही नहीं, साहित्य में भी उनकी गहरी रुचि थी। आलोक रंजन के मुताबिक भगत सिंह के कई साथियों और इतिहासविदों ने भी इस बात का समय समय पर उल्लेख किया है कि जेल में उन्होंने चार पुस्तकें लिखी थीं- ‘आत्मकथा’, ‘समाजवाद का आदर्श’, ‘भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन’ तथा ‘मृत्यु के द्वार पर’। 

दुर्भाग्यवश उनकी पाण्डुलिपियाँ आज उपलब्ध नहीं हैं और माना जाता है कि वे नष्ट हो चुकी हैं। हालाँकि उनके ग़ायब होने की कहानी भी रहस्यमय है और इसमें भी किसी साजिश से पूरी तरह इन्कार नहीं किया जा सकता है। बहरहाल, यह भारतीय इतिहास के सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंगों में से एक है।

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