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गांव के बच्चों को अंग्रेज़ी सिखाने के साथ-साथ युवाओं को रोज़गार भी दे रहा यह स्टार्टअप

5th Dec 2018
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इस स्टार्टअप ने पश्चिम बंगाल में 14 सेंटर्स की शुरुआत कर दी है, जहां पर लगभग 600 ग्रामीण बच्चों को स्पोकन इंग्लिश सिखाई जा रही है। इतना ही नहीं, पूरे प्रदेश के 8 ग्रामीण स्कूलों ने कृषवर्क्स का पाठ्यक्रम अपनाया है।

कृषवर्क्स की टीम बच्चों के साथ

कृषवर्क्स की टीम बच्चों के साथ


टीम ने कोलकाता के एक कैफ़े के बाहर अपने प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया। यहीं पर उनकी मुलाक़ात आईआईएम इनोवेशन पार्क के इनवेंट प्रोग्राम के हेड गौरव कपूर से हुई। 

कोलकाता स्थित स्टार्टअप कृषवर्क्स ग्रामीण इलाकों के व्यवसाइयों के सहयोग से इंग्लिश लर्निंग सेंटर का संचालन करवाता है, जिनमें ग्रामीण इलाकों के बच्चे स्कूल के बाद लैंग्वेज स्किल्स को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं। इन सेंटर्स में टैबलेट पर सॉफ़्टवेयर के माध्यम से बच्चों को पढ़ाया जाता है। इन टैबलेट्स को चलाने के लिए इंटरनेट की आवश्यकता नहीं होती। 32 वर्षीय शुभजीत रॉय और 26 वर्षीय गार्गी मज़ुमदार ने 2015 में कृषवर्क्स की शुरुआत की थी।

मास्टर डिग्री होने के बावजूद सुमॉन मंडल ने ट्रेनों में किताबें बेचने का काम किया। उनका हमेशा से ही ऑन्त्रप्रन्योर बनने का सपना था, लेकिन उन्हें इस बात की समझ नहीं थी कि शुरुआत कहां से की जाए। इत्तेफ़ाक़ से उनकी मुलाक़ात कृषवर्क्स के को-फ़ाउंडर शुभजीत रॉय से हुई, जिन्होंने सपना पूरा करने में सुमॉन की मदद की।

शुभजीत बताते हैं कि उनके स्टार्टअप का उद्देश्य न सिर्फ़ ग्रामीण इलाकों के बच्चों को शिक्षित करना है, बल्कि वह इसके माध्यम से युवाओं को रोज़गार भी दिलाना चाहते थे। उन्होंने कहा, "हम माइक्रो-ऑन्त्रप्रन्योर्स तैयार करना चाहते थे, जो हमारी तकनीक की मदद से गांवों के बच्चों को इंग्लिश पढ़ाएं। हमारे देश में पढ़े-लिखे युवाओं की कोई कमी नहीं है। कमी है तो उनके अंदर सही कौशल और आत्मविश्वास की। हमारी मुहिम की मदद से न सिर्फ़ ग्रामीण बच्चों को लाभ मिलेगा बल्कि इन युवाओं के स्किल्स भी बेहतर हो सकेंगे।"

स्टार्टअप का कहना है कि महज़ एक साल के वक़्त में उन्होंने पूरे पश्चिम बंगाल में 14 सेंटर्स की शुरुआत कर दी है, जहां पर लगभग 600 ग्रामीण बच्चों को स्पोकन इंग्लिश सिखाई जा रही है। इतना ही नहीं, पूरे प्रदेश के 8 ग्रामीण स्कूलों ने कृषवर्क्स का पाठ्यक्रम अपनाया है। स्टार्टअप को आईआईएम कोलकाता, सिग्मा आईकेपी ईडेन और इंडियन स्कूल ऑफ़ बिज़नेस डीलैब्स (हैदराबाद) से सहयोग मिल चुका है। हाल में, आईआईएम अहमदाबाद और टाटा ट्रस्ट सोशल अल्फ़ा के माध्यम से इसे वित्तीय सहायता मिल रही है।

2014 में शुभजीत और गार्गी ने तय किया कि वे ग्लोबल लर्निंग एक्स प्राइज़ प्रतियोगिता में हिस्सा लेंगे और इसके माध्यम से तकनीकी स्किल्स को बेहतर बनाने के लिए लोगों को प्रेरित करेंगे। उन्होंने अपनी 25 सदस्यों वाली टीम का 'कृष्णा' तय किया और इस टीम ने बिना किसी फ़ीस के प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया। इस दौरान वे अलग-अलग कंपनियों में नौकरियां भी करते रहे।

गांव के लोगों के साथ कृषवर्क्स की टीम

गांव के लोगों के साथ कृषवर्क्स की टीम


टीम को एक गेम तैयार करना था, जो ओपन-सोर्स सॉफ़्टवेयर पर आधारित हो और टैबलेट पर बिना इंटरनेट के भी चल सकता हो। इन गेम्स के मारफ़त तंज़ानिया के स्थानीय स्कूलों के बच्चों को बिना शिक्षक के पढ़ाया जाना था। टीम कृष्णा ने गुरुकुल नाम से एक टैबलेट आधारित सॉफ़्टवेयर विकसित किया। इस टीम का चयन पूरी दुनिया की 30 सबसे सर्वश्रेष्ठ टीमों में हुआ।

इस प्रतियोगिता के बाद शुभजीत और गार्गी ने अपनी फ़ुल-टाइम जॉब छोड़ने और भारत के ग्रामीण बच्चों के लिए ऐसा सॉफ़्टवेयर तैयार करने का फ़ैसला लिया। उनके दो अन्य साथियों कौशिक मज़ुमदार और बालगोपाल केवी ने भी इस मुहिम में उनका साथ दिया। सबसे पहले कृषवर्क्स ने सुंदरबन इलाके में एनजीओ के अंतर्गत चल रहे स्कूलों में पायलट रन शुरू किया। इन स्कूलों में शिक्षकों को सिर्फ़ 1,200 रुपए महीने का वेतन मिलता था। शुभजीत ने पाया कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक उन्हें मुफ़्त में स्कूल भेजना चाहते थे, लेकिन ट्यूशन के नाम पर वह कितना भी पैसा खर्च करने के लिए तैयार थे और इसलिए एक बच्चे को स्कूल के सभी शिक्षक ट्यूशन पढ़ाने जाते थे।

टीम ने कोलकाता के एक कैफ़े के बाहर अपने प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया। यहीं पर उनकी मुलाक़ात आईआईएम इनोवेशन पार्क के इनवेंट प्रोग्राम के हेड गौरव कपूर से हुई। गौरव ने उन्हें सलाह दी कि वे ग्रामीण इलाकों के बच्चों के लिए कुछ काम करें और अपनी मुहिम के माध्यम से माइक्रो-ऑन्त्रप्रन्योर्स तैयार करने पर ज़ोर दें।

टैबलेट में अंग्रेजी सीखते बच्चे

टैबलेट में अंग्रेजी सीखते बच्चे


शुरुआती दिनों में टीम को फ़ंडिंग की काफ़ी समस्या आई। गांव के लोग उनके प्रोडक्ट को पसंद तो कर रहे थे, लेकिन कोई भी टैबलेट को इस्तेमाल करने की फ़ीस नहीं देना चाहता था। शुभजीत बताते हैं कि उनकी टीम को पता था कि सरकार द्वारा पहले ही आकाश टैबलेट्स बांटे जा चुके हैं, लेकिन स्कूलों में उन टैबलेट्स का कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा था। शुभजीत बताते हैं कि उनके पास जानकारी थी कि इन टैबलेट्स के साथ कई तरह की समस्याएं आ रही थीं, जिनकी वजह से लोग इनके इस्तेमाल से कतरा रहे थे। शुरुआत में कृषवर्क्स बच्चों को गणित पढ़ाता था, लेकिन अभिभावकों की ख़ास रुचि न होने की वजह से उन्होंने स्पोकेन इंग्लिश पढ़ाना शुरू किया।

कृषवर्क्स ने कई माइक्रो-ऑन्त्रप्रन्योर्स तैयार किए, जिन्हें टैबलेट ख़रीदने के लिए 20 हज़ार रुपए खर्च करने होते हैं। इस टैबलेट में कॉन्टेन्ट और गेम्स पहले से मौजूद होते हैं। बच्चे मात्र 200 रुपए की मासिक फ़ी पर कोर्स में हिस्सा ले सकते हैं और हर सेंटर पर अधिकतम 192 बच्चों को पढ़ाया जा सकता है।

कृषवर्क्स की योजना है कि पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में 50 सेंटर्स खोले जाएं। शुभजीत चाहते हैं कि इस मुहिम के ज़रिए आने वाले 7 सालों में 1 करोड़ बच्चों तक पहुंचा जाए। फ़िलहाल कृषवर्क्स क्राउडफ़ंडिंग के माध्यम से फ़ंडिंग जुटा रहा है।

यह भी पढ़ें: 1 लाख लगाकर शुरू की थी कंपनी, दो साल में टर्नओवर 12 करोड़ पार

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