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'माई क्लासरूम', शिक्षा के क्षेत्र में कमाल का आइडिया

Harish Bisht
18th Jun 2015
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30 हजार से ज्यादा छात्र कर रहे हैं इसका इस्तेमाल...

वैश्विक स्तर पर 56.2 बिलियन डॉलर का कारोबार...

“माई क्लासरूम” को मिला राष्ट्रीय शिक्षा उत्कृष्टता पुरस्कार, 2014...


शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए लोग बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं लेकिन हकीकत में ये काम कुछ ऐसे लोग कर रहे हैं जो बातों से नहीं अपने काम से इसको अंजाम तक पहुंचाने में जुटे हैं। किसी भी स्कूल की क्लास में 30 बच्चे किसी खास विषय पर बातचीत करते हैं तो दूसरे सेक्शन में बैठे बच्चे उसमें शामिल नहीं हो सकते। तो वहीं टीचर को भी तय वक्त में बच्चों को पढ़ाने की जल्दी होती है, इस दौरान वो घर के लिए भी काम देते हैं। ये एक नीरस प्रकिया है। “माई क्लासरूम” ने इसी समस्या का तोड़ निकाला है। ये ना सिर्फ इन दिक्कतों को दूर करता है बल्कि ये क्लासरूम को नया अनुभव प्रदान करता है।

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“माई क्लासरूम” में सोशल नेटवर्किंग और ई-लर्निंग का ताकतवर मिश्रण है। जो पारंपरिक क्लास में दी जाने वाली शिक्षा और सीखने की कला को ऑनलाइन प्लेटफार्म उपलब्ध कराता है। “माई क्लासरूम” के सह-संस्थापक नटराज के मुताबिक “दूसरे शब्दों में इसे स्मार्ट जगह पर स्मार्ट तरीके से पढ़ना भी कह सकते हैं।” इसको शुरू करने की वजह छात्रों की मदद के लिए विविधता के साथ बातचीत के लिए एक बड़ा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना है। जिसमें विभिन्न भौगोलिक क्षेत्र और संस्कृतियों का सहयोग हो। नटराज के मुताबिक माई क्लासरूम का विचार उनको तब आया जब वो एमबीए कर रहे थे। उनको इस बात का एहसास था कि अच्छे संगठन मैसिव ऑनलाइन ओपन कोर्स की अवधारणा पर काम कर रहे हैं और ये सब बस एक दूसरे की मदद के लिए। जबकि इसकी शुरूआत इसलिए की गई थी कि दुनिया भर में समान विचारधारा वाले लोगों को एक साथ जोड़ा जाए। इनके इस प्लेटफॉर्म में कोई भी चीज सीखने वाले से जुड़ी हो ना कि कन्टेन्ट केंद्रीत हो। इनके मुताबिक लर्निंग एक बातचीत और एक अनुभव है।

“माई क्लासरूम” की स्थापना सौंदर्न नटराजन और नटराज ने मिलकर की थी। सौंदर्न के पास तकनीक के क्षेत्र का 22 साल का लंबा अनुभव है। उन्होने अपने करियर की शुरूआत ओरेकल कॉरपोरेशन से की थी जिसके बाद उन्होने Quest America Inc. के लिए काम किया। जबकि नटराज सॉफ्टवेयर ऑर्किटेक्ट रहे हैं जिन्होने यूएस फेडरल एजेंसी एफएए और ईपीए के अलावा जॉर्ज वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के लिए काम किया है। ये दोनों एक दूसरे को पिछले दस सालों से जानते हैं। इन लोगों की टीम में आठ सदस्य हैं और ये लोग कोयंबट्टूर और बेंगलौर में काम कर रहे हैं लेकिन ज्यादातर काम इनका कोयंबट्टूर से होता है। “माई क्लासरूम” में मुख्य रूप से तीन बातों का खास ध्यान रखा गया है।

1. लोगों की बुद्धि- वैश्विक स्तर पर ऐसे लोगों को जोड़ना जो एक से क्षेत्र में पढ़ाई कर रहे हों।

2. अच्छी सहायक सामग्री – छात्र के प्रोफाइल के आधार पर जरूरी जानकारी मुहैया कराना ताकि छात्र का ना सिर्फ समय बच सके बल्कि प्रभावी तरीके से उसको जानकारी भी मिले।

3. ऐप के माध्यम से आनुभविक शिक्षा- छात्र को अपने विचारों के माध्यम से वैश्विक हालात के लायक समर्थ बनाना।

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फिलहाल “माई क्लासरूम” का ध्यान उच्च शिक्षा पर है लेकिन स्कूली स्तर पर भी इन लोगों ने कुछ पॉयलट तैयार किये हैं। फिलहाल इनके साथ कई शैक्षिक संस्थान जुड़े हुए हैं जिनके कोर्स ऑनलाइन मौजूद हैं। एक अनुमान के मुताबिक वैश्विक स्तर पर साल 2011 में सेल्फ पेस्ड ई-लर्निंग का कारोबार करीब 35.6 बिलियन डॉलर का था जो बढ़कर 56.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है और साल 2015 के अंत तक इसके दोगुना होने की उम्मीद है।

“माई क्लासरूम” की शुरूआत जुलाई 2011 में हुई थी, तब इनके इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल 30 हजार छात्र कर रहे थे। साल 2012 में इन लोगों ने वीटीयू के साथ ई-लर्निंग के लिए एमओयू साइन किया। जिसके तहत वीटीयू के 175 मान्यता प्राप्त संस्थानों को ये लोग माई क्लासरूम के साथ वीडियो कंटेंट भी मुहैया करा रहे हैं। पिछले साल इन लोगों ने फैक्लटी वीडियो लेक्चर प्रतियोगिता का भी आयोजन किया था जिसमें सबसे अच्छे वीडियो लेक्चर को सम्मानित भी किया गया। जबकि एसोचैम की ओर से साल 2014 का राष्ट्रीय शिक्षा उत्कृष्टता पुरस्कार “माई क्लासरूम” की टीम को दिया गया।

“माई क्लासरूम” की टीम का मानना है कि इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी आय को बढ़ाना है। इन लोगों की कोशिश ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने की है जो विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े हुए हैं। फिलहाल ये बाजार बिखरा हुआ है। इसलिए इसमें पैठ बनाना काफी मेहनत का काम है। साथ ही प्रतिभाशाली लोगों को साथ जोड़ना प्रमुख चुनौतियों में से एक है। इन लोगों का मानना है कि हर रोज बदलाव हो रहे हैं ऐसे में इन लोगों को भी निरंतर बदलना पड़ता है।

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