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'संस्थापक को खुद पर करना होगा भरोसा, तब आएंगे निवेशक'

Aamir Ansari
31st Oct 2015
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सिकोईया कैपिटल के प्रबंध निदेशक शैलेंद्र सिंह कहते हैं कि निवेश का कभी सही या गलत समय नहीं होता. बस आपको जरूरत होती है एक जोशीले संस्थापक, एक महान व्यापार विचार और साथ ही उतनी ही जुनूनी टीम की, जो वास्तव में साथ मिलकर उसी तरह से काम करे.

श्रद्धा शर्मा के साथ शैलेेंद्र सिंह

श्रद्धा शर्मा के साथ शैलेेंद्र सिंह


टेकस्पार्क 2015 में गर्मजोशी के साथ बातचीत में शैलेंद्र अपने सुझाव में बहुत स्पष्ट थे जब उनसे कथित तौर पर फूडटेक और हाइपरलोकल जैसे क्षेत्रों में निवेश में मंदी के बारे में पूछा गया. वे कहते हैं, ‘ठीक है, कुछ काले बादल हैं लेकिन कोई नहीं जानता की सिर्फ बूंदा बांदी होगी या फिर कोई तूफान भी आने वाला है. लेकिन बुद्धिमानी इसी में है कि आपके पास अपनी छतरी हो.’ इसके बाद बातचीत इस तरफ आ गई कि आंत्रप्रेन्योर्स फंड रेजिंग किस तरह से करें. शैलेंद्र कहते हैं कि निवेशक की रूचि को मापने का यह तरीका सही नहीं है कि एक विशेष समय में लोग किसे पसंद कर रहे हैं. उपभोक्ताओं की जरूरतें विकसित होती रहती हैं और इसलिए एक कंपनी को उन जरूरतों को प्रयोगात्मक तरीके से पूरी करने की कोशिश करनी चाहिए.

शैलेंद्र किसी स्टार्टअप में निवेश करने के पहले क्या देखते हैं? इसके जवाब में शैलेंद्र कहते हैं कि अक्सर शुरुआत संस्थापक से ही होती है. वे कहते हैं, ‘जब मैंने शुरुआत की (और तब) बहुत जवान था. उस दौरान कुछ चेकबॉक्स थे. मुझे लगता है कि ज्यादातर युवा इसी तरह की सोच से शुरुआत करते हैं. मुझे हमेशा से यही लगता है कि जिंदगी में सबसे उत्तम वस्तु को आप माप नहीं सकते और इसी तरह आप किसी स्टार्टअप को मेट्रेकिस से माप नहीं सकते.’ तो फिर शैलेंद्र के लिए कौन सी ट्रिक काम करती है, जुनून, स्पष्टता, रसायन और संस्थापक टीम की प्रेरणा. वे बताते हैं कि यह सेंसिंग प्रक्रिया है जो इस तरह के सवाल दागती है, ‘क्या हम इस वेंचर में 5-10 सालों तक निवेश करेंगे.’ उनके मुताबिक बहुतों के लिए एक कंपनी को विकसित करने के लिए निवेश करना ‘सेक्सी’ चीज जैसा लगता है. लेकिन वहां बहुत कड़ी मेहनत होती है जिसकी वे प्रशंसा करने में विफल रहते हैं.’

शैलेंद्र को सिकोईया कैपिटल के साथ जुड़े हुए दस साल हो गए हैं. शैलेंद्र आसानी से एक या दो गड़बड़ आइडिया को भांप लेते हैं. वे उन्हें किस तरह से अलग करते हैं? शैलेंद्र तुरंत जवाब देते हैं, ‘अतिरंजित मेट्रिक्स.’ एक निवेशक के तौर पर वे मानते हैं कि संस्थापक पर भरोसा बनाना बेहद जरूरी है.

एक धारणा है कि आईआईटी और आईआईएम के पूर्व छात्रा द्वारा शुरू किए स्टार्टअप्स को ही ज्यादातर फंडिंग मिलती है. इस धारणा को शैलेंद्र सिरे से नकारते हैं. वे कहते हैं, ‘मैं इससे पूरी तरह से असहमत हूं. फ्रीरिचार्ज के कुणाल शाह दर्शनशास्त्र में ग्रैजुएट हैं. प्रैक्टो के शशांक एनआईटी-के के स्नातक है. हेल्पचैट के अंकुर सिंगला पेशे से वकील हैं. और ओयो रूम्स के रितेश कभी कॉलेज गए ही नहीं. मैं ऐसा मानता हूं कि अगर आपको कुछ सीखने की ललक है तो आप किसी भी चीज को पूरा कर सकते हैं.’ उनकी कल्पना में स्टार्टअप इकोसिस्टम एक रेस ट्रैक जैसी है और उसके संस्थापक एथलीट जैसे हैं. उनके मुताबिक महान संस्थापक अगली बड़ी उपलब्धि को हासिल करने के लिए गहरा जुनून रखते हैं. हमने उनसे पूछा कि कौन से क्षेत्र ऐसे हैं जो अभी लोकप्रिय हैं और निवेश के लिए आकर्षक हैं.? उन्होंने कहा कि अगर संस्थापक के दिमाग में कोई क्षेत्र लोकप्रिय नहीं है तो वह कहीं भी लोकप्रिय नहीं है. 2007 में फैशन की ही चर्चा थी. आज कुछ और है. हालांकि, वे कहते हैं अगर किसी चीज को चुनना होगा तो वह ‘मोबाइल’ है जिसमें वह अपना पैसा लगाना चाहेंगे, जो कि बहुत ही सरल है, जिसकी विकास दर वर्टिकिल है. दूसरा फिनटेक जहां भुगतान बैंकों के साथ नियमों में बदलाव हो रहा है. कुछ स्टार्टअप को शैलेंद्र म्यूटेंट की तरह परिभाषित करते हैं. कुछ मामलों में एक दूसरे के समान लेकिन बिजनेस मॉडल में थोड़ी बहुत बदलाव के साथ. उस पहलू में उन्होंने कहा, भारत एक विविध बाजार है जहां बहुत सारे ऐसे म्यूटेंट्स बनेंगे. उन्होंने जोर देकर कमरे में बैठे आंत्रप्रेन्योर्स से कहा कि बहुत सी श्रेणियों में ऐसा सोचा जाता है कि यह हो चुका है लेकिन वास्तव में वहां कुछ नहीं हुआ होता. दर्शकों में से एक यह जानना चाहते थे कि, ‘क्या वेंचर कैपिटलिस्ट स्टार्टअप को ज्यादा पैसे खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.? शैलेंद्र ने कहा कि कई मामले में वे ऐसा करते आए हैं. लेकिन ज्यादातर इस पर निर्भर करता है कि निर्माण के लिए कितना पैसा बचा है. वे कहते हैं, ‘अगर आप कैपिटल रेज नहीं करेंगे तो पीछे छूट जाएंगे. खासकर जब आप क्रियान्वयन की श्रेणी में काम कर रहे हो. डार्विन का सिद्धांत यहां अपना काम करता है.’ एथलीटों के उदाहरण पर वापस लौटते हुए वे विस्तार से बताते हैं, ‘आपके निवेशक कह सकते हैं चलो तेज दौड़ लगाए (बढ़ने के लिए पूंजी खर्च) तो हम फिर दोबारा जांच पड़ताल करेंगे और मजबूत मांसपेशी का निर्माण करेंगे.

फ्रीरिचार्ज, हेल्पचैट, जस्ट डायल, प्रैक्टो, म्यू सिगमा, पेपरटैप, जूमकार जैसी कंपनियों को जब सिकोईया का समर्थन हासिल है तो स्टार्टअप्स ऐसे विशेषज्ञ की बात गौर से सुन रहे थे. उनकी राय सही मायनों में सुनने लायक जो थी.

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