संस्करणों

माँ के संस्कारों और पत्नी के त्याग ने बनाया बिक्रम दासगुप्ता को अनूठा और कामयाब उद्यमी

बिक्रम के उद्यमी बनने के सपना को पूरा करने के लिए पत्नी ने बेचे थे अपने गहने  

Arvind Yadav
4th Jan 2017
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“मेरी कहानी ‘कौड़ी से करोड़पति’ बनने की नहीं है, बल्कि मेरी कहानी भारत के मध्यमवर्गीय लोगों के अरमानों की कहानी है। मेरी कहानी में न वो ड्रामा है और न फ़िल्मी स्टाइल वाला वो घटनाक्रम है जोकि ‘कौड़ी से करोड़पति’ की कहानियों में होता है। लेकिन, हाँ, मेरी कहानी में संघर्ष है। विपरीत परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की कोशिश करने का ज़ज्बा है। कुछ नया और बड़ा करने की अज़ब-सी बेचैनी है। मेरी कहानी में लाखों लोगों के बीच अपनी बेहद ख़ास पहचान बनाने का जुनून है।” ये बातें हैं भारत के प्रमुख उद्यमी और कारोबारी बिक्रम दासगुप्ता की। बिक्रम ने भारत में कंप्यूटर क्रांति को कामयाब बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है। वे भी आज़ाद भारत में पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं। इस उद्यमी ने सूचना-प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में ऐसे काम और प्रयोग किये जिसके बारे में पहले किसी ने सोचा भी न था। समाज और देश को फायदा पहुंचाने वाली कामयाबियों की वजह से इस अनुभवी उद्यमी का नाम सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बेहद आदर के साथ लिया जाता है।

बिक्रम दासगुप्ता की कामयाबी की कहानी भी आसाधरण है और कईयों को प्रेरणा देने की ताकत रखती है। आमतौर पर जहाँ भारत में मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने वाले ज्यादातर लोगों का सपना एक अच्छी और पक्की नौकरी तक ही सीमित रह जाता है वहीं बिक्रम दासगुप्ता की कहानी इन सपनों को बदलने और बड़े-बड़े और नए सपने देखने को प्रेरित करती है। ये कहानी सुरक्षित नौकरी के चक्कर में अपने अरमानों को दबा देने वाले युवाओं को कुछ नया और बड़ा कर गुजरने के लिए प्रोत्साहित करती है। अगर बिक्रम चाहते तो वे भी मज़े में नौकरी करते हुए अपना जीवन आराम से गुज़ार सकते थे। लेकिन, उन्होंने जोखिम उठाया। बिक्रम जब ये बात जान गए कि बिना जोखिम उठाये उद्यमी नहीं बना जा सकता है जब उन्होंने भी जोखिम उठाया। जोखिम उठाते-उठाते जब वे ये सीख गए कि जोखिम उठाये बगैर अद्वितीय सफलता नहीं मिलती है तब उन्होंने जोखिम उठाने को अपनी आदत बना लिया। संघर्ष हमेशा बिक्रम की ज़िंदगी का हिस्सा रहा है। लेकिन मेहनत, लगन, कारोबारी सूझबूझ और हार न मानने के ज़ज्बे से बिक्रम ने कामयाबी की राह पर खुद को कभी रुकने या थकने नहीं दिया।

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ऊंचा मुकाम पाने के लिए आसान रास्ता छोड़कर चुनौतियों से भरे मुश्किल रास्ते पर चलने की प्रेरणा देने वाली बिक्रम दासगुप्ता की कहानी एक मध्यमवर्गीय बंगाली परिवार में शुरू होती है जहाँ उनका जन्म हुआ। बिक्रम के पिता सरकारी कर्मचारी थे और माँ गृहिणी। पिता बोटैनिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट में काम करते थे, इसी वजह से बिक्रम के बचपन का ज्यादातर समय लखनऊ में बीता। दो भाईयों में बिक्रम छोटे थे। बड़े भाई और बिक्रम की उम्र में करीब साढ़े छह साल का फासला था। किसी भी सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार की तरह ही बिक्रम के घर में सख्त अनुशासन था। सड़क की बत्तियां जलने से पहले घर पहुँच जाना और रात 9 से पहले रात का भोजन कर लेना घर-परिवार के नियम-कायदों में शामिल था। जीवन सीधा-सादा था और पढ़ाई-लिखाई को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती थी। लेकिन, ऐसा भी बिलकुल नहीं था कि पढ़ाई-लिखाई के लिए माता जोर-ज़बरदस्ती करते थे। बिक्रम ने एक बेहद ख़ास बातचीत में बताया कि उन्हें अपने मन के मुताबिक काम करने की छूट थी। बिक्रम को क्रिकेट और टेबल टेनिस खेलना बहुत पसंद था और जब कभी उन्हें मौका मिलता वे खेलने में मग्न हो जाते थे।

छोटी-उम्र से ही बिक्रम को गणित में बहुत दिलचस्पी थी। दूसरे बच्चे जहाँ अंकों के खेल से घबरा जाते थे वहीं यह खेल विक्रम को अपनी ओर खींचता था। बिक्रम के कहा, “हायर सेकेण्डरी तक ज़िंदगी बहुत ही सीधी-सादी और आसान-सी थी। कोई प्रेशर नहीं था,किसी तरह का कोई प्रेशर नहीं। अगर माता-पिता को लगता कि तैयारी में कोई कमी है तो वे एग्जाम से पहले पढ़ाने के लिए घर पर एक टीचर रखवा देते थे।” दिलचस्प बात ये भी है कि बिक्रम के माता-पिता ने कभी भी ये नहीं कहा कि उन्हें बड़ा होकर डॉक्टर बनाना है या इंजीनियर। 60 और 70 के दशक में अक्सर शहरी माता-पिता अपने बच्चों से कहते थे कि उन्हें या तो डॉक्टर बनना होगा या फिर इंजीनियर। लेकिन, दूसरे मध्यमवर्गीय परिवार के अभिभावकों से उलट बिक्रम के माता-पिता ने भविष्य में क्या बनाना है, इस बात को लेकर न कोई दिशा-निर्देश दिया और न ही कोई जोर-जबरदस्ती की । बिक्रम के मुताबिक, कॉलेज में उनके दाखिले तक सब कुछ एक सामान्य प्रक्रिया की तरह हुआ। उनके शब्दों में, “कॉलेज में पहुँचने तक मेरे जीवन में कोई बड़ी घटना नहीं हुई थी, सब कुछ सामान्य था। पढ़ते गए और आगे चलते गए।”

बिक्रम शुरू से ही मेधावी छात्र रहे। हर परीक्षा में अच्छे नंबर मिले। उनसे पहले उनके परिवार में कॉलेज स्तर पर कोई भी विज्ञान का विद्यार्थी नहीं था। बिक्रम को गणित और विज्ञान में ही दिलचस्पी थी। उन्होंने अच्छे नंबरों से बारहवीं की परीक्षा भी पास की और फिर प्रवेश परीक्षा में अच्छा रैंक लाकर आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिला हासिल किया। उन दिनों में भी आईआईटी में सीट हासिल करने के लिए विद्यार्थियों में कड़ी प्रतिस्पर्धा होती थी। विज्ञान के हर विद्यार्थी का यही सपना/लक्ष्य होता था कि वो आईआईटी में सीट हासिल कर ले। बिक्रम अपनी तेज़ बुद्धि की वजह से आईआईटी में सीट हासिल करने में कामयाब हुए थे।

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बिक्रम के जीवन पर उनकी माँ का बहुत ही गहरा प्रभाव है। माँ के बारे में बताते हुए वे बहुत ही भावुक हो जाते हैं। बिक्रम ने कहा, “मेरी माँ एक आसाधारण महिला थीं और मैं जो कुछ भी हूँ उन्हीं की वजह से हूँ।” हमसे बातचीत के दौरान बिक्रम ने हमें दो घटनाएं सुनाईं और ये जताया कि माँ के दिए संस्कारों और अच्छे गुणों की वजह से वे अपनी ज़िंदगी में कामयाब हो पाए हैं। पहली घटना उस समय की है जब वे आईआईटी-खड़गपुर ले लिए रवाना हो रहे थे। उस वक्त उनकी उम्र महज 16 साल की थी। बिक्रम को खड़गपुर के लिए सियालदह रेलवे स्टेशन से गाड़ी पकड़नी थी। पहली बार ऐसा हो रहा था जब बिक्रम अकेले जा रहे थे और उन्हें आगे भी अकेले ही रहना था। आईआईटी-खड़गपुर में दाखिले से पहले बिक्रम ने कभी भी अकेले सफ़र नहीं किया था, अकेला रहना तो बहुत दूर की बात थी। वे नहीं जानते थे कि हॉस्टल की ज़िंदगी कैसे होती है, माँ-बाप से दूर रहकर किस तरह से जिया जाता है, लिहाज़ा बिक्रम कुछ घबराए हुए भी थे। माता-पिता भी ज़ज्बाती हो गए थे। बेटे को बिदा करने माँ भी स्टेशन आयी थीं। गाड़ी छूटने में समय बाकी था। इसी दौरान माँ ने बिक्रम से कुछ कहा। माँ ने उस समय सियालदह स्टेशन पर जो कुछ कहा उसका किशोर बिक्रम के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा। एक मायने में उन बातों से बिक्रम को अपने जीने का मकसद पता चल गया। माँ ने बिक्रम से कहा था, “बेटा, जहाँ तुम जा रहे हो वहाँ सब लोग तुमसे बेहतर हैं। घबराना मत, जकड़ भी मत जाना। उन सब के बीच अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करना। और हाँ, जो बात मैं अब बोलूंगी उसे कभी मत भूलना ... अगर इस दुनिया में 10 लोग रहते हैं तो तब ये दुनिया बिक्रम और 9 अन्य की होनी चाहिए। और अगर, ये दुनिया 100 लोगों की है तो वो बिक्रम और 99 अन्य की कही जानी चाहिए।” माँ का सन्देश साफ़ था, उनकी सीख थी कि बिक्रम को लोगों के बीच अपनी अलग और बेहद ख़ास पहचान बनानी चाहिए और उन्हें कतई दूसरों जैसा नहीं होना चाहिए। माँ की इस सीख का बिक्रम पर गहरा असर रहा। आगे चलकर जीवन में कोई भी फैसला लेने के दौरान माँ की इस सीख ने बिक्रम की मदद की।

बिक्रम ने माँ के प्यार और संस्कार को उजागर करने वाली एक और रोचक घटना भी सुनायी। ये घटना उस समय की है जब बिक्रम आईआईटी-खड़गपुर में पढ़ाई कर रहे थे और छुट्टियों से दौरान अपने घर दुर्गापुर आये हुए थे। दुर्गापुर में प्रवास के दौरान बिक्रम अपने मकान के सामने वाले मकान में रहने वाले एक बच्चे को गणित पढ़ाया करते थे। इस लड़के का नाम बबलू था और उसके पिता उसी संस्था में काम करते थे जहाँ बिक्रम के पिता अधिकारी थे। उन दिनों उस लड़के के माता-पिता कोलकाता गए हुए थे। लड़के को पढ़ाने के बाद बिक्रम रात में उसी के घर पर सो जाते थे। बबलू के घर पर सोने के लिए बिक्रम अपने घर से एक चटाई वहां ले जाते थे। अगले दिन सुबह उनकी माँ आकर चटाई वापस ले जाती थी। ये वो समय था जब कॉलेज की पढ़ाई के दौरान बिक्रम सिगरेट पीने लगे थे। हॉस्टल की ज़िंदगी और कुछ साथियों की संगत का असर था कि उन्हें कुछ बुरी आदतें पड़ गयी थीं। माता-पिता के साथ होते तो शायद ये आदत कभी न पड़ती। माता-पिता की डांट-फटकार के डर से वे अपने घर में तो सिगरेट पी नहीं सकते थे, लिहाज़ा पड़ोस में बच्चे को पढ़ाने के बाद वे सिगरेट पी लिया करते थे। और, वापस अपने घर लौटते समय सिगरेट का पैकेट अपने साथ ले लेते थे। एक दिन सिगरेट का पैकेट गलती से उनके बिस्तर पर ही छूट गया। जैसेकि उन्हें आशंका थी ये पैकेट उनकी माँ के हाथ लग गया। बिक्रम बेहद डर गये। उन्हें लगा कि इस गुस्ताख़ी और गलत काम के लिये माँ उन्हें फौरन तलब करेंगी, लेकिन दिन भर ऐसा कुछ नहीं हुआ। शाम को जब वे माँ से मिले तो माँ ने बेहद शांत भाव से उनसे कहा, “अब तुम बड़े हो चुके हो, ऐसे में तुम्हें सिगरेट से होने वाले नुकसान के बारे में बताना बेमानी है। सब कुछ जानने के बाद सिगरेट पीने का फैसला तुम्हारा अपना है और मैं इसमें कोई दख़ल देना नहीं चाहती। लेकिन तुम जिस बच्चे को पढ़ा रहे हो, वह तुम्हें अपना आदर्श मानता है। ऐसे में उसके सामने सिगरेट पीकर तुम उसे गलत सीख दे रहे हो।” अपनी माँ की इस गहरी और सुलझी हुई सोच का बिक्रम पर गहरा असर हुआ। बिक्रम ने बताया कि इस तरह की कई सारी घटनाएं उनके जीवन में हुईं और माँ ने हर बार कुछ नया सिखाया।

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आईआईटी-खड़गपुर की वजह से बिक्रम की ज़िंदगी बदल गयी। सीधी-सादी ज़िंदगी जीने वाला एक छात्र अब दूसरों के साथ सिगरेट भी पीने लगा था। अगर निजी ज़िंदगी की बातों को अलग रखा जाय तब भी आईआईटी ने बिक्रम की सोच और उनके नज़रिए में काफी बदलाव लाये थे। वे खुद होनहार छात्र थे और दूसरे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की संगत में रहते हुए उन्होंने बहुत कुछ नया सीखा और समझा। टीचर भी उन्हें अच्छे मिले और उनका ज्ञान बढ़ता गया। बिक्रम जोर देकर कहते हैं कि पेशेवर ज़िंदगी में उन्होंने जो कोई काम किया उसमें आईआईटी-खड़गपुर की छाप ज़रूर दिखाई देती है। लेकिन, एक बात वो और भी जोर देकर कहते हैं कि आईआईटी से निकलने वाला हर इंसान कामयाब नहीं होता। आईआईटी से पढ़ने का ये मतलब नहीं कि हर विद्यार्थी अपने जीवन में कामयाब ही होगा। आईआईटी से बाहर भी पढ़ने वाले कई सारे लोग ज़िंदगी में बहुत अच्छा काम करते हैं।

आईआईटी-खड़गपुर से ग्रेजुएशन पूरा करते ही बिक्रम को 1973 में उस वक्त की प्रतिष्ठित कंपनी इंडियन ऑक्सीजन लिमिटेड में नौकरी मिल गयी। ऐसा भी नहीं था कि नौकरी मिलना आसान था, इंडियन ऑक्सीजन में नौकरी के लिए तगड़ी प्रतिस्पर्धा थी। लेकिन, वाक्-कला में निपुण बिक्रम ने अपने सारे प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ते हुए नौकरी हासिल कर ली थी। बिक्रम को शुरू से ही एक कमरे में बैठकर काम करना पसंद नहीं था और इसी वजह से उन्होंने इंडियन ऑक्सीजन में मार्केटिंग फील्ड को चुना ताकि उन्हें बाहर जाने और अलग-अलग लोगों से मिलने का मौका मिल सके। कड़ी ट्रेनिंग के बाद बिक्रम की पोस्टिंग आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम में हुई। बिक्रम को विशाखापट्टनम बहुत ही रास आया। उनकी पहली नौकरी वहां पर थी और जब वे विशाखापट्टनम में काम कर रहे थे तभी उनकी शादी रंजना से हुई। चहरे पर बड़ी मुस्कुराहट के साथ उन्होंने बताया कि उनके जुड़वा बेटों - राहुल और रोमित का जन्म भी विशाखापट्टनम में ही हुआ था। बिक्रम को इंडियन ऑक्सीजन के लिए कुछ समय हैदराबाद में भी काम करने का मौका मिला था। बिक्रम मेहनती थे, दूसरे कर्मचारियों और अधिकारियों से काफी तेज़ थे, अपने सारे काम बखूबी पूरा कर लेते थे, इसी वजह से उनके पेशेवर जीवन की शुरूआत काफी अच्छी रही। उनके काम को सराहा गया और महज़ साढ़े चार साल की नौकरी में बिक्रम को 2 प्रमोशन मिल गये। ये ऐसी कंपनी थी जहाँ कर्मचारियों को 10 से 15 साल बाद प्रमोशन मिलता था। जिस तरह से बिक्रम ने तरक्की की थी उसे देखकर कंपनी में ये तक कहा जाने लगा कि वे भविष्य में कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर होंगे। लेकिन बिक्रम सालों का इंतज़ार कर मैनेजिंग डायरेक्टर बनने को राजी नहीं थे। ‘जॉब सिक्योरिटी’ बिक्रम के लिये कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिसका लालच उन्हें तेज़ी से आगे बढ़ने से रोक सकती थी।

इंडियन ऑक्सीजन में काम करते-करते बिक्रम को ये अहसास होने लगा कि वे नौकरीपेशा ज़िंदगी के लिए नहीं बने हैं। उन्हें अपनी माँ को वो बात भी सताने लगी कि अगर दुनिया में 10 लोग हैं तो दुनिया बिक्रम और 9 अन्य की होनी चाहिए। बिक्रम जान चुके थे कि इंडियन ऑक्सीजन में काम करते हुए वे ज़िंदगी में कुछ नया और बड़ा नहीं कर पायेंगे। ज़िंदगी में कुछ बड़ा करने के मकसद से बिक्रम ने इंडियन ऑक्सीजन को अलविदा कहने का मन बना लिया। इंडियन ऑक्सीजन को छोड़कर बिक्रम ने एचसीएल ज्वाइन कर ली। एचसीएल उन दिनों अपने आप में एक स्टार्टअप कंपनी थी। शिव नाडार के नेतृत्व में कुछ दोस्तों/साथियों ने मिलकर ये कंपनी बनाई थी। कंपनी का मुख्य काम पर्सनल कंप्यूटर बनाना था। इंडियन ऑक्सीजन जैसी नामचीन कंपनी में अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर एचसीएल जैसी नयी कंपनी में ज्वाइन करने का फैसला लेकर बिक्रम ने कईयों को चौंका दिया था। कुछ लोग ऐसे भी थे जो उनके फैसले को गलत ठहरा रहे थे। लेकिन, एचसीएल ने बिक्रम का जीवन बदल डाला। बिक्रम के मुताबिक, एचसीएल में उन्हें काम करने की पूरी आज़ादी मिली। एचसीएल में इस बात के लिए प्रेरित किया जाता कि कुछ नया करो, पूरा प्रयास करो, दिल से काम करो, असफल हो जाओं तब भी निराश न हो, नया और अच्छा करने की कोशिश करते रहे। एचसीएल में बिक्रम को शिव नाडार और अर्जुन मल्होत्रा जैसे बड़े उद्यमियों के साथ काम करने का मौका मिला। अर्जुन मल्होत्रा आईआईटी में बिक्रम के सीनियर थे। हकीकत तो यही है कि अर्जुन के कहने पर ही बिक्रम ने एचसीएल ज्वाइन की थी। अर्जुन मल्होत्रा से बिक्रम बहुत ही प्रभावित थे, एक मायने में वे उन्हें अपना हीरो मानते थे। आईआईटी में अर्जुन मल्होत्रा एक बढ़िया, होनहार और तेज़ विद्यार्थी तो थे ही वे एक अच्छे खिलाड़ी भी थे। गणित और खेल के शौक़ीन बिक्रम को अर्जुन मल्होत्रा में एक हीरो नज़र आया था। एचसीएल में उन दिनों नयी सोच वाले लोगों का जमावड़ा था और इन्हीं उद्यामियों से बिक्रम ने भी बहुत कुछ सीखा। अपने साथियों के साथ बिक्रम ने एचसीएल में मेहनत की पराकाष्ठा की। दिन में 16 से 18 घंटे काम किया। और इसी मेहनत, लगन और उद्यमिता का नतीजा था कि एचसीएल अब 6 बिलियन ड़ॉलर की कंपनी बन चुकी है। बिक्रम को अब भी अच्छे से याद है कि जब उन्होंने एचसीएल ज्वाइन की थी तब उसका सालाना कारोबार सिर्फ 1.2 करोड़ रूपये था।

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एचसीएल की कामयाबी की कहानी में अपना महत्वपूर्ण किरदार निभाते हुए ही बिक्रम ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया। ये फैसला भी उनकी ज़िंदगी के बड़े फैसलों में एक है। बिक्रम ने एचसीएल की नौकरी छोड़ने और अपनी खुद की कंपनी शुरू करने का फैसला लिया था यानी फैसला था नौकरीपेशा ज़िंदगी को ही अलविदा कहने और उद्यमी बनने का। हुआ यूँ था कि एचसीएल में काम कर रहे कुछ साथियों ने मिलकर अपनी खुद की कंपनी बनाने का फैसला लिया था। इन पांच साथियों में बिक्रम भी एक थे। दिलचस्प बात है कि इन पाँचों साथियों में बिक्रम ही सबसे छोटे थे, लेकिन साहसी फैसला लेने में उन्होंने बराबर का साथ दिया था। एक और बाहर के साथी के साथ मिलकर एचसीएल के पांच कर्मचारियों ने 1984 में अपनी खुद की कंपनी बनाई और नाम रखा पीसीएल।

तगड़ी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़कर नई कंपनी शुरू करने के फैसले को अमलीजामा पहनना आसान नहीं था। कंपनी बनाने के लिये खासी बड़ी पूँजी की दरकार थी। दूसरे साथियों के समान निवेश करने जितने रुपये भी बिक्रम के पास नहीं थे। लेकिन, बिक्रम अपने धुन के पक्के थे। वे ठान चुके थे कि नयी कंपनी में वे बड़ा किरदार निभाएंगे। बिक्रम ने पूँजी जुटाने की कोशिशें शुरू कर दीं। उद्यमी बनने और नई कंपनी शुरू करने के अपने पति के जुनून को देखकर पत्नी रंजना मदद के लिए आगे आयीं। अपने पति के अरमानों को पूरा करवाने में उनकी मदद करने के मकसद से बिक्रम की पत्नी ने अपने जेवर बेच दिये। बिक्रम उन दिनों की यादें ताज़ा करते हुए कहते हैं, “मेरी पत्नी ने जोखिम उठाया था और इसी जोखिम की वजह से मेरी ज़िंदगी के मायने बदल गए, मैं आन्ट्रप्रनर बन पाया। मैं बड़े फक्र के साथ ये बात कहता हूँ कि उस समय मेरी पत्नी ने मुझपर भरोसा कर अपने गहने बेचे थे और जोखिम उठाया था। अगर वो उस दिन वैसा नहीं करती तो मेरी ज़िंदगी कुछ और होती और मैं उस समय आन्ट्रप्रनर नहीं बन पाया होता।” एक सवाल के जवाब में बिक्रम के कहा, “जब मैंने नौकरी छोड़कर उद्यमी बनने का फैसला लिया था तब भी मेरे माता-पिता ने मुझसे कुछ नहीं कहा। लेकिन, मुझे लगता है कि उन्होंने ज़रूर सोचा होगा कि मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ। हमेशा ही मेरे माता-पिता ने मुझे वो करने दिया जो मैं करना चाहता था।”

जिस समय बिक्रम ने अपने साथियों के साथ मिलकर पीसीएल की शुरूआत की थी उन दिनों भारत में कंप्यूटर-क्रांति शुरू हो चुकी थी और धीरे-धीरे कंप्यूटर लोगों की ज़िंदगी में अपनी जगह बनाने लगा था। बिक्रम और उनके साथी कंप्यूटर की अहमियत को पहचान चुके थे और वे अच्छी तरह से जानते थे कि भविष्य कंप्यूटर का ही है। यही वजह थी कि पीसीएल को शुरू करने का मकसद था – कंप्यूटर से भारत की तस्वीर बदलना। बिक्रम कहते हैं, “हम भारत को बदलना चाहते थे। हम चाहते थे कि भारत वैसा न रहे जैसा कि उस समय था। हम चाहते थे कि हर कोई कंप्यूटर का इस्तेमाल करे, देश का हर बच्चा कंप्यूटर का सही इस्तेमाल करना सीखते हुए बड़ा हो। हमारा इरादा बिलकुल साफ़ था।” बड़ी बात तो ये भी है कि बिक्रम और उनके साथी अपना मकसद पूरा करने में कामयाब भी हुए। भारत में आयी कंप्यूटर-क्रांति को नयी दशा-दिशा देने और उसे कामयाब बनाने में बिक्रम और उनके साथियों ने काफी बड़ी भूमिका निभायी। मगर, ऐसा भी नहीं था कि बिक्रम और उनके साथियों की राह आसान थी। कंपनी तो शुरू हो गयी थी लेकिन चुनौतियां कई सारी थीं। भारत को बदलने के जज़्बे के साथ पीसीएल ने बहुत ही कम समय में कई जगह अपने दफ्तर खोल लिए। फैक्ट्री भी शुरू हो गयी। कंपनी का काम तेजी से बढ़ा भी, लेकिन मुनाफ़ा अभी दूर की कौड़ी था। उल्टे कंपनी पर लोन चुकाने का दबाव बढ़ने लगा। कंपनी को बड़ा मुनाफा पहुँचाने का एक ही उपाय था कि कंपनी एक्सपोर्ट करना शुरू करे। उन दिनों देश में कंप्यूटर हार्डवेयर का निर्माण नहीं होता था। कंप्यूटर बनाने के पुर्जे विदेश से मंगवाए जाते थे। केंद्र सरकार की आयात नीति कारोबारियों के अनुकूल नहीं थी। विदेश से पुर्जे मंगवाकर भारत में कंप्यूटर बनाकर बेचने का कारोबार मुनाफे वाला प्रतीत नहीं होता था। सरकार की आयात-निर्यात नीति और कर-ढांचा भी उद्यमियों को रास नहीं आ रहा था। ऐसे में एक्सपोर्ट की दिशा में काम करने का जिम्मा बिक्रम दासगुप्ता ने अपने हाथों में लिया। उन्होंने आयात-निर्यात नीति का सूक्ष्म अध्ययन किया और इसी के प्रावधानों में से अपनी कंपनी के लिये फायदेमंद रास्ता खोज लिया। पीसीएल ने मदर बोर्ड के निर्माण और उसे एक्सपोर्ट करने का फैसला किया। लेकिन समस्या ये थी कि कौन-सी कंपनी पीसीएल के बनाये मदर बोर्ड को खरीदेगी। बिक्रम और उनके साथियों ने एस्सार, कॉम्पेक, आईबीएम, डेल जैसी सभी नामी कंपनियों से संपर्क किया, लेकिन बात नहीं बनी। लेकिन, हार मानना बिक्रम की फितरत में ही नहीं था। उन्होंने फैसला किया कि वे डेल के मैन्युफेक्चरिंग या मार्केटिंग हेड के बजाय सीधे कंपनी के संस्थापक और मुखिया माइकल डेल से मिलेंगे। उस समय 28 साल के माइकल डेल पूरी दुनिया में कंप्यूटर इंडस्ट्री में जाना-माना नाम था। उनके कम्पनी ‘डेल’ की दुनिया-भर में धूम मची हुई थी और माइकल की गिनती दुनिया के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों और कामयाब उद्यमियों और कारोबारियों में होने होने लगी थी। माइकल डेल से मिलना आसान न था। लेकिन बिक्रम ठान चुके थे। काफी प्रयासों के बाद, बड़ी मुश्किल से माइकल डेल से 10 मिनिट का अपॉइंटमेंट फिक्स हो सका। और, जब बिक्रम और माइकल डेल के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो दस मिनिट के लिए निर्धारित मुलाकात ढ़ाई घंटे की विस्तृत चर्चा में बदल गई। आखिरकार बिक्रम ने माइकल डेल को विश्वास जीतने में कामयाब रहे और पीसीएल को डेल जैसी नामी कंपनी से 50 मिलियन डॉलर का बड़ी डील करने में कामयाबी मिली। इस डील को बिक्रम अपने जीवन की बड़ी सफलताओं में शुमार करते हैं। पीसीएल की ये डील न केवल बिक्रम और उसकी कंपनी के लिये अहम साबित हुई, बल्कि भारत-भर में भी इसे बड़े बदलाव की तरह देखा गया। हर तरफ इसी डील के चर्चे होने लगे। बात राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक भी पहुँची। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंहराव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने बिक्रम को चर्चा के लिये बुलाया और शाबाशी भी दी। दरअसल इससे पहले देश में कंप्यूटर हार्डवेयर निर्माण के बारे में किसी ने नहीं सोचा था और बिक्रम ऐसा करने वाले पहले व्यक्ति थे। जाहिर है कि इससे भारत में कंप्यूटर की दुनिया में नया बदलाव आया और कंप्यूटर-क्रांति को तेज़ रफ़्तार मिली।

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बिक्रम और उनके साथियों की मेहनत और हार न मानने के ज़ज्बे की वजह से पीसीएल ने कामयाबी की शानदार कहानी लिखी। लेकिन, एक दिन अचानक बिक्रम ने एक और ऐसा फैसला लिया जिसने एक बार फिर पूरी इंडस्ट्री को चौंका दिया। बिक्रम ने पीसीएल को अलविदा कह दिया। कंपनी की नींव डालने से लेकर से लेकर उसे आसमान की ऊँचाई तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाने वाले बिक्रम के अचानक उस कंपनी को छोड़ देने का फैसला किसी की समझ में नहीं आया। क्या कारण है जिस वजह से बिक्रम ने पीसीएल को छोड़ दिया? इस सवाल का जवाब बिक्रम ने आज तक किसी को नहीं दिया है। हमने भी जब उनके यही सवाल किया तब जवाब में उन्होंने कहा, “पीसीएल मेरे परिवार की तरह है। मेरे खून में पीसीएल बसा हुआ है। मैं अपने घर-परिवार के अंदर की बातों की चर्चा सार्वजनिक मंचों पर करना ठीक नहीं समझता। पीसीएल छोड़ने का फैसला मेरा अपना था और इसकी वजह मैं कभी भी किसी को भी नहीं बताऊंगा।” ज़ाहिर है कि कुछ ऐसा हुआ होगा जो बिक्रम की इच्छा के अनुरूप नहीं था। वे कहते हैं कि फैसला आसान नहीं था। वैसे भी बिक्रम दासगु्प्ता नाम ही उस शख़्स का है जो कठिन और हैरतंगेज़ फैसले लेने के लिये पहचाना जाता है।

पीसीएल से हटने के बाद बिक्रम फिर कुछ ऐसा करना चाहते थे जो अब तक किसी ने न किया हो। बिक्रम ने देश में युवाओं की प्रतिभा को तराशने का अटल फैसला लिया। वे अपने शहर कोलकाता लौटे और ‘ग्लोबसिन’ नाम से कंपनियों का एक समूह बनाया। बिक्रम के कंपनियों ने शिक्षण, प्रशिक्षण, सॉफ्टवेयर और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्रों में खूब काम किया और अच्छा नाम कमाया देश के पहले आईटी पार्क खोलने का भी गौरव बिक्रम को ही हासिल हुआ। उन्होंने ‘इनफिनिटी’ के नाम से देश का पहला आईटी पार्क शुरू करने में अहम भूमिका निभायी। बिक्रम ने आगे चलकर टेक्नो कैंपस शुरू करवाया जोकि आईबीएम का दक्षिण एशिया में पहला सॉफ्टवेयर एक्सीलेंस सेंटर है। बिक्रम ने भारत का पहला कॉर्पोरेट बिज़नेस स्कूल ग्लोबसिन बिज़नेस स्कूल भी खोला। भारत में कौशल विकास के लिए वे भारत सरकार की मदद से ग्लोबसिन स्किल्स नाम की एक संस्था भी चला रहे है और इन संस्था का लक्ष्य अगले 10 सालों में कम से कम पांच लाख युवाओं को प्रशिक्षित करना और उनमें कौशल का विकास करना है। ऐसी कई संस्थाओं को वे सफलतापूर्वक चला रहे हैं।

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इन दिनों बिक्रम का सारा ध्यान देश के युवाओं और उनकी ताकत पर टिका है। उनका कहना है कि वे देश के युवाओं के साथ काम करना चाहते हैं। युवा प्रतिभाओं को तराशने और युवाओं को सही दिशा में ले जाना ही उसका सबसे बड़ा लक्ष्य है। अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए बिक्रम दासगुप्ता इन दिनों कई भूमिकाएं निभा रहे हैं। वे उद्यमी हैं और कारोबारी भी। वे शिक्षक भी है और प्रशिक्षक भी। वे सलाहकार भी हैं और रणनीतिकार भी। युवाओं को प्रोत्साहित करने और बड़े काम करने के लिए प्रेरित करने का कोई भी मौका वे नहीं चूकते हैं। इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाते हुए भी बिक्रम अपने शौक पूरा करने के लिए भी समय निकाल ही लेते हैं। खेल-कूद में उनकी दिलचस्पी जस की तस बरकरार है। नयी-नयी जगह जाने का शौक उनका पुराना है। भक्ति संगीत के बिना उनका दिन पूरा ही नहीं होता। किताबों को वे अपना सबसे अच्छा साथी मानते हैं। सबसे बड़ी बात, बिक्रम में अब भी कुछ नया और बड़ा करने की भूख कम नहीं हुई है। ज़िंदगी में कई बड़ी और नायाब कामयाबियां हासिल कर चुके बिक्रम दासगुप्ता का कहना है कि उनके ज़िंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी अभी उन्हें मिलनी बाकी है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “मैं नहीं जानता कि मेरी सबसे बड़ी कामयाबी क्या होगी लेकिन फिलहाल मैं एक बड़े काम को पूरा करने में लगा हुआ हूँ। मैं लोगों की मानसिकता को बदलना चाहता हूँ। कई लोग आज भी मानते हैं कि अगर उनका बेटा इंजीनियर बनेगा तभी वो कामयाब होगा। मैं लोगों को बताना चाहता हूँ कि जिंदगी में कामयाब होने के लिए सिर्फ इंजीनियर या डाक्टर बनना ही ज़रूरी नहीं है। कामयाब बनने के लिए और भी बहुत से काम किये जा सकते हैं। समाज में बहुत सारी समस्याएं हैं और लोग इन समस्याओं का हल निकालकर भी लोगों की मदद करते हुए कामयाब बन सकते हैं। मैं लोगों को खासतौर पर युवाओं को और विद्यार्थियों को ये बताना चाहता हूँ कि वो जैसे हैं वैसे ही अच्छे हैं और उन्हें अपनी असली ताकत का पता लगाकर उसी का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए।” बिक्रम युवाओं को ये सलाह देना नहीं भूलते थे कि उन्हें किसी और की तरह बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और उन्हें खुद अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करनी चाहिए। वे कहते हैं, “मैं नहीं चाहता कि कोई बिक्रम दासगुप्ता की तरह बने। जो जैसा है उसे वैसे ही बनना है।”

देश को नए उद्यमी देने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे बिक्रम दासगुप्ता का ये भी कहना है कि देश में जो भी सकारात्मक परिवर्तन आया उसमें उद्यमियों की भूमिका ही सबसे बड़ी है। उद्यमियों ने ही जोखिम उठाया और देश की समस्याओं को सुलझाने के लिए अपना पसीना बहाया।” बिक्रम दासगुप्ता से हमारी ये ख़ास बातचीत कोलकाता में हुई। हमने काफी समय उनके साथ उनके ड्रीम प्रोजेक्ट्स में से एक ग्लोबसिन बिज़नेस स्कूल में बिताया। हमने उन्हीं के साथ उन्हीं की कार में टोलीगंज गोल्फ क्लब से ग्लोबसिन बिज़नेस स्कूल तक का सफ़र भी तय किया। बिक्रम के साथ समय बिताकर इस बात का भी अहसास हुआ कि उनका समय प्रबंधन शानदार है और वे हर काम के लिए अपना समय तय करते हैं। उनकी पूरी कोशिश होती है कि एक भी मिनट बेकार न जाय और हर मिनट उपयोगी हो। समय प्रबंधन में माहिर होने की वजह से ही वे अलग-अलग जगह अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े अलग-अलग काम अलग-अलग भूमिका में कर पा रहे हैं। 

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