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"मिमिक्री कलाकार से हास्य अभिनेता बनने में लगे थे 10 साल"

हैदराबाद से शुरू हुई थी जॉनी लीवर की कामयाबी की कहानी

27th Apr 2016
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संघर्ष और सफलता का चोली दाम का साथ है। दोनों एक दूसरे के साथ चलते हैं। बस कई बार ऐसा हो जाता है कि संघर्ष लंबा होने लगता है और उससे रू-ब-रू होने वाला शख्स टूटने लगता है। बस इसी टूट को रोकना और खुद को चरैवेति वाली स्थिति में रखना ज़रूरी है। सफलता की कुछ ऐसी ही कहानी है हर दिल अजीज हिन्दी फिल्मों के लोकप्रिय हास्य कलाकार जॉनी लीवर का। जॉनी लीवर ने हास्य को बड़ी गंभीरता से लिया और फिल्मों के साथ-साथ मंचीय हास्य में बहुत लंबी जिंदगी जी, वे अपनी उम्र के उनसठ साल पूरे करने जा रहे है। उनका जीवन संघर्षों के बाद की सफलता का जीवंत उदाहरण है। जॉनी लीवर आज दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखते हैं, लेकिन यह पहचान उन्हें एक ऐसे कार्यक्रम के बाद मिली थी, जो उनके लिए नहीं था। उनका पहला मंचीय शो हैदराबाद के रवींद्र भारती में हुआ था। उनके गुरु और हास्य कलाकार रामकुमार ने अपनी तबीयत खराब होने की वजह से अपने चेले जॉनी को हैदराबाद भेजा। कहते हैं हुनर एक न एक दिन लोगों के सिर चढ़कर बोलता ही है। बस सही वक्त और सही मौके की तलाश रहती है उसे। जॉनी ने हैदराबाद में अपने पहले ही शो में धूम मचा दिया। वो दिन और आज का दिन। जॉनी लीवर ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। यही वजह है कि जॉनी हैदराबाद को कभी नहीं भूलते। पिछले दिनों जब वे हैदराबाद आये तो एक शाम दिलचस्प गुफ्तगू हुई।

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एक निजी महफिल में जॉनी इतना खुले की खुलते चले गये और अपनी जिंदगी की कई दिलचस्प घटनाओं को साझा किया। जॉनी लीवर ने बातचीत की शुरूआत हैदराबाद ही से की। जिस शहर में उन्होंने अपना पहला शो पेश किया था, उसी शहर में जब अपना शो लाना चाहते थे तो आंदोलनकारी गतिविधियों के कारण उन्हें वो शो रद्द करना पड़ा। अब फिर जल्द ही वे यहाँ अपना शो पेश करने की योजना बना रहे हैं।जॉनी से कई बातें हुईं। उनकी अपनी जिन्दगी, कला और कलाकारों की स्थिति और हास्य का मौजूदा माहौल, और भी बहुत कुछ। जॉनी ने योरस्टोरी को बताया, 

"मैं आज भी वो दिन नहीं भूलता, जब मैं जान राव से जॉनी लीवर बन गया। मैं हिन्दुस्तान लीवर में काम करता था। अपने दफ्तर के एक कार्यक्रम में जब मैंने अपने सभी उच्च अधिकारियों का बिना नाम बताये मिमिक्री की, तब कर्मचारियों में से किसी ने ज़ोर से घोषणा की कि ‘तुम जॉनी लीवर हो। बस उसी दिन से मैं जॉनी लीवर बन गया।"
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जॉनी कहते हैं,

"जब मैं जवान था। हिंदुस्तान लीवर में नौकरी करता था। पिताजी को डर था कि मैं कहीं इस हँसी मजाक के चक्कर में नौकरी न छोड़ दूँ। उस समय मुझे नौकरी से 600 रुपये वेतन मिलता था। स्टेज शो में हिस्सा लेने पर 50 रुपये मिलते थे। पिता जी जब सेवानिवृत्त हुए थे तो उन्हें 25000 रुपये मिले थे, जिसे उन्होंने बेटी के विवाह के लिए जमा किया था। उसी दौरान मुझको कछुआ छाप अगरबत्ती का एक विज्ञापन मिला, जिसके लिए विज्ञापनदाता ने खुश होकर मुझे 26000 रुपये दिए। पिता के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। जो पिता जी कभी डंडा लेकर स्टेज तक पीटने आये थे, लेकिन स्टेज के सामने तीन हज़ार लोगों की भीड़ देखकर वापिस लौट गये थे, उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि हँसी मज़ाक के कोई इतने पैसे भी दे सकता है।"

जॉनी अपने पेन वाले सिंधी चचा को कभी नहीं भूलते। सिंधी चाचा फुटपाथ पर ज़िंदगी गुज़ारते थे। उन्होंने जॉनी को अपनी फुटपाथी दुकान के सामने पेन बेचने को कहा था। जॉनी जब विभिन्न फिल्मी अभिनेताओं की मिमिक्री करके पेन बेचने लगे तो चचा के सारे ग्राहक उनके हिस्से में आ गये। चचा ने यह देखकर कहा,

"जॉनी मैंने तुम्हें पेन बेचना सिखाया और मेरे सारे ग्राहक तुमने ले लिये। अब तुम मुझे मिमिक्री सिखाओ, ताकि मैं तुम्हारे ग्राहक ले सकूँ।"
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दुनिया के सबसे बड़े झुग्गी इलाके यानी मुंबई के धारावी में जन्मे जॉनी का प्रारंभिक जीवन पहले चाल और बाद में एक झोपडीनुमा मकान में बीता। वहीं से उन्होंने लोगों की भाषा शैली का अवलोकन करना शुरू किया, जो उनकी कलात्मक एवं व्यावसायी जिन्दगी का हिस्सा बन गया। उस माहौल के बारे में जॉनी बताते हैं,

"वो एक मिनी हिन्दुस्तान था, जहाँ देश की हर भाषा बोलने वाले मौजूद थे। वो हिंदी भी बोलते थे तो अपनी ही शैली में। उनकी हिंदी को समझना भी काफी मुश्किल होता था। वहाँ तो श्रीलंका के लोग भी थे।

बातों बातों में जॉनी हैदराबाद के बारे में अपनी राय रखना नहीं भूले। वे कहते हैं,

"यहाँ की भाषा बिल्कुल भिन्न है, बल्कि हैदराबादी के कुछ भी बोले, हास्य का एक खास स्वाद उसमें छुपा होता है। पंजाबियों के बारे में कह जाता है कि वे कहीं भी जाएँ अपना लहजा नहीं छोड़ते, लेकिन वे भी हैदराबाद में आते हैं, तो अपना लहजा भूलकर हैदराबादी बोलने लगते हैं।"
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जॉनी लीवर ने एक और घटना सुनाई। अपनी पहली फिल्म की। एक दक्षिणी फिल्म निर्माता ने उन्हें 1980 में अपनी फिल्म ‘ये रिश्ता न टूटे’ के लिए साइन किया था। वे कहते हैं,

"मैं कैमरे का सामना एक्टिंग करने से डर रहा था। शूटिंग चेन्नई में थी। मुंबई से चेन्नई तो आ गया था, लेकिन सोचता था भाग जाऊँ। भागने की कोशिश भी की, लेकिन फिल्मवाले पकड़कर शूटिंग स्थल तक ले गये। वहाँ जब सब लोगों को अपना अपना काम करते देखा तो जान में जान आ गयी और समझ गया कि अपना काम आप करने में डरना क्या है।

बात जब बेटी जेमी लीवर और बेटे जेसी लीवर की चली तो अपना आदर्श साफ जतला दिया कि वे दोनों की कभी सिफारिश नहीं करते, बल्कि जेमी ने लंदन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद स्टैंडअप कॉमिडी को चुना और टी वी धारावाहिक में चुन लिये जाने के बाद पिता का नाम बताया।

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बेटी के बारे में जॉनी कहने लगे,

"मैंने सोचा था कि व उच्च शिक्षा प्राप्त कर कोई काम करेगी। इसी लिए तो उसे पढ़ने के लिए लंदन भेजा, लेकिन एक दिन उसने अपनी माँ से कहा कि वह स्टैंडप कॉमिडी करना चाहती है। सोते में वह हड़बड़ाकर उठती है और नींद में भी वही बड़ब़डाती है। हालांकि उसे बहुत समझाया गया कि यह आसान नहीं है, इसके बावजूद वह नहीं मानी और फिर लंदन के मेरे शो में जब उसे दस मिनट दिये गये, तो उसने उतने ही समय में वो कमाल कर दिखाया कि दर्शकों ने ख़डे होकर उसकी प्रशंसा की और कहा, ‘जॉनी आप की प्रतिस्पर्धी आ गयी।’ अपने बेटे में भी मैं यही किटाणु देख रहा हूँ।"

जॉनी को फिल्मों में गोविंदा के साथ एक कामयाब हास्य अभिनेता की जोड़ी के रूप में देखा गया, लेकिन एक बात उनके मन में ज़रूर रही कि उन्हें मिमिक्री कलाकार से हास्य अभिनेता के रूप में अपनी जगह बनाने के लिए दस साल लग गये थे। वे बताते हैं,

"मुझे फिल्मकार गंभीरता से नहीं लेते थे। मैं भी दो चीज़ों में बंटा हुआ था। फिल्म और स्टेज शो। अधिकतर फिल्मनिर्माता निर्देशक मिमिक्री के काम के लिए याद करते थे, लेकिन जब फिल्म बाज़ीगर में मेरे काम को देखा गया तो लोगों ने हास्य अभिनेता के रूप में मान्यता दी।
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वर्तमान परिवेश पर भी वे खुलकर बोलते हैं, ‘हर दौर में परिवर्तन आया है, आना भी चाहिए,लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दो बंद कमरों में होने वाली बातों को परिवार के सामने पेश किया जाए। यह अमान्य है।’

(एफ एम सलीम, योरस्टोरी उर्दू के डिप्टी एडिटर हैं)


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