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कैब और बाइक के बाद अब साइकिल की सवारी करवाएगा ओला, आईआईटी कानपुर से हुई शुरुआत

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4th Dec 2017
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पहले 30 मिनट की मुफ्त सवारी के बाद अगले 30 मिनट के लिए कॉस्ट फिलहाल सिर्फ 5 रुपये है। कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक इसमें दी जाने वाली साइकिलें पंक्चर प्रूफ होंगी और उनकी चेन नहीं उतरेगी...

आईआईटी कानपुर कैंपस में खड़ीं ओला साइकिलें

आईआईटी कानपुर कैंपस में खड़ीं ओला साइकिलें


 टेक्नॉलजी के जरिए हर सवार द्वारा साइकिल के इस्तेमाल पर नजर होगी और इसमें लोगों साइकिल की चोरी या इसके नुकसान को लेकर ज्यादा सावधानी बरतेंगे।

 चीन में साइकिल शेयरिंग का कारोबार करोड़ों डॉलर के आसपास है। बिजनेस इनसाइडर की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में ऐसी ही सर्विस प्रदान करने वाली लगभग 40 कंपनियां हैं।

भारत में कैब सर्विस प्रदान करने वाली प्रमुख कंपनी ओला अब पर्यावरण अनुकूल सवारी मुहैया कराने जा रहा है। इस सर्विस का नाम है पेडल, जिसे अभी पायलट प्रॉजेक्ट के तौर पर आईआईटी कानपुर परिसर में ट्रायल रन किया जा रहा है। ओला भारत में अपनी प्रतिद्विंदी कंपनी ऊबर के साथ टक्कर ले रही है। हालांकि भारत में यह प्रयोग एकदम नया है, लेकिन चीन जैसे देशों में ऐप के माध्यम से किराए पर साइकिल की सवारी का चलन पुराना हो चुका है। ओला ने हाल ही में एक अरब डॉलर का फंड जुटाया है, जिसे वह इस प्रॉजेक्ट पर खर्च करेगी।

हालांकि यह सर्विस अभी सिर्फ देश के शिक्षण संस्थानों में ही उपलब्ध होगी, लेकिन आने वाले समय में हो सकता है कि इसे आम जनता के लिए भी खोल दिया जाए। इस सर्विस को शुरू करने के पीछे के मकसद के बारे में ओला ने बताया कि कई बार हमें कम दूरी का सफर करना पड़ता है जहां पैदल जाना थोड़ा कठिन होता है, लेकिन कार या बाइक बुक करने का मतलब नहीं बनता। उस स्थिति में पेडल जैसी सर्विस कारगर साबित होगी।

अगर यह पायलट प्रॉजेक्ट सफल रहता है, तो आनेवाले महीनों में ओला इस सर्विस का और बेहतर वर्जन पेश कर सकता है। उन्होंने बताया, 'माना जा रहा है कि युवाओं के बीच साइकल के लोकप्रिय होने की गुंजाइश है, लिहाजा आम लोगों के बीच इसे पॉप्युलर बनाने से पहले कैंपस में इस सर्विस का टेस्ट किया जाएगा।' उन्होंने कहा कि आईआईटी कानपुर में पेश की गई ओला की मौजूदा साइकिलों में बेहतर सिक्यॉरिटी फीचर्स नहीं हैं, लेकिन अगले लॉट में क्यूआर कोड और जीपीएस ट्रैकिंग की व्यवस्था रहने की उम्मीद है।

आईआईटी कानपुर में छात्रों को ट्रायल रन के तहत 30 मिनट के लिए साइकिल की सवारी मुफ्त मुहैया कराई जाती है। ऊपर जिस ओला एग्जिक्युटिव का जिक्र किया गया है, उन्होंने बताया, 'इस पर काफी सब्सिडी है, लिहाजा ओला पेडल सर्विस के रफ्तार पकड़ने तक यह स्टूडेंट समुदाय की जरूरत पूरी करेगा। पहले 30 मिनट की मुफ्त सवारी के बाद अगले 30 मिनट के लिए कॉस्ट फिलहाल सिर्फ 5 रुपये है।' कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक इसमें दी जाने वाली साइकिलें पंक्चर प्रूफ होंगी और उनकी चेन नहीं उतरेगी।

आईआईटी कानपुर के स्टूडेंट ओला की इस सर्विस से बेहद खुश नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि इससे कैंपस में घूमना आसान और सुलभ हो जाएगा। इन साइकिलों में जीपीएस, क्यू आर कोड और स्मार्ट लॉक जैसे फीचर्स जोड़े जाएंदे। इसके अलावा कुछ और बेहतरीन सुरक्षा व्यवस्था के साथ नई साइकिलें लाई जाएंगी। ओला के एक अधिकारी ने बताया कि टेक्नॉलजी के जरिए हर सवार द्वारा साइकिल के इस्तेमाल पर नजर होगी और इसमें लोगों साइकिल की चोरी या इसके नुकसान को लेकर ज्यादा सावधानी बरतेंगे।

ओला चीन में इसी तरह की सर्विस प्रदान करने वाली कंपनी ओफो और मोबइक सर्विस की तरह ही काम करेगी। चीन की ये दोनों कंपनियां यूएस और यूरोप के साथ ही एशिया के कई देशों में अपने बिजनेस का विस्तार कर रही हैं। इन्होंने पिछले 12 महीने में लगभग 2 अरब डॉलर का फंड जुटाया है। ओला ने बताया है कि इस सर्विस में इस्तेमाल की जाने वाली साइकिलें भारत में ही निर्मित होंगी। ओला के एक अधिकारी ने बताया कि आईआईटी कैंपस में अभी 500-600 साइकिलें उपलब्ध हैं। स्टूडेंट्स ओला ऐप के जरिए जिस तरह से कैब बुक करते हैं, उसी तरह से साइकल भी किराए पर ले सकते हैं।'

ओला के अलावा सेल्फ ड्राइविंग कार सर्विस प्रदान करने वाली कंपनी जूमकार ने भी हाल ही में PEDL नाम से एक सर्विस लॉन्च की है जिसके तहत 2017 के अंत में 10,000 साइकिलें मार्केट में उतारने की योजना है। चीन में साइकिल शेयरिंग का कारोबार करोड़ों डॉलर के आसपास है। बिजनेस इनसाइडर की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में ऐसी ही सर्विस प्रदान करने वाली लगभग 40 कंपनियां हैं। हालांकि हाल ही में वहां पर कई स्टार्टअप्स ने अपना बिजनेस बंद भी कर दिया है। इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। फॉर्च्यून पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक साइकिल कैब का विकल्प कभी नहीं बन सकती। इसके अलावा वहां एक कंपनी वुकोंग की लगभग 90 फीसदी साइकिलें चोरी हो गईं।

यह भी पढ़ें: झोपड़-पट्टी में रहने वाला लड़का बना इसरो का साइंटिस्ट

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