इंस्टाप्रो3डी के माध्यम से भारतीय उपभोक्ताओं को पहली बार 3डी प्रिंटिंग से रूबरू करवाती मेघा भैया

21st Nov 2015
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वाईएस टीम हिंदी

लेखकः तनवी दुबे

अनुवादः निशांत गोयल


त्रिआयामी यानी 3डी प्रिटिंग के जरिये चीजों को तैयार करने वाली एक तकनीकी कंपनी इंस्टाप्रो3डी (Instapro3D) की संस्थापक मेघा भैया बचपन से ही बेहद जिज्ञासु रही हैं और गुड्डे-गुडि़यों से खेलने की उम्र से ही डिस्कवरी चैनल और एन्साईक्लोपीडिया उनके सबसे अच्छे साथी रहे हैं।

उनके जीवन में उनका पिता का एक बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। जब वे छोटी थीं तबसे ही अगर घर में कोई भी इलेक्ट्रोनिक सामान खराब हो जाता था तो हमेशा वे अपने पिता को विभिन्न किस्म के औजार लेकर उसे खोलकर ठीक करने की कोशिश करते हुए देखतीं और वे मुस्कुराते हुए कहती हैं कि ‘‘अधिकांश मामलों में वे उन चीजों को ठीक करने में सफल ही रहते थे।’’ उनका झुकाव हमेशा से ही प्रौघोगिकी और तकनीक के क्षेत्र में रहा और मेघा अक्सर अपने पिता के साथ उनके कारखाने में सिर्फ इसलिये जातीं ताकि वे मशीनों को काम करते हुए देखने के अलावा अपने पिता को उन्हें ठीक करते हुए देख सकें और अगर कभी मशीनें काम करना बंद कर दें तो वे समस्याओं का निवारण होते हुए देख सकें। वे कहती हैं, ‘‘उन्होंने कभी भी यह देखने से रोकने का प्रयास नहीं किया कि वे क्या कर रहे हैं और आज मैं जो कुछ भी हूं इसी वजह से हूं। किसी भी चीज की गहराई तक जाना अब मेरे जीवन का एक अभिन्न भाग है।’’

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बीती गर्मियों में मेघा महिलाओं के सामने अक्सर आने वाली एक सामान्य सी समस्या का सामाधान तलाशने की दिशा में अपना दिमाग लगा रही थीं। ऊँची हील वाले सेंडल (स्टिलेट्टोज़) पहनने वाली महिलाओं के सामने अक्सर यह समस्या आती है कि जब वे इन्हें पहनकर किसी भी कच्चे स्थान पर चलती हैं तो ये मिट्टी या घास में धंस जाते हैं और वे इस समस्या का समाधान तलाशते हुए एक उत्पाद डिजाइन करने का प्रयास कर रही थीं। मेघा कहती हैं, ‘‘ऐसे में मैं एक हील कैप तैयार करना चाहती थी जो एड़ी को कच्चे स्थान पर धंसने से रोकने में सक्षम हो। एक बार डिजाइन तैयार कर लेने के बाद मेरे लिये उसका नमूना तैयार कर पाना बेहद मुश्किल साबित हुआ क्योंकि इसके लिये मुझे बेहद महंगी पारंपरिक विनिर्माण की विधियों की मदद लेनी पड़ी। उसी समय मेरे मस्तिष्क में 3डी प्रिंटिंग का विचार आया और मैंने इस क्षेत्र में कुछ करने की ठानी।’’

किसी भी चीज की गहराई में जाने की अपनी पुरानी आदत के चलते ही वे इंस्टाप्रो3डी की नींव रखने में कामयाब रहीं। मेघा कहती हैं, ‘‘हमारा इरादा किसी भी वस्तु को वास्तव में तैयार करने के दौर में लगे निर्माताओं, विचारकों और डिजाइनरों के बीच की दूरी को पाटने का उद्देश्य लेकर काम करने का था।’’

3डी प्रिटिंग

मेघा के अनुसार भारत में अभी 3डी प्रिंटिंग की अवधारणा अपने शैशवकाल में है और अभी यह लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने में कामयाब नहीं रही है। मेघा कहती हैं, ‘‘वास्तव में यह तकनीक काफी रोमांचक है और मैंने भी जब इसके बारे में पहली बार जाना मुझे ऐसा लगा कि 90 के दशक में देखा जाने वाला कार्टून जेटसंस वास्तविकता में बदल गया है। आप 3डी प्रिंटर के माध्यम से लगभग कुछ भी तैयार कर सकते हैं।’’

मेघा ने इस वर्ष के प्रारंभ में अपने उद्यम की नींव रखी और वर्तमान ये 4 तकनीकी विशेषज्ञों की एक टीम का नेतृत्व कर रही हैं। इंस्टाप्रो3डी एक सेवा ब्यूरो के रूप में संचालित हो रहा है जहां मेघा और उनकी टीम प्रोटोटाइप और डायरेक्ट डिजिटल विनिर्माण तैयार करने के लिये उत्पाद डिजाइनरों और डेवलपर्स के अलावा छात्रों, इंजीनियरों, आर्किटेक्ट्स, बेकर्स और सुनारों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

अपना रास्ता स्वयं बनाना

मेघा का झुकाव स्कूली दिनों से ही विज्ञान के विषय की तरफ था लेकिन स्नातक के दौरान उनके करियर ने एक बिल्कुल ही अलग करवट ली। वे कहती हैं, ‘‘मैंने वर्ष 2012 में बिजनेस स्टडीज के क्षेत्र में लैंसेस्टर विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली। इस परिवर्तन के बावजूद तकनीक और प्रौद्योगिकी के प्रति मेरा झुकाव बिल्कुल भी कम नहीं हुआ।’’

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स्नातक करने के बाद मेघा एलईडी लाइटिंग और साइनेज के अपने पारिवारिक कारोबार का हिस्सा बन गईं। उन्होंने अपने दम पर कुछ करने से पहले तीन वर्षों तक वहां काम करने का अनुभव लिया। मेघा बताती हैं, ‘‘मेरे पिता के कार्यस्थल पर व्यवस्था और प्रोटोकाॅल पहले से ही अमल में लाए जा रहे थे और वहां पर मेरी पहचान सिर्फ उनकी एक बेटी के तौर पर थी। मैं अपनी एक बिल्कुल ही अलग पहचान बनाना चाहती थी और अपनी क्षमता और शक्ति को परखना चाहती थी।’’

बहरहान उनका यह फैसला इतना आसान नहीं था बल्कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी। मेघा उस समय 24 वर्ष की थीं और वे विवाह के योग्य थीं। ऐसे में उन्हें अपने माता-पिता को शादी न करने के लिये मनाने में कड़ी मे मेहनत करनी पड़ी। मेघा बताती हैं, ‘‘मैं अपने माता-पिता द्वारा मुझे दिलवाई गई शिक्षा-दीक्षा के बदले कुछ अधिक सार्थक और चुनौतीपूर्ण करना चाहती थी। आखिरकार वे मान गए और उसके बाद से उनका रवैया बहुत मददगार रहा है।’’

इंस्टाप्रो3डी

इंस्टाप्रो3डी को प्रारंभ करने के पीछे उनका दृष्टिकोण भारत में 3डी प्रिंटिंग के लिये एक बुनियादी पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करने का था ताकि लोग नए उत्पादों की खोज, निर्माण और डिजाइनिंग के लिये इस शक्तिशाली तकनीक का उपयोग करने को प्रेरित हो सकें।

इंस्टाप्रो3डी के कार्य के बारे में बात करते हुए वे बताती हैं कि वे अबतक कूलर मास्टर, एबीबी सोलर, मैक्केन हेल्थ, सीआईबीएआरटी जैसे कुछ बहुराष्ट्रीय निगमों और सरकारी एजेंसियों के साथ काम कर चुके हैं।

इसके अलावा वे अपने स्तर पर बहुत अधिक प्रयोग भी कर चुके हैं। हाथों और पैरों की छाप को 3डी प्रिंटिड स्मृतिचिन्ह में परिवर्तित करने की पहल इनके इन्हीं प्रयोगों का एक नमूना भर है। मेघा कहती हैं, ‘‘हमारा मानना है कि परिवार में बच्चे का जन्म किसी भी माता-पिता के लिये बहुत ही भावनात्मक क्षण होता है और ऐसे में उस क्षण को जीवनभर के लिये सहेज लेने का विचार वास्तव में अमूल्य होता है। हम वह पहली कंपनी हैं जो भारत में कागज पर लिये गए हाथों की छाप को 3डी प्रिंटिंड स्मृतिचिन्ह में बदलते हैं।’’

हालांकि अबतक इस 3डी तकनीक को एक बेहद प्रभावशील प्रतिक्रिया मिली है वे बताती हैं कि किस प्रकार से इस तकनीक का प्रयोग रक्षा, एयरोस्पेस, आॅटोमोबाइल, आभूषण और चिकित्सा इत्यादि के क्षेत्र में किया जा सकता है। वे कहती हैं, ‘‘हालांकि यह अभी भी उपभोक्ताओं के व्यक्गित जीवन का हिस्सा बनने में कामयाब नहीं हो पाई है।’’

चुनौतियां और प्रेरणा

मेघा कहती हैं, ‘‘उद्यमिता का क्षेत्र चुनौतियों से परिपूर्ण होता है। आपको एक ही समय पर कई सारी चीजों को संभालते हुए उनका प्रबंधन करने के अलावा विभिन्न समस्याओं का समाधान भी खोजना होता है। आप लगातार विकास के अगले स्तर, बैकएंड और सबसे अधिक मूल टीम के निर्माण को लेकर सबसे अधिक चिंतित रहते हैं।’’

एक महिला उद्यमी के रूप में उनका अनुभव बेहद मिश्रित रहा है। वे कहती हैं, ‘‘कई बार ऐसे मौके भी आए जब उपभोक्ताओं ने एक महिला होने के नाते उन्हें कमतर करके आंका लेकिन अधिकांश मामलों में एक महिला होना मेरे पक्ष में ही रहा है।’’

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अपने सामने आने वाली चुनौतियों से वे अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सबक सीखने में सफल रही हैं जिसके बाद उन्होंने कुछ गलत करने के बारे में चिंता ही करनी बंद कर देने के साथ जो सही हो सकता है उसे सोचकर खुश रहना सीखा है। वे कहती हैं, ‘‘कई बार मुझे ऐसा लगता है कि मैं बिल्कुल ठीक कर रही हूं लेकिन इसके बावजूद मैं ‘अगर हमारा प्लान ए नहीं कामयाब हुआ तो भी 25 दूसरे शब्द मौजूद हैं’ की अवधारणा का पालन करती हूं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको किसी भी हाल में रुकना नहीं है।’’

पांच वर्ष आगे की सोच

मेघा ने अभी सिर्फ प्रारंभ ही किया है और वे इस तकनीक के भविष्य को लेकर खासी उत्साहित हैं। वे कहती हैं, ‘‘मुझे ऐसा लगता है कि हम अभी इस तकनीक की बाहरी सतह को ही जानने में सफल हुए हैं और अभी तक हम इस तकनीक की वास्तविक क्षमताओं की जड़ तक नहीं पहुंचे हैं। मैं निकट भविष्य में देश के प्रत्येक उपभोक्ता के पास पर्सनल कंप्यूटर की तरह एक निजी 3डी प्रिंटर को भी देख पा रही हूँ।’’

आने वाले दिनों में वे इंस्टाप्रो3डी को एक बेहतरीन तरीके से एकीकृत और स्थापित सेवा ब्यूरो के रूप में देखती हैं जहां इसकी मदद से डिजाइनर, इनोवेटर और निर्माता नए अविष्कारों को करने में सफल रहेंगे।


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