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समाज के विरोध के बावजूद एक शख्स ने पत्नी की 13वीं में पैसे खर्च करने के बजाय गांव के स्कूल में लगाए डेढ़ लाख रु.

Harish Bisht
2nd Mar 2016
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जिंदगी कब किस मोड़ पर किसका साथ छोड़ दे, कहा नहीं जा सकता। बावजूद इसके कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपनों के दुनिया से चले जाने के बाद भी समाज के बारे में सोचते हैं और समाज के लिए कुछ कर उस सदमे से उबरने की कोशिश करते हैं भले ही वो समाज उनका साथ ना दे। कुछ ऐसा ही किया महाराष्ट्र के अकोला में रहने वाले अविनाश नकट ने। इस साल 5 फरवरी को जब उनकी पत्नी का देहांत हुआ तो उन्होंने तय किया कि वो अपनी पत्नी की तेरहवीं पर खर्च होने वाले पैसे का इस्तेमाल अपने गांव के स्कूल को डिजिटल बनाने में करेंगे। हालांकि समाज के ज्यादातर लोगों ने उनका विरोध किया, लेकिन धुन के पक्के और समाज के प्रति बेहतर सोच रखने वाले अविनाश अपने फैसले से पीछे नहीं हटे और उन्होंने करीब डेढ़ लाख रुपये की लागत से अपने गांव के स्कूल को डिजिटल किया है। इसका असर यह हुआ कि कल तक जो लोग उनके फैसले पर ऊंगली उठा रहे थे, आज वो उनकी तारीफ कर रहे हैं।


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अविनाश महाराष्ट्र अकोला के टांडली बजरक नाम के गांव के रहने वाले हैं। उनका एक हंसता खेलता परिवार था। उनके परिवार में उनकी पत्नी रूपाली, दो बेटियां समृद्धि और आनंदी थी। लेकिन इस परिवार में एक ऐसा भूचाल आया कि सब कुछ बदल गया। अविनाश ने योरस्टोरी को बताया, 

"3 फरवरी तक सब कुछ सामान्य था, मेरी पत्नी उस दिन खुद ही घर का सामान बाजार से लेकर आयी थीं। साथ ही बच्चों को स्कूल से लाने का काम भी उन्होंने ही किया था, लेकिन उसी शाम उनकी थोड़ी तबीयत खराब हुई, जिसके बाद रूपाली के भाई जो खुद एक डॉक्टर हैं, उन्होने उसे कुछ दवाईयां दी जो आमतौर पर डॉक्टर प्राथमिक उपचार के लिये देते हैं। लेकिन रूपाली की तबीयत ठीक नहीं हुई और बुखार बना रहा। हम दोनों ने तय किया कि हम शाम को डॉक्टर के पास जाएंगे इस बीच रूपाली की नाक से खून बहने लगा और कुछ देर बाद अपने आप बंद भी हो गया। हालात की गंभीरता को समझते हुए मैं रूपाली को डॉक्टर के पास ले गया। जब अस्पताल पहुंचा तो मुझे पता चला की रूपाली को ल्यूकोमिया हो गया है।"

 


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ल्यूकोमिया का इलाज अकोला में संभव नहीं था इस वजह से अविनाश ने तय किया कि वो अपनी पत्नी को नागपुर ले जाएंगे। इसके बाद अविनाश ने एंबुलेंस बुलवाया और रूपाली के साथ रूपाली के भाई और अपने भांजे को लेकर नागपुर के लिए रवाना हो गये। हालांकि अविनाश ने रूपाली को उनकी बीमारी के बारे में कुछ नहीं बताया था। रास्ते में दोनों पति-पत्नी बातें करते रहे और कुछ दूर जाने के बाद रूपाली की आंखें धीरे धीरे बंद होने लगी। तो अविनाश ने सोचा कि शायद रूपाली को नींद आ रही है, इस तरह जब तक ये नागपुर के अस्पताल में पहुंचते तब तक रूपाली इस दुनिया को छोड़ चुकी थी। डॉक्टरों ने बताया कि रूपाली की मौत ब्रेन हैमरेज की वजह से हुई है।


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अपनी पत्नी रूपाली से बेहद प्यार करने वाले अविनाश अंदर से टूट गये थे, लेकिन अपनी दो बेटियों के खातिर उन्होने अपने को संभाला और घर पहुंचे। अविनाश बताते हैं कि 

"जब मैं अन्तिम संस्कार कर घर पहुंचा तो घर पर काफी भीड़ थी। यह देखकर मैंने सोचा कि अगर घर में ऐसे ही रोना चलता रहा तो मेरे बच्चों पर इसका बहुत गलत असर जाएगा। मैंने सभी लोगों को कहा कि मैं कल से काम पर जा रहा हूं और बच्चे भी कल से स्कूल जाएंगें। साथ ही मैंने उन सब से ये भी कहा कि मृत्यु के बाद होने वाली कोई रस्म अब ना की जाये। इस बात का विरोध मेरे परिवार को छोड़कर वहां मौजूद सब लोगों ने किया लेकिन मैं अपने फैसले पर अडिग रहा। मैंने तय किया कि अपनी पत्नी की तेरहवीं पर खर्च होने वाले पैसे का इस्तेमाल गांव के स्कूल पर खर्च करुंगा, जिसकी हालत काफी खराब है।"


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अविनाश ने योर स्टोरी को बताया, 

“हमारे गांव के जिला परिषद स्कूल की हालत काफी खराब थी। ये स्कूल पहली क्लास से 7वीं तक है, मैं भी इसी स्कूल का पढ़ा हुआ हूं हमारे समय में इस स्कूल में एक कक्षा में 35 बच्चे पढ़ा करते थे लेकिन आज संसाधनों की कमी के कारण पूरे स्कूल में 35 से 40 बच्चे पढ़ते हैं। इसलिए मैंने इस स्कूल पर पैसा खर्च करने का फैसला लिया।” 

इस तरह अविनाश ने अपनी पत्नी रूपाली की मृत्यु के 5वें दिन बाद ही स्कूल में रेनोवेशन का काम शुरू कर दिया और दीवारों को कार्टून कैरेक्टरों से सजा दिया, ताकि बच्चे इन्हें देखकर स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित हों साथ ही उन्होने स्कूल में पंखे, कंप्यूटर, प्रोजेक्टर, कालीन आदि लगवाये। शुरू में उनके इस काम का बहुत विरोध हुआ खासतौर पर महिलाएं उन्हें ऐसा ना करने के लिए बहुत समझाती थीं, लेकिन अविनाश ने उनकी एक नहीं सुनी।


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अविनाश कहते हैं कि “हमारे गांव में गरीबी बहुत है और वहां के ज्यादातर लोग किसान हैं, सूखे की वजह से वहां किसान आत्महत्या भी करते हैं, तब मैं उनको समझाता था कि अगर पैसा नही है तो कर्ज लेकर मृत्योपरांत होने वाली रस्मों को ना करें क्योंकि जाने वाला तो चला गया है अगर इस पैसे को हम गांव के विकास में खर्च करेंगे तो इससे गांव का ही विकास होगा।” लोगों को इस तरह की सलाह देने वाले अविनाश का कहना है कि जब उनके साथ ये घटना घटी तो उन्होने तय किया को वो लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं और खुद अगर ऐसा नहीं करेंगे तो गलत होगा। इसलिए उन्होंने फैसला लिया कि वो इस पैसा का इस्तेमाल गांव के विकास पर खर्च करेंगे।


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अविनाश पुरानी बातों को याद करते हुए कहते हैं कि करीब दो महीने पहले उनकी पत्नी ने स्कूल की हालत सुधारने को लेकर उनसे बात की थी, लेकिन अचानक जब ये घटना हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी के सपने को सच करने के बारे में सोचा। अविनाश कहते हैं कि उस वक्त भले ही दो एक परिवार उनके साथ खड़े थे लेकिन आज एक दो परिवार को छोड़ पूरा गांव उनके फैसले के साथ खड़ा है। 

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