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पति के एक्सिडेंट के बाद बस की स्टीयरिंग थाम उठाया बेटियों को पढ़ाने का जिम्मा

पति के एक्सिडेंट के बाद बस चलाकर बेटियों की पढ़ाई करवाने वाली कोलकाता की पहली महिला बस ड्राइवर...

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20th Feb 2018
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पेशेवर ड्राइविंग एक ऐसा काम है जिसके बारे में समाज सोचता है कि यह तो पुरुषों का काम है। लेकिन कोलकाता में इस बंधन को तोड़कर प्रतिमा पोद्दार इस मानसिकता को करारा जवाब दे रही हैं। 42 वर्षीय प्रतिमा कोलकाता की इकलौती महिला बस ड्राइवर हैं।

प्रतिमा पोद्दार (फोटो साभार-  KOLKATA 24X7)

प्रतिमा पोद्दार (फोटो साभार-  KOLKATA 24X7)


प्रतिमा बताती हैं कि शुरू में ड्राइविंग के पेशे में जाने के बारे में सोचना अजीब लगता था। लेकिन रोजी रोटी चलाने का एकमात्र यही जरिया था। इसीसे मैं बस का लोन चुका रही हूं और अपनी बेटियों की फीस भरने के साथ-साथ घर को भी संभाल रही हूं।

समाज की मानसिकता ने स्त्री और पुरुष के काम अलग-अलग निर्धारित कर दिए हैं। उससे हट कर कोई काम करता है तो उसे आश्चर्य की निगाहों से देखा जाता है। पेशेवर ड्राइविंग एक ऐसा ही काम है जिसके बारे में समाज सोचता है कि यह तो पुरुषों का काम है। लेकिन कोलकाता में इस बंधन को तोड़कर प्रतिमा पोद्दार इस मानसिकता को करारा जवाब दे रही हैं। 42 वर्षीय प्रतिमा कोलकाता की इकलौती महिला बस ड्राइवर हैं। वह निमिता हावड़ा पर रोजाना दो-तीन चक्कर लगाती हैं। कोलकाता शहर में रोज कई सारी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। खासतौर पर बस से तो रोज टक्कर होती है। लेकिन पिछले 6 सालों से बस चला रहीं प्रतिमा से आज तक एक भी एक्सिडेंट नहीं हुआ।

प्रतिमा के पति शिबेश्वर भी पहले ड्राइवर थे लेकिन एक हादसे के बाद वह बस चलाने में असमर्थ हो गए। इसके बाद घर चलाने की जिम्मेदारी प्रतिमा ने ले ली। प्रतिमा पहले एक अस्पताल में एंबुलेंस चलाती थीं। उसके बाद वह बस चलाने लगीं। वह रोजाना सुबह 3.30 बजे घर से निकल जाती हैं ताकि सबसे पहली ट्रिप में देरी न हो। अपने पति के बारे में बताते हुए वह कहती हैं, 'क्योंकि मेरे पति बस नहीं चला सकते इसलिए मैंने बस चलाने की जिम्मेदारी उठा ली और इस बात पर मुझे गर्व भी है कि आज तक मेरा एक्सिडेंट नहीं हुआ। मैं बाकी पुरुष ड्राइवरों के जैसे ही तेज बस चला सकती हूं, लेकिन मैं हमेशा सुरक्षा का पूरा ख्याल रखती हूं।'

हावड़ा स्टेशन के पुलिस और रोज बस से सफर करने वाले यात्री प्रतिमा को अच्छी तरह जानने लगे हैं और वे प्रतिमा पर पूरा भरोसा भी रखते हैं। हावड़ा स्टेशन पर एक पुलिसवाले ने कहा, 'मैं शायद ही कभी प्रतिमा को ओवरस्पीड बस चलाते हुए देखा हो। वह कभी भी सवारियों को मोड़ पर भी नहीं उतारती जबकि बाकी बस ड्राइवर अक्सर ऐसा करते हैं।' हालांकि प्रतिमा स्वीकारती हैं कि कभी कभार छोटी-छोटी भूलें उनसे हो जाती हैं लेकिन कभी दुर्घटना नहीं होती। वह बताती हैं, 'मेरे पति का 2011 में ऐक्सिडेंट हो गया था जिसके बाद वह बड़े वाहन चलाने लायक नहीं बचे। इसके बाद मैंने बस चलाने की जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली।'

प्रतिमा बताती हैं कि शुरू में ड्राइविंग के पेशे में जाने के बारे में सोचना अजीब लगता था। लेकिन रोजी रोटी चलाने का एकमात्र यही जरिया था। इसीसे मैं बस का लोन चुका रही हूं और अपनी बेटियों की फीस भरने के साथ-साथ घर को भी संभाल रही हूं। प्रतिमा ने सिर्फ 12वीं तक की पढ़ाई की है। उन्होंने बीए में दाखिला लिया था, लेकिन एक साल के बाद ही उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। वह अपनी बेटियों को खूब पढ़ाना चाहती हैं। उनकी बड़ी बेटी राखी जिम्नास्टिक प्लेयर है और वह राज्य स्तर पर कई मेडल भी जीत चुकी है। अभी वह जाधवपुर यूनिवर्सिटी से मैथमैटिक्स ऑनर्स से ग्रैजुएशन कर रही है। वहीं दूसरी बेटी अभी 9वीं में है और वह वह भी पढ़ाई में अच्छा कर रही है।

प्रतिमा बताती हैं कि उन्होंने काफी कम उम्र में ही ड्राइविंग सीख ली थी, लेकिन इसे कभी पेशा बनाने के बारे में नहीं सोचा। उनके पति पहले एक छोटी मिनी बस चलाते थे। उससे इतना गुजारा हो जाता था कि परिवार अच्छे से चल जाता था। बाद में उन्हें लगा कि अगर खुद की बस हो जाए तो अच्छा होगा। इस वजह से उन्होंने एक नई बस खरीद ली। बस में कुछ दिन तक प्रतिमा ने कंडक्टर के तौर पर काम किया था, लेकिन इसके बाद ही हादसा हो गया और शिबेश्वर बिस्तर पर आ गए। घर चलाना मुश्किल हो रहा था इसलिए प्रतिमा ने प्राइवेट नौकरी खोजने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होने एंबुलेंस और टैक्सी चलाया। इसके बाद शिबेश्वर थोड़े ठीक हुए और उन्होंने प्रतिमा को बस चलाना भी सिखाया। इसके बाद उन्हें लाइसेंस भी मिल गया और अब वह भिरती से हावड़ा तक रोज बस चलाती हैं।

यह भी पढ़ें: गांधीनगर रेलवे स्टेशन बना पूरी तरह से महिला कर्मचारियों वाला देश का पहला स्टेशन

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