संस्करणों
विविध

बड़ी कंपनियों में लाखों के अॉफर छोड़ गांव पहुंचे राहुल-श्वेता, यदुवेंद्र

आंत्रेप्रेन्योर की दौड़ में बिहारी युवा देश के विकास के लिए बन रहे हैं प्रेरणास्त्रोत...

28th Jun 2017
Add to
Shares
1.8k
Comments
Share This
Add to
Shares
1.8k
Comments
Share

आंत्रेप्रेन्योर की दौड़ में बिहार के युवा भी देश के विकास के लिए नए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं। इस दिशा में समस्तीपुर के युवा दंपति राहुल सिन्हा-श्वेता और मधुबनी के यदुवेंद्र किशोर सिंह मल्टीनेशनल कंपनियों के लाखों के ऑफर ठुकरा कर मत्स्य पालन और समेकित खेती करने लगे हैं। अपने काम के माध्यम से जहां एक ओर उन्हें बीस से पच्चीस लाख रुपए तक खुद की सालाना कमाई हो रही है, वहीं उनके काम-काज में हाथ बंटा रहे तमाम लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।

image


समय बदल रहा है। सबकुछ अब पहले जैसा नहीं रहा। वो बीते दिनों की बातें हो गईं, कि लोग रोजी-रोटी की तलाश में गाँव छोड़ कर शहरों की ओर चल पड़े हैं, क्योंकि अब तो लोग शहर छोड़ कर गाँवों की ओर लौट रहे हैं, वो भी सिर्फ इसलिए ताकि स्वयं की मजबूती के साथ-साथ एक सामाजिक प्राणी होने के नाते अपने समाज के लिए भी कुछ कर पायें। इसी सोच के साथ चलने वाले लोगों में राहुल-श्वेता और यदुवेंद्र।

समस्तीपुर के एमबीए राहुल सिन्हा और श्वेता का कहना है कि पटना और मुंबई में तकनीकी पढ़ाई पूरी करने बाद दोनो का लक्ष्य मत्स्य पालन और समेकित खेती था। वर्ष 2009 में शादी के बाद श्वेता मुंबई छोड़कर बिहार नहीं आना चाहती थीं। किसी तरह समझाबुझा कर आपसी समझ के चलते राहुल और श्वेता वर्ष 2012 में समस्तीपुर लौटे और अपना लक्ष्य हासिल करने में जुट गए। सबसे पहले इंटरनेट पर मत्स्य पालन से संबंधित तमाम तरह की जानकारियां सर्च कीं। इसके बाद आईसीएआर, पटना और पंतनगर, उत्तराखंड में मत्स्य पालन का प्रशिक्षण लिया। 

उसी दौरान वे मत्स्य संसाधन मंत्री गिरिराज सिंह से मिले। उन्हें डॉ. टुनटुन सिंह से भी तकनीकी जानकारियां मिलीं। बहुत कम लागत से उन्होंने मछली का कारोबार शुरू कर दिया। पहले साल उन्हें इससे पांच लाख का शुद्ध मुनाफा हुआ। इससे उत्साह बढ़ा। जलाशयों में मत्स्य पालन का काम भी शुरू कर दिया। आज के समय में ये स्थिति है, कि खुद की आर्थिक स्थिति मजबूत बनाने के साथ-साथ राहुल और श्वेता कई बेरोज़गारों को भी इस काबिल बना रहे हैं, कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें।

ये भी पढ़ें,

पूजा के बासी फूलों से निखिल गम्पा बना रहे हैं अगरबत्तियां

इसी तरह मधुबनी (बिहार) के गांव खुटौना के यदुवेंद्र किशोर सिंह ने बिजनेस आंत्रेप्रेन्योर मैनेजमेंट में डिप्लोमा करने के बाद मल्टीनेशनल कंपनियों के लाखों रुपए का ऑफर ठुकरा कर समेकित खेती में अपना भविष्य सुरक्षित करना ज्यादा बेहतर समझा। 

यदुवेंद्र किशोर सिंह ने जब अपने गांव में आम के सौ पौधे रोपने के साथ बागवानी, पशुपालन और सामान्य खेती की शुरुआत की तो उन्हें लोगों के मजाक का पात्र बनना पड़ा। किसी ने कहा सिर फिर गया है तो किसी ने गांव की कहावतें सुनाकर उनका उपहास उड़ाया लेकिन अपने मकसद से वह तनिक भी डिगे नहीं। आज वह अपने कुशल प्रबंधन से सालाना बीस लाख रुपए से अधिक का मुनाफा कमा रहे हैं।

अपने गांव खुटौना में उन्होंने साढ़े सात एकड़ में पांच तालाब बनवाने के साथ ही इलाके के जलजमाव वाले स्थानों पर भी जलसंचयन की व्यवस्थाएं कीं, कई पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार कराया। इसके बाद उन तालाबों में इंडियन कॉर्प मछली का बीज डलवाया। इसके अलावा उन्होंने दस गायों के साथ डेयरी के काम में हाथ डाल दिया। साथ में धान, गेहूं, सरसो और अरहर की खेती भी करने लगे।

यदुवेंद्र चाहते हैं कि खुटौना समेकित खेती में बिहार का मॉडल गांव बने। वह अपने गांव में किसानों के लिए समेकित खेती का एक प्रशिक्षण केंद्र भी बनाना चाहते हैं। उनका उद्देश्य है कि प्रदेश के किसानों को कम खर्च में अधिक कमाई वाली समेकित खेती करने के लिए प्रेरित किया जाए। स्थानीय स्तर पर उन्होंने इस दिशा में धान और गेहूं की खेती के लिए 'श्रीविधि' तकनीक का प्रयोग शुरू भी कर दिया है।

ये भी पढ़ें,

गरीब परिवार में जन्मे चंद्र शेखर ने स्थापित कर ली 12,500 करोड़ की कंपनी 

Add to
Shares
1.8k
Comments
Share This
Add to
Shares
1.8k
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें