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फ़ूडटेक स्टार्टअप स्विगी ने मारी बिलियन डॉलर क्लब में एंट्री!

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25th Jun 2018
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सूत्रों की मानें तो स्विगी को डीएसटी ग्लोबल की मदद से 200 मिलियन डॉलर रुपए का निवेश मिल रहा है, लेकिन कंपनी ने इसकी पुष्टि अभी तक नहीं की है। भारत की फ़ूडटेक इंडस्ट्री 2.5 बिलियन डॉलर का आंकड़ा छूने वाली है, जिसको ध्यान में रखते हुए इस सेक्टर की दो सबसे बड़ी प्रतियोगी कंपनियां स्विगी और ज़ोमेटो बड़ी उड़ान की तलाश में हैं।

स्विगी के फाउंडर नंदन, राहुल और श्रीहर्ष

स्विगी के फाउंडर नंदन, राहुल और श्रीहर्ष


जब स्विगी ने 2014 में अपने ऑपरेशन्स की शुरूआत की थी, तब कंपनी की कोशिश थी कि फ़ूड डिलिवरी न सिर्फ़ बड़े और महंगे रेस्तरां से हो, बल्कि किफ़ायती और सस्ते रेस्तरां से भी फ़ूड आइटम्स डिलिवर किए जा सकें। 

भारत की फ़ूडटेक इंडस्ट्री के लिए यह साल काफ़ी ख़ास रहा। जहां एक तरफ़ स्विगी ने नैस्पर्स से 100 मिलियन डॉलर का फ़ंड जुटाया, वहीं दूसरी ओर ज़ोमेटो ने फ़रवरी में आन्ट फ़ाइनैंशियल्स की मदद से 200 मिलियन डॉलर की फ़ंडिंग इकट्ठा की। इसके बाद से ही स्विगी द्वारा डीएसटी ग्लोबल से 200 मिलियन डॉलर रुपए का निवेश हासिल करने की ख़बरें सामने आ रही हैं। इस संबंध में बात करने पर स्विगी के मैनेजमेंट ने कोई भी बयान देने से इनकार कर दिया, लेकिन सूत्रों के खेमे द्वारा इस बात की लगातार पुष्टि की जा रही है।

इस साल की फ़ंडिंग के बाद दिल्ली आधारित कंपनी ज़ोमेटो ने यूनिकॉर्न क्लब में अपनी जगह बना ली है, जबकि स्विगी भी इस लीग में शामिल होने से बस कुछ कदम दूर है। अगर डीएसटी ग्लोबल द्वारा फ़ंडिंग की ख़बर सही साबित होती है, तो स्विगी भी इस क्लब में एंट्री ले लेगा और उसका वैल्यूएशन 1.3 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा।

एक निवेशक ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर कहा, "अगर स्विगी और ज़ोमेटो दोनों ही बिलियन डॉलर क्लब में साथ आते हैं, तो दोनों ही कंपनियां जल्द से जल्द मार्केट में अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश में जुट जाएंगे। फ़िलहाल स्विगी और भी जल्द मार्केट पर अपना एकाधिकार जमाने की जुगत में लगा हुआ है और इस उद्देश्य के साथ कंपनी अलग-अलग मार्केट सेगमेंट्स में काम कर रहीं कंपनियों का अधिग्रहण कर रही है और साथ ही अपने बिज़नेस मॉडल को और भी अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश में लगी हुई है।"

इसी क्रम में स्विगी ने इस साल पर्याप्त फ़ंडिंग जुटाई है और साथ ही, स्विगी ऐक्सेस और स्विगी पॉप (Swiggy POP) को भी लॉन्च किया। इतना ही नहीं, स्विगी ने अपनी पहुंच को और भी अधिक शहरों तक बढ़ाया है। स्विगी ने बेंगलुरु आधारित क्लाउट रेस्तरां 48 ईस्ट का भी अधिग्रहण किया।

भारतीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों ही बाज़ारों में, ऑनलाइन फ़ूड डिलिवरी बिज़नेस में प्रतियोगियों की संख्या कम नहीं है। यूएस में, ऊबर ईट्स और मार्केट लीडर ग्रबहब के बीच कड़ी टक्कर है। इनवेस्ट फ़र्म कॉवेन ऐंड कंपनी के अनुमान के मुताबिक़, 2022 तक यूएस का फ़ूड डिलिवरी मार्केट 76 बिलियन डॉलर पहुंच जाएगा। हाल में ग्रबहब रोज़ाना 4 लाख ऑर्डर्स डिलिवर करता है और कंपनी के पास यूएस के मार्केट का 48.6 प्रतिशत का हिस्सा है।

चीन के मार्केट में दो तरह की कंपनियां हैं। पहली वे कंपनियां, जो ग्रुप-बाइंग स्टार्टअप्स हैं और उनके पास अपनी ख़ुद की डिलिवरी टीम्स हैं। दूसरी ओर, अलीबाबा (कॉबेई) और बायडू (बायडू वाईमाई) जैसी कंपनियां, जो इस मार्केट स्पेस की दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनियां हैं। अलीबाबा ने हाल ही में फ़ूड कंपनी ele.me का अधिग्रहण किया है। रोचक है कि अलीबाबा के सहयोगी आन्ट फ़ाइनैंशियल्स ने स्विगी की प्रतियोगी कंपनी ज़ोमेटो में निवेश किया है। इससे हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अलीबाबा ने भारतीय मार्केट में प्रवेश कर लिया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अभी ऐसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाज़ी होगा।

एक अन्य निवेशक के मुताबिक़, "इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारतीय बाज़ार काफ़ी बड़ा हो चुका है, लेकिन साथ ही, यह काफ़ी चुनौतियों भरा भी है। जहां भारत में लोग एक हफ़्ते में दो या तीन बार, बाहर का खाना खाते हैं, वहीं थाईलैंड में यह आंकड़ा 8 से 9 बार का है, लेकिन धीरे-धीरे ट्रेंड बदल रहा है। अब भारत में भी यह औसत आंकड़ा बढ़ रहा है।" एक और निवेशक से बात करने पर पता चला कि स्विगी अपने ऑपरेशन्स अच्छी तरह से चला रहा है और कंपनी ने लॉजिस्टिक्स पर पूरा कंट्रोल बनाकर रखा हुआ है। वह मानते हैं कि इस सेक्टर में एग्ज़िक्यूशन बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारत में तकनीक की उपलब्धता पर्याप्त है और यहां पर ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों ही सुविधाओं के बीच अच्छा सामंजस्य बनाना बेहद महत्वपूर्ण होता है।

स्विगी के सीईओ और को-फ़ाउंडर श्रीहर्ष मजेटी ने एक वादे के साथ अपनी कंपनी की शुरूआत की थी कि उनकी कंपनी आने वाले समय में भारत में खाने के प्रचलन को ही बदल देगी। इस बारे में बात करते हुए श्रीहर्ष ने कहा, "हम अपनी मूलभूत सुविधाओं पर ख़ास ध्यान देते हैं। ऐप पर ऑर्डर देने से लेकर फ़ूड आइटम की डिलिवरी तक, ग्राहकों को किसी तरह की शिकायत न हो, इस पर हमारा पूरा ज़ोर रहता है। यह एक काफ़ी चुनौतीभरा काम है, लेकिन तकनीक और ऑपरेशनल एग्ज़िक्यूशन की मदद से हम इसे काफ़ी अच्छे ढंग से निभा रहे हैं। हमने 5 राइडर्स के साथ शुरूआत की थी और अब हमारे साथ 20 हज़ार राइडर्स जुड़े हुए हैं।"

जब स्विगी ने 2014 में अपने ऑपरेशन्स की शुरूआत की थी, तब कंपनी की कोशिश थी कि फ़ूड डिलिवरी न सिर्फ़ बड़े और महंगे रेस्तरां से हो, बल्कि किफ़ायती और सस्ते रेस्तरां से भी फ़ूड आइटम्स डिलिवर किए जा सकें। शुरूआती स्तर पर स्टार्टअप्स में निवेश करने वाले और लोकप्रिय स्टार्टअप मेंटर संजय आनन्दराम मानते हैं कि हाल में ऑनलाइन फ़ूड बिज़नेस मूल रूप से डिलिवरी सर्विस और ऑनलाइन किचन्स पर केंद्रित है। संजय भी मानते हैं कि भारतीय बाज़ार में सबसे बड़ी लड़ाई ज़ोमेट और स्विगी के बीच ही है। संजय स्विगी को थोड़ा बेहतर मानते हैं और इसके पीछे की वजह स्पष्ट करते हुए बताते हुए कहते हैं कि स्विगी ने अपनी सुविधाओं की गुणवत्ता को बरक़रार रखा है और इस वजह से ही उपभोक्ता किसी भी प्लेटफ़ॉर्म पर रेस्तरां देखें, लेकिन ऑर्डर स्विगी के प्लेटफ़ॉर्म से ही करते हैं।

बड़े रेस्तरां और रेस्तरां चेन्स के साथ-साथ स्विगी छोटे फ़ूड जॉइंट्स के साथ भी काचम करता है, जिनका बिज़नेस अभी ठीक ढंग से ऑर्गनाइज़ नहीं हुआ है। कई छोटे रेस्तरां के लिए स्विगी, बिज़नेस को बढ़ाने का सबसे प्रमुख ज़रिया है। फ़िलहाल स्विगी हर ऑर्डर पर 30 प्रतिशत का शेयर कमाता है। स्विगी को रेस्तरां से कमीशन मिलता है और वह उपभोक्ताओं से डिलिवरी फ़ीस चार्ज करता है। स्विगी ऐडवरटाइज़िंग के माध्यम से भी रेवेन्यू पैदा करता है। 2016-17 में कंपनी ने अपना रेवेन्यू 133.1 करोड़ रुपए घोषित किया और दावा किया कि कंपनी को 205.2 करोड़ रुपए का घाटा हुआ। इसके एक साल पहले, बेंगलुरु आधारित इस फ़ूडटेक स्टार्टअप ने 23.6 करोड़ रुपए का रेवेन्यू घोषित किया था और घाटा 137.2 करोड़ रुपए बताया था।

अब देखना दिलचस्प होगा कि बिलियन डॉलर क्लब में प्रवेश लेने की ख़बरों के बीच, स्विगी किस तरह से अपनी विकास दर को बढ़ाता है और भारतीय फ़ूडटेक बाज़ार में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए क्या-कुछ नया करता है।

यह भी पढ़ें: 'समर्थ' स्टार्टअप भारत के बेसहारा बुजुर्गों की जिंदगी में भर रहा खुशियां

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