संस्करणों
प्रेरणा

वाराणसी के पास बुनकरों के गांव में अगरबत्ती बेचकर घर चलाने वाली महिलाओं की कहानी

20th Jan 2016
Add to
Shares
85
Comments
Share This
Add to
Shares
85
Comments
Share

दुनियाभर में बनारसी साड़ी मशहूर है, लेकिन उसकी बुनाई करने वाले बुनकरों की हालत कैसी है ये किसी से छुपी नहीं है। पावरलूम की वजह से बुनकरों की रोज़ी रोटी पर बहुत बुरा असर हुआ। ग़रीब बुनकरों की तो जैसे कमर ही टूट गई। कर्ज का बोझ बढ़ने लगा और घर की माली हालत चरमराने लगी। लेकिन कहते हैं, जहां चाह वहां राह। एक राह रूक गई तो और चल पड़ी। यह सच है जीवन में किसी चीज़ के बंद होने से ज़िंदगी नहीं ठहरती। कुछ ऐसा ही हुआ वाराणसी से सटे सारनाथ के पास भासौड़ी गांव में। अपने पतियों की रोज़ी रोटी पर लात लगने के बाद यहां की महिलाओं ने अपने आपको मजबूत किया और खुद को और परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया।

image


वाराणसी सारनाथ के भासौडी गांव की महिलाएं इन दिनों महिला सशक्तिकरण की नजीर पेश करती नजर आ रही हैं। अपने घर की माली हालत को देखते हुए गांव की महिलाओं ने एक फैसला किया। उन्होंने सम्मिलत फैसला लिया कि वो कुछ ऐसा काम करेंगी जिससे, वो घर का काम तो करें साथ में आमदमी के लिए कोई ज़रिए भी ढूंढें। इसी दौरान उन्हें अगरबत्ती बनाने को लेकर प्रेरणा मिली। महिलाओं के लगा कि काम भी अच्छा है और पैसे की आमद भी है। गांव की महिलाओं ने फैसला किया कि वो एक साथ इकट्ठा होकर पूजा में प्रयोग होने वाली अगरबत्ती बनाएंगी और बाजार में ले जाकर बेचेंगीं। काम शुरू किया गया और देखते ही देखते उसमें सफलता भी हासिल होने लगी। महिलाएं एक साथ इकट्ठा होकर अगरबत्ती बनाने लगीं और उसे बाज़ार में बेचने लगीं। इससे पैसे भी मिलने लगे और पूरे घर का खर्च भी चलने लगा। चूंकि अगरबत्ती बनाने के लिए ज्यादा जद्दोजहद भी नहीं करनी पड़ती है। इसलिए इनका प्रयोग कारगर होने लगा। इलाके में काम करने वाली एक समाज सेवी संतारा पटेल ने योरस्टोरी को बताया,

"जब बुनकारी का काम बंद हुई तो पुरुष बाहर जाने लगे। उसी दौरान महिलाओं ने सोचा कि उन्हें भी अपने घर परिवार को चलाने के लिए कुछ करना चाहिए। उसी के बाद महिलाओं ने अगरबत्ती बनाने का काम शुरू किया और आज देखिए इनके दिन सुधर गये"
image


एक समय था कि लगभग पन्द्रह सौ की आबादी वाले इस गांव के हर घर में बुनकारी का काम होता था। बुकर बनारसी साड़ियां बुनते थे और उसे बाज़ार में बेचते थे। हालांकि तब भी इनकी हालत ऐसी नहीं थी जिसे अच्छा कहा जा सकता हो। बाद में कम समय में ज्यादा साड़ियां बीनने के लिए पावरलूम का इस्तेमाल होने लगा। जिसका नतीजा यह हुआ कि इनकी ज़िंदगी एकदम से चरमरा गई। धीरे-धीरे बुनकारी काम काम बंद हो गया। और बुनकर कर्ज़ से लद गए। कर्ज़ ने बुनकर के घरों को तोड़ दिया। रोजाना कमाने खाने वाले ये लोग कर्ज से भी दब गये थे। लेकिन अब इनकी ज़िंदगी खुशहाल है। मेहनत रंग लायी और दिन सुधरने लगे।

image


इसी गांव की निवासिनी गुड्डी ने योरस्टोरी को बताया, 

"घर के चूल्हे चौके से खाली होकर महिलायें रोजाना एक जगह एकत्रित होती हैं और गीत गाकर मनोरंजन के साथ अगरबत्ती बनाती हैं। इसके बाद तैयार अगरबत्ती को बाजार में ले जाकर बेचती हैं। हमलोगों को खुशी इस बात की है कि घर का काम भी हो जाता है और बाकी के समय में अगरबत्ती बनाकर कमाई भी होती है। घर भी ठीक से चलने लगा और कर्ज से भी मुक्ति मिली।" 

तरक्की किसी नहीं पसंद। भासौडी गांव की महिलाओं ने अपने आस-पड़ोस के लगभग आधा दर्जन गाँवों की महिलाओं को ऐसा करने के लिए उत्साहित किया। आस-पास के गांव की महिलाओं ने भी इनका अनुसरण किया और अपने घर परिवार को संवारने में जुट गई हैं। आलम यह है कि इन महिलाओं को और मजबूती देने के लिए इनके पति भी मेहनत और मजूरी के काम के साथ इनके इस व्यवसाय में मदद करते हैं। भासौडी गांव की इन महिलाओं ने वो कर दिखाया जो आज महिला सशक्तिकरण का उदहारण बन गया है .आज ये सशक्त हैं और इनका ये जज्बा हर किसी को इनकी तरह आगे आने के लिये प्रेरित कर रहा है .

image


महिला सशक्तिकरण को लेकर देशभर में तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेकिन वाराणसी के पास के गांव में अगरबत्ती बना रही महिलाओं ने न तो कोई औपचारिक योजना बनाई न ही इसके लिए किसी से संपर्क किया। अपनी जमा-पूंजी से काम शुरू किया और देखते ही देखते ये आत्मनिर्भर बनने लगीं। ज़ाहिर है लगन और कुछ करने की क्षमता ही कार्य को सफलता तक पहुंचाती है।

Add to
Shares
85
Comments
Share This
Add to
Shares
85
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags