संस्करणों
विविध

मेजर ध्यानचंद की हॉकी स्टिक में क्या वाकई कोई जादू था?

हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का खेल जिसने भी देखा वह उनका मुरीद हो गया...

प्रज्ञा श्रीवास्तव
29th Aug 2017
Add to
Shares
1
Comments
Share This
Add to
Shares
1
Comments
Share

ध्यानचंद कितने मशहूर थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बर्लिन ओलंपिक के 36 सालों बाद जब उनके बेटे अशोक कुमार जर्मनी में हॉकी खेलने पहुंचे तो एक शख्स स्ट्रेचर पर उनसे मिलने आया था।

फोटो साभार: सोशल मीडिया

फोटो साभार: सोशल मीडिया


हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का खेल जिसने भी देखा वह उनका मुरीद हो गया। ध्यानचंद को चाहने वाले 'दद्दा' भी कहकर पुकारा करते थे। दद्दा के खेल का जादू ऐसा था जिसने जर्मन तानाशाह हिटलर तक को अपना दीवाना बना दिया था।

 अपनी आत्मकथा 'गोल' में ध्यानचंद साहब ने लिखा था, 'आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूं।'

मेजर ध्यानचंद सिंह, वो लीजेंड जिनकी वजह से भारत की ओलंपिक में गोल्ड मेडल वाली सूची में थोड़ी रौनक है। ध्यानचंद सिंह को दुनियाभर में 'हॉकी के बाजीगर' के नाम से जाना जाता है, जिन्होंने न सिर्फ भारत को ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलवाया बल्कि हॉकी को एक नई ऊंचाई तक ले गए। क्रिकेट में जो स्थान डॉन ब्रैडमैन, फुटबॉल में पेले और टेनिस में रॉड लेवर का है, हॉकी में वही स्थान ध्यानचंद का है। ध्यानचंद ने हॉकी में जो कीर्तिमान बनाए, उन तक आज भी कोई खिलाड़ी नहीं पहुंच सका है। राष्ट्रीय खेल दिवस 29 अगस्त को हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उनकी जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। आज ही के दिन सन 1905 में ध्यानचंद का जन्म इलाहाबाद में हुआ था।

हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का खेल जिसने भी देखा वह उनका मुरीद हो गया। ध्यानचंद को चाहने वाले 'दद्दा' भी कहकर पुकारा करते थे। दद्दा के खेल का जादू ऐसा था जिसने जर्मन तानाशाह हिटलर तक को अपना दीवाना बना दिया था। हिटलर ने स्वयं ध्यानचंद को जर्मन सेना में शामिल कर एक बड़ा पद देने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने भारत में ही रहना पसंद किया। वियना के एक स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है, जिसमें उनको चार हाथों में चार स्टिक पकड़े हुए दिखाया गया है। ध्यानचंद कितने मशहूर थे अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बर्लिन ओलंपिक के 36 सालों बाद जब उनके बेटे अशोक कुमार जर्मनी में हॉकी खेलने पहुंचे तो एक शख्स स्ट्रेचर पर उनसे मिलने आया था। डॉन ब्रैडमैन ने ध्यानचंद के खेल को देखकर उनसे कहा था, 'आप तो क्रिकेट के रन की तरह गोल बनाते हैं।'

फोटो साभार: सोशल मीडिया

फोटो साभार: सोशल मीडिया


जुनून, जुनून और जुनून

सुनने में अजीब लगता है, लेकिन लोगों का वाकई में ऐसा मानना था कि ध्यानचंद की हॉकी स्टिक में जादू था क्योंकि जब-जब मैच के दौरान उनके पास बॉल आती फिर उसे पोल पार करने से कोई रोक ही नही सकता था। हॉलैंड में एक मैच के दौरान हॉकी में चुंबक होने के शक में उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई थी। जापान में एक मैच के दौरान उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी कही गई। लेकिन उनके खिलाफ हुई सारी जांचें निराधार साबित हुईं। ध्यान चंद को हॉकी की काफी प्रैक्टिस किया करते थे। उनके रात के प्रैक्टिस सेशन को चांद निकलने से जोड़कर देखा जाता था। इसलिए उनके साथी खिलाडियों ने उन्हें चांद नाम दिया। आपने अभी तक किसी भी हॉकी प्लेयर का नंगे पांव हॉकी खेलते नहीं देखा होगा। 

लेकिन मेजर ध्यानचंद ने अपने एक मैच के दौरान नंगे पांव मैच खेला। बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उन्होंने ये मैच खेला था। उस समय बड़ौदा के महाराजा और भोपाल की बेगम साथ-साथ जर्मन नेतृत्व की चोटी के लोग मौजूद थे। तब जर्मन खिलाड़ियों ने भारत की तरह छोटे-छोटे पासों से खेलने की तकनीक अपना रखी थी। हाफ टाइम तक भारत सिर्फ एक गोल से आगे था। हाफ टाइम के बाद मेजर ध्यानचंद ने अपने जूते और मौजे उतारे और नंगे पांव खेलने लगे। इसके बाद तो मैदान पर इंडिया के लिए गोलों की झड़ी लग गई।

लीजेंड की जिंदगी का पहला अध्याय

उत्तर प्रदेश के झांसी में जन्मे ध्यानचंद प्रारंभिक शिक्षा के बाद 16 साल की उम्र में पंजाब रेजिमेंट में शामिल हो गए थे। वो फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट में एक साधारण सिपाही के रूम में भर्ती हुए थे। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी को जाता है। उनके पिता समेश्वर दत्त सिंह भी सेना में ही हॉकी खेलते थे। तबादले के कारण वह झांसी आ गए। उस वक्त ध्यानचंद की छह साल के थे। उनकी पढ़ाई-लिखाई झांसी में ही हुई। 14 साल की उम्र में पहली बार उन्होंने हॉकी स्टिक थाम ली थी। 21 साल की उम्र में उन्हें न्यूजीलैंड जानेवाली भारतीय टीम में चुन लिया गया। इस दौरे में भारतीय सेना की टीम ने 21 में से 18 मैच जीते।

image


सर्वकालिक महान खिलाड़ी

23 साल की उम्र में ध्यानचंद 1928 के एम्सटरडम ओलंपिक में पहली बार हिस्सा ले रही भारतीय हॉकी टीम के सदस्य थे। यहां चार मैचों में भारतीय टीम ने 23 गोल किए। 1932 में लॉस एंजिल्स ओलंपिक में भारत ने अमेरिका को 24-1 के रिकॉर्ड अंतर से हराया। इस मैच में ध्यानचंद और उनके बड़े भाई रूप सिंह ने आठ-आठ गोल ठोंके। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे। 15 अगस्त, 1936 को हुए फाइनल में भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया। 1948 में 43 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतरराट्रीय हॉकी को अलविदा कहा। अपनी आत्मकथा 'गोल' में उन्होंने लिखा था, आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूं।

जब हिटलर को दिखाई देशभक्ति

1936 के ओलिंपिक जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर के शहर बर्लिन में आयोजित हुए थे। तानाशाह की टीम को उसके घर में हराना आसान न था, लेकिन भारतीय टीम ने बिना किसी डर के लगातार जीत दर्ज की। ध्यानचंद्र का जादूई खेल देखकर अगले दिन हिटलर ने भारतीय कप्तान को मिलने के लिए बुलाया। डरते-डरते ध्यानचंद हिटलर से मिलने पहुंचे। उनकी हॉकी की जादूगरी देखकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने उन्हें जर्मनी की तरफ से खेलने की पेशकश कर दी थी। लंच करते हुए हिटलर ने उनसे पूछा कि वे भारत में क्या करते हैं? ध्यानचंद ने बताया कि वे भारतीय सेना हैं। इस बात को सुनकर हिटलर बहुत खुश हुआ और उसने ध्यानचंद के सामने जर्मनी की सेना से जुड़ने का प्रस्ताव रख दिया। हिटलर के ऑफर को मेजर साहब ने बड़ी ही विनम्रता से यह कहकर ठुकरा दिया कि 'मैंने भारत का नमक खाया है, मैं भारतीय हूं और भारत के लिए ही खेलूंगा।' उस समय ध्यानचंद लांस नायक थे और हिटलर ने उन्हें कर्नल की पोस्ट ऑफर की थी।

1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। विश्व हॉकी जगत के शिखर पर जादूगर की तरह छाए रहने वाले मेजर ध्यानचंद का 3 दिसम्बर, 1979 को देहांत हो गया। झांसी में उनका अंतिम संस्कार किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया, जहां वो हॉकी खेला करते थे। 

पढ़ें: फिराक गोरखपुरी जन्मदिन विशेष: मीर और गालिब के बाद सबसे बड़े उर्दू शायर फिराक गोरखपुरी

Add to
Shares
1
Comments
Share This
Add to
Shares
1
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें