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अंगदान है एक मुफ्त प्रक्रिया, फिर क्यों अस्पताल ज़रूरतमंदों से लेते हैं प्रत्यारोपण की मोटी रकम

जन्मदिन मनाने के बाद सड़क दुर्घटना में दुनिया छोड़ने के बाद इंदौर का 'दर्शन' चार लोगों को दे गया ज़िंदगी

22nd Aug 2017
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 लगभग एक लाख रोगियों को कॉर्निया, दिल आदि प्रत्यारोपण की जरूरत रहती है और मिल पाते हैं मात्र दो-ढाई हजार को, लेकिन स्पेन एक ऐसा देश है जहां का हर व्यक्ति अपने अंग डोनेट कर देता है।

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार शटरस्टॉक)

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार शटरस्टॉक)


अंगदान तो मुफ़्त होता है मगर बड़े अस्पताल अंग प्रतिरोपण करने के काफ़ी पैसे लेते हैं। यह भी नहीं देखा गया है, कि किसी ग़रीब की जान बचाने के लिए बड़े अस्पतालों ने उतनी ही उत्सुकता दिखाई हो जितनी कि वो किसी अमीर मरीज़ के अंग प्रतिरोपण के लिए दिखाते हैं।

कुछ लोगों का तो जैसे जन्म ही दूसरों के लिए होता है। इंदौर (म.प्र.) के दर्शन ने अपना जन्मदिन मनाया, उसी दिन वह अपनी मां चंदा के साथ सड़क हादसे में चल बसा। इससे पहले वह चार लोगों को जिंदगी दे गया। वह स्वयं को डोनेट कर गया था, जिसके अंग मानवता के काम आए। इसी तरह अठारह साल की अंजू को बचपन में अपने खिलौने दूसरों को देने में ख़ुशी मिलती थी। दूसरों की ज़िन्दगी में खुशियां भरने की इस आदत को अंजू ने मरने के बाद भी नहीं छोड़ा। एक सड़क हादसे के बाद पीजीआई (चंडीगढ़) के डॉक्टर उसे नहीं बचा पाए। पिता रमेश धीमान और मां ममता ने अंजू के अंग वहीं डोनेट कर दिए, जिससे पांच लोगों की ज़िन्दगी में खुशियां भर गईं।

भारत के कुछ चुनिंदा अस्पतालों में ही अंगदान की सुव्यवस्थाएं हैं। अगर अस्पताल में चार-सदस्यों वाली टीम नहीं है तो अंगदान नहीं हो सकता है। इस संबंध में राज्यों को लगातार पत्रों से अवगत कराया जा रहा है। भारत में मरीज़ को 'ब्रेन डेड' घोषित करने की विधायी प्रक्रिया है। अंगदान तो मुफ़्त होता है मगर बड़े अस्पताल अंग प्रतिरोपण करने के काफ़ी पैसे लेते हैं। यह भी नहीं देखा गया है कि किसी ग़रीब की जान बचाने के लिए कभी बड़े अस्पतालों ने उतनी ही उत्सुकता दिखाई हो जितनी कि वो किसी अमीर मरीज़ के अंग प्रतिरोपण के लिए दिखाते हैं।

भारत में एक रिपोर्ट के अनुसार, किसी भी समय किसी व्यक्ति के मुख्य क्रियाशील अंग के खराब हो जाने की वजह से प्रति वर्ष कम से कम 5 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है। हर वक्त एक से डेढ़ लाख लोगों को गुर्दे की जरूरत होती है, लेकिन मात्र तीन-हजार रोगियों को ही गुर्दा मिल पाता है। ऐसे ही लगभग एक लाख रोगियों को कॉर्निया, दिल आदि प्रत्यारोपण की जरूरत रहती है और मिल पाता है मात्र दो-ढाई हजार को। स्पेन एक ऐसा देश है, जहां का हर व्यक्ति अपने अंग डोनेट कर देता है।

पिछले वर्ष के एक सर्वे के अनुसार भारत में जागरूकता के अभाव में अंग दान की दर 0.8 व्यक्ति प्रति मिलियन है, जबकि स्पेन में यह 36 व्यक्ति प्रति मिलियन, क्रोएशिया में 32 प्रति मिलियन और अमेरिका में 26 व्यक्ति प्रति मिलियन है। हमारे देश में अस्पतालों और संगठनों के सहयोग से इस प्रक्रिया के पूरी होने में मदद ली जा सकती है। सरकारी साइट notto.nic.in, एम्स द्वारा पंजीकृत संगठन ओआरओबी या एनजीओ मोहन (एमओएचएएन) फाउंडेशन है। अंग दान के लिए पंजीकरण किया जाता है। जब चार डॉक्टरों का पैनल छह घंटे के भीतर दो बार ब्रेन स्टेम को मृत घोषित कर दे तो अंग डोनेट किया जा सकता है।

पैनल में अस्पताल के चिकित्सा प्रशासनिक प्रभारी, अधिकृत विशेषज्ञ, न्यूरोलॉजिस्ट/न्यूरो-सर्जन और रोगी का इलाज करने वाला चिकित्सा अधिकारी होता है। स्वस्थ अंग को जल्द सी जल्द प्रत्यारोपित करना होता है। अंग दान निःशुक्ल होता है। जीवित व्यक्ति किडनी (गुर्दा), पैंक्रियाज का एक हिस्सा और लीवर का एक हिस्सा अपने निकटतम रक्त संबंधियों को दे सकता है, लेकिन जिस व्यक्ति का अंग स्वस्थ है, और वह ब्रेन डेड घोषित किया जा चुका है, कई लोगों की जिंदगी बचा सकता है। उसका दिल, दोनों गुर्दे, फेफड़े, जिगर, कॉर्निया, हड्डियां और त्वचा भी दूसरे के उपयोग में लाई जा सकती है।

उम्र, नस्ल, लिंग के विभेद बिना कोई भी व्यक्ति अंग या उत्तक (टिशू) दान कर सकता है। यदि उम्र 18 साल से कम है तो कानूनी रूप से अभिभावक की सहमति आवश्यक होती है। अंग दान करने की शपथ कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं होती है। डोनर को उस व्यक्ति की सहमति लेनी होती है, जो उसकी मृत्यु के बाद अंग जरूरतमंत को सौंप सके।

इन अंगों का दान किया जा सकता है- किडनी, फेफड़ा, हृदय, आँख, कलेजा, पाचक ग्रंथि, आँख की पुतली की रक्षा करने वाला सफेद सख्त भाग, आँत, त्वचा ऊतक, अस्थि ऊतक, हृदय छिद्र और नसें। पूरे देश में ज्यादातर अंग दान अपने परिजनों के बीच में ही होता है।

विभिन्न अस्पतालों में सालाना सिर्फ अपने मरीजों के लिये उनके रिश्तेदारों के द्वारा लगभग 4000 किडनी और 500 कलेजा दान किया जाता है। चेन्नई के केन्द्र में सालाना लगभग 20 हृदय और फेफड़े प्रतिरोपित किये जाते हैं। जो अपनी इच्छा से अपना अंग दान करना चाहते हैं उनके लिये पूरे भारत में ऑनलाइन अंग रजिस्ट्री की एक सुविधा है। वर्ष 2005 में भारत में प्रतिरोपण रजिस्ट्री को भारतीय समाज अंग प्रतिरोपण ने शुरु किया था। वर्ष 2009 में तमिलनाडु सरकार द्वारा शव प्रतिरोपण कार्यक्रम की शुरुआत हुई और उसके बाद स्वास्थ्य विभाग, 2012 में केरला सरकार, चिकित्सा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, तथा 2014 में राजस्थान सरकार द्वारा इसकी शुरुआत की गई।

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (नोटो) की वेबसाइट की भी अधिकारिक रूप से शुरुआत कर दी गई है। यदि अंगदान करने की इच्छा हो तो नोटो की वेबसाइट पर ऑनलाइन पंजीकरण के लिए फार्म भरा जा सकता है। ऐसा करने पर ऑनलाइन ही डोनर कार्ड जारी हो जाता है।

यह भी पढ़ें: जनसंख्या नियंत्रण के लिए नये शगुन के साथ नई नीति की भी दरकार 

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