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इशिता ने स्पीति घाटी में बढ़ाया टूरिज्म, दिलाई नहीं पहचान बेरी उद्योग का हब बनी स्पीति घाटी और मिला सैकड़ों को रोजगार

2nd Apr 2015
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आधुनिक युग में जहां हर कोई शहरों की तरफ रुख कर रहा है वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भारत के गांव और कस्बों में रहकर यहां के विकास कार्यों में लगे हैं। ऐसी ही एक शख्सियत हैं इशिता खन्ना। मात्र 34 साल की उम्र में इशिता ने पहाड़ों के विकास के लिए एक 'इकोस्फीयर' नामक संस्था की नीव रखी। संस्था हिमाचल के स्पीति घाटी क्षेत्र में विकास कार्यों में लगी है। इकोस्फीयर के माध्यम से इशिता पर्यटन एवं बेरी संरक्षण को प्रोत्साहन देती हैं साथ ही इससे ग्रामीणों को रोजगार के अवसर भी मिल रहे हैं। जिससे वहां के ग्रामीणों का जीवन स्तर सुधर रहा है। 

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इशिता खन्ना का जन्म देहरादून में हुआ। बचपन से ही पर्यावरण एवं पहाड़ों के प्रति इशिता का विशेष लगाव रहा। कभी-कभी वे अपनी मां के साथ ट्रैकिंग पर भी जाया करती थीं। उसके बाद इशिता दिल्ली आ गई और दिल्ली विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातक किया। फिर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से समाज शास्त्र में स्नातकोत्तर किया। कॉलेज में प्रोजेक्ट के दौरान इशिता साधुओं, पर्यटकों, मंदिर के अधिकारियों से मिली और उन्होंने तय कर लिया कि वह आगे चलकर इसी तरह के किसी कार्य से जुड़ेंगी। इरादे पक्के थे और दिल में कुछ करने का जज्बा आकार ले रहा था।

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इशिता की इच्छा पर्यावरण से जुड़े कार्यों में थी इसलिए वे हिमाचल की स्पीति घाटी में आ गईं। यह बहुत ही खूबसूरत इलाका था। साल में 6 महीने बर्फ की चादर से ढका रहता था। स्पीति एक ऐसी जगह थी जो पर्यटन के लिहाज से बहुत ही बेहतरीन थी। लेकिन कोई भी पर्यटक यहां आता नहीं था। इशिता ने सोचा क्यों न इस इलाके में विकास कार्य और संरक्षण दोनों साथ किया जाए। लेकिन वो कार्य क्या हो सकता है यह सवाल अभी भी इशिता के सामने था। इशिता ने वहां के स्थानीय लोगों से बातचीत शुरु की और धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के बारे में जानकारी एकत्र कर ली। स्पीति घाटी में छोटी-छोटी बेरियां उगती थीं। ये बेरियां विटामिन सी का सबसे प्रमुख स्त्रोत मानी जाती हैं। इसलिए इनकी मांग भी काफी है।

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साल 2004 में इशिता ने नौकरी छोड़ दी और अपने दो मित्रों के साथ 'म्यूस' नाम से एक एनजीओ की शुरुआत की। इशिता ने बेरी एकत्र करने के लिए स्थानीय महिलाओं का एक समूह बनाया और लोगों को प्रशिक्षित किया। यह योजना पूरी तरह से वहां के स्थानीय लोगों को फायदा पहुंचाने की थी इसलिए किसी ठेकेदार को बीच में नहीं लाया गया। लेह बेरी से गूदा खरीदने का अनुबंध किया गया। इसी दौरान जर्मन एजेंसी जीटीजेड ने उकाई की मदद की उसके बाद मशीनें खरीदी गईं। बेरियों की सफाई व परिरक्षण के लिए स्थानीय महिलाओं को रखा गया। वर्ष 2004 में इशिता ने खुद का ब्रांड बनाने का निश्चय किया।

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एक ओर इशिता सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही थीं लेकिन साथ ही इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने का विचार भी उनके मन में आ रहा था। इशिता ने सोचा क्यों न पर्यटकों को यहां कुछ नया अनुभव कराया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आएं। इसके बाद इशिता ने स्थानीय लोगों के साथ मिल कर पर्यटकों को स्थानीय लोगों के घरों में सस्ते दामों में ठहराने की योजना बनाई। इससे लोगों की आय तो बढ़ी ही साथ ही पर्यटकों को पहाड़ी इलाकों को काफी करीब से जानने का अनुभव भी मिल रहा था। पर्यटक यहां आते, लोगों के घरों में रहते, उनके साथ खाना बनाते, खाते व बातें करते। इसके अलावा स्थानीय युवाओं को यात्रियों को इलाके में घुमाने का भी प्रशिक्षण दिया गया। यह सब पर्यटकों के लिए बिलकुल नया और मजेदार अनुभव था। इससे ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आने लगे। इंटरनेट के माध्यम से यहां के बारे में लोगों को जानकारी दी गई और आज देश ही नहीं विदेशों से भी पर्यटक यहां आते हैं। इस बात का भी खास ख्याल रखा जाता है कि किसी भी प्रकार से प्रकृति को नुकसान न पहुंचाया जाए। यहां प्लास्टिक का प्रयोग न के बराबर किया जाता है। पर्यटक कार्य योजना प्रतिवर्ष लगभग 35-40 लाख रुपए कमाई करती है।

इकोस्पीयर अपनी वार्षिक आय का 50 प्रतिशत खुद सृजन कर लेती है बाकी का पैसा सहायता देने वाली एजेंसियों से आता है। इशिता खन्ना को उनके बेहतरीन कार्यों के लिए 2008 में वाइल्ड एशिया रिस्पोंसिबल टूरिज्म अवॉर्ड, सन् 2010 में वर्जिन हॉलिडे रिस्पोंसिबल टूरिजम अवॉर्ड और सन् 2010 में ही सीएनएन आईबीएन रियल हीरोज अवॉर्ड दिया गया।

ये अवॉर्ड इशिता को प्रेरणा देते हैं। इशिता का पथ प्रदर्शन करते हैं। इतनी छोटी उम्र में इतना सब कर पाना कोई आसान काम नहीं था लेकिन इशिता ने कर दिखाया। इशिता की संस्था ने जहां मजदूरों की मासिक आय बढ़ाई वहीं स्पीति घाटी में टूरिज्म को भी बढ़ाया। पर्यावरण की रक्षा के लिए विभिन्न ठोस कदम भी उठाए। इशिता खन्ना आज युवाओं के लिए एक उदाहरण, एक परफेक्ट रोल मॉडल बन गई हैं।

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