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साहित्य की चोरी पर लगाम लगाएगा 'रेग्यूलेशन 2017'

7th Sep 2017
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साहित्यिक सामग्रियों की चोरी कर अपने लिट्रेचर में शामिल कर लेना, कोई नई बात नहीं है। जब से इंटरनेट आया है, ऐसी घटनाएं आए दिन की बात हो चुकी हैं। साहित्यिक चोरों की बेशर्मी तो इस हद तक बढ़ गई है कि दूसरे की कविता वे सरेआम मंचों से सुनाने लगे हैं। ऐसे कई वाकये मेरी स्वयं की जानकारी में हैं, मेरी आंखों के सामने हुए हैं, जब बड़े कवियों की रचनाएं उनके सामने ही, उनके कविता पढ़ने से पहले श्रोताओं को सुना दी गईं। 

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


साहित्यिक चोरी रोकने के लिए रेग्यूलेशन 2017 तैयार किया गया है। इसके आधार पर रिसर्च स्कालर्स, शिक्षक या विशेषज्ञ अपनी-अपनी राय भेज सकते हैं। यह रेग्यूलेशन नौ पन्नों का है। कमेटी ने अपनी सिफारिश में लिखा है कि साहित्य, रिसर्च की चोरी पर जीरो टॉलरेंस पॉलिसी होनी चाहिए। 

वर्तमान में 'प्लेगरिज्म' अकादमिक बेईमानी समझी जाती है। प्लेगरिज्म कोई अपराध नहीं है बल्कि नैतिक आधार पर अमान्य है। इंटरनेट से कोई लेख डाउनलोड कर लेना, किसी और को अपने लेखन के लिए काम पर रख लेना, दूसरे के विचारों को अपने विचार दिखाने का प्रयास करना भी साहित्यिक चोरी मानी जाती है।

साहित्यिक सामग्रियों की चोरी कर अपने लिट्रेचर में शामिल कर लेना, कोई नई बात नहीं है। जब से इंटरनेट आया है, ऐसी घटनाएं आए दिन की बात हो चुकी हैं। साहित्यिक चोरों की बेशर्मी तो इस हद तक बढ़ गई है कि दूसरे की कविता वे सरेआम मंचों से सुनाने लगे हैं। ऐसे कई वाकये मेरी स्वयं की जानकारी में हैं, मेरी आंखों के सामने हुए हैं, जब बड़े कवियों की रचनाएं उनके सामने ही, उनके कविता पढ़ने से पहले श्रोताओं को सुना दी गईं। चोर बाजी तालियों की बाजी मार ले गया और जिन कवि जी ने रचना लिखी थी, वह हाथ मलकर रह गए। पूछताछ में चोर कवि बेशर्मी से जवाब दे देते हैं कि अरे राम का नाम लेकर दुनिया जी रही है, आपकी एक कविता मैंने पढ़ दी, कौन सी आफत आ गई। अब साहित्यिक चोरी को कानूनी अपराध बनाने की तैयारी हो रही है। यूजीसी ने इस संबंध में नियम तैयार कर लिए हैं। विशेषज्ञों एवं छात्रों से 30 सितंबर तक इस पर अपनी राय देने को कहा गया है।

यूजीसी के सचिव पीके ठाकुर ने विश्वविद्यालयों समेत छात्रों के नाम पब्लिक नोटिस जारी किया है कि रिसर्च और साहित्य चोरी की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसी के चलते यूजीसी ने दूसरे के ज्ञान को अपना बनाने के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए विशेषज्ञों की कमेटी बनाई थी, जिसकी सिफारिशों के आधार पर अब साहित्यिक चोरी रोकने के लिए रेग्यूलेशन 2017 तैयार किया गया है। इसके आधार पर रिसर्च स्कालर्स, शिक्षक या विशेषज्ञ अपनी-अपनी राय भेज सकते हैं। यह रेग्यूलेशन नौ पन्नों का है। कमेटी ने अपनी सिफारिश में लिखा है कि साहित्य, रिसर्च की चोरी पर जीरो टॉलरेंस पॉलिसी होनी चाहिए। यदि कोई रिसर्च स्कॉलर्स दस फीसदी सामग्री की चोरी करता पकड़ा गया तो कोई जुर्माना नहीं लगेगा। चालीस फीसदी कंटेंट चुराने वाले छात्र को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। साठ फीसदी सामग्री चोरी का इस्तेमाल करने पर रजिस्ट्रेशन तक रोकने की सिफारिश की गई है।

यदि कोई शिक्षक 40 फीसदी तक साहित्यिक चोरी करता पकड़ा जाता है तो लिखित सामग्री को हटाने के साथ ही एक साल तक उसके प्रकाशन पर भी रोक लगेगी। 60 फीसदी से अधिक की चोरी करने पर लिखित सामग्री हटाने के साथ-साथ तीन साल तक प्रकाशन पर रोक लगाने की भी तैयारी है। वहीं, ऐसे शिक्षक को तीन साल तक के लिए अंडरग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, एमफिल और पीएचडी स्कॉलर्स का गाइड न बनाने की भी सिफारिश की गई है। यदि छात्र गलती करता है तो रजिस्ट्रेशन पर रोक लग जाएगी, जिससे उसकी डिग्री भी ब्लॉक होगी। वहीं, शिक्षक यदि गलती करता है कि उसे एक साल तक प्रकाशन पर रोक के साथ इंक्रीमेंट रुकेगा। वहीं, यदि बार-बार गलती की जाती है तो उसे नौकरी से निकालने का भी प्रावधान होगा।

एमफिल और पीएचडी रिसर्च स्कॉलर्स यदि अपनी थीसिस या रिसर्च में किसी व्यक्ति द्वारा तैयार सामग्री का प्रयोग करते हैं तो उन्हें इसकी जानकारी देनी होगी। यदि कोई स्कॉलर साहित्यिक चोरी करता पकड़ा जाता है तो उसका रजिस्ट्रेशन तक रद्द हो सकता है। वहीं, यदि शिक्षक ऐसा करता पकड़ा गया तो उसके इंक्रीमेंट, प्रकाशन पर रोक लग सकती है। नियमों का बार-बार उल्लंघन करने पर शिक्षक की नौकरी भी जा सकती है।

किसी दूसरे की भाषा, विचार, उपाय, शैली आदि का अधिकांशतः नकल करते हुए अपने मौलिक कृति के रूप में प्रकाशन करना साहित्यिक चोरी है। यूरोप में अट्ठारहवीं शती के बाद ही इस तरह का व्यवहार अनैतिक व्यवहार माना जाने लगा। इसके पूर्व की शताब्दियों में लेखक एवं कलाकार अपने क्षेत्र के श्रेष्ठ सृजन की हूबहू नकल करने के लिये प्रोत्साहित किये जाते थे। साहित्यिक चोरी तब मानी जाती है, जब हम किसी के द्वारा लिखे गए साहित्य को बिना उसका सन्दर्भ दिए अपने नाम से प्रकाशित कर लेते हैं। इस प्रकार से लिया गया साहित्य अनैतिक मन जाता है और इसे साहित्यिक चोरी कहा जाता है। आज जब सूचना प्रोद्योगिकी का विस्तार तेजी से हुआ है, ऐसे में पूरा विश्व एक ग्लोबल विलेज में तब्दील हो गया है और ऐसे अनैतिक कार्य आसानी से पकड़ में आ जाते हैं। वर्तमान में 'प्लेगरिज्म' अकादमिक बेईमानी समझी जाती है। प्लेगरिज्म कोई अपराध नहीं है बल्कि नैतिक आधार पर अमान्य है। इंटरनेट से कोई लेख डाउनलोड कर लेना, किसी और को अपने लेखन के लिए काम पर रख लेना, दूसरे के विचारों को अपने विचार दिखाने का प्रयास करना भी साहित्यिक चोरी मानी जाती है।

साहित्य चोरी, या किसी और के शब्दों अथवा विचारों को अपना कहने से व्यक्तियों के लिए जीवन की किसी भी स्थिति में समस्या उठ खड़ी हो सकती है। छात्र इसके कारण अनुत्तीर्ण किए जाते हैं और जो बिडेन को तो 1988 में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की कीमत देनी पड़ी थी। कुछ विधियां उल्लेखनीय हैं जिनसे साहित्यिक चोरी से बचा जा सकता है। अमेरिकन हेरिटेज डिक्शनरी में साहित्यिक चोरी को ऐसे परिभाषित किया है- 'किसी अन्य लेखक के विचारों तथा भाषा का अनधिकृत उपयोग या नक़ल करके उसको अपनी मूल कृति के रूप में प्रस्तुत करना।' इस प्रकार साहित्यिक चोरी का अर्थ शब्द दर शब्द दूसरे के काम की पूरी नक़ल करना ही नहीं है, बल्कि उसकी क़रीबी नक़ल भी है। समानार्थक शब्दों या अन्य चुनिन्दा शब्दों का प्रयोग आपको साहित्यिक चोरी से छुटकारा नहीं दिला देता है। आप जो भी लिखें, वह अपने ही शब्दों में और उसके स्त्रोत भी साथ में दीजिये। आप उसकी एक ऐसी संक्षिप्त व्याख्या अपने शब्दों में लिख सकते हैं, जो कि मूल पाठ को ही दूसरे शब्दों में लिखने जैसा न लगे।

विषय को समझ जाने से, किसी और के द्वारा दी गई परिभाषा के पुनर्कथन के स्थान पर आपके द्वारा उसे अपने शब्दों में लिखे जाने की संभावना बढ़ जाती है। आप जिस विषय पर लिखना चाहते हैं, उसकी जानकारी प्राप्त करिए। यह इंटरनेट पर भी मिल सकती है और किताबों में भी, हालांकि किताबें लगभग सदैव ही इंटरनेट से अधिक प्रामाणिक होती हैं। यदि आप केवल एक स्त्रोत पर ही निर्भर करेंगे – दास प्रथा के संदर्भ में कोई पुस्तक – संभावना यह है कि आप जाने अनजाने नक़ल या साहित्यिक चोरी कर ही बैठेंगे। यदि आप दासत्व के संबंध में तीन पुस्तकों को पढ़ें, एक प्रामाणिक एवं दो मूल स्त्रोत, तब अनजाने में साहित्यिक चोरी की संभावना बहुत कम हो जाएगी। असल बात है सामग्री को समझ पाना तथा उसका अर्थ अपने शब्दों में बताने की योग्यता। दूसरे लेखक की सामग्री बहुत ध्यान दे कर मत पढ़िये अन्यथा आपका झुकाव लेखक के वक्तव्य को ही फिर से कह देने का हो जाएगा। 

आपको अपने लेख में संदर्भ सूची या उद्धृत कार्यों का विवरण अवश्य सम्मिलित करना चाहिए। यदि आप किसी लेखक के कार्य से कोई उद्धरण पूरा पूरा ले लेते हैं, तब आपको उस उद्धरण का संदर्भ अवश्य देना चाहिए। अन्यथा नहीं बताए जाने की स्थिति में अधिकांश अध्यापक स्टैंडर्ड एम एल ए प्रारूप स्वीकार कर लेते हैं। आप अनजाने की साहित्यिक चोरी से बच सकते हैं, उद्धरण चिन्ह डालकर (यदि वास्तविक उद्धरण का उप्पयोग किया गया हो) तथा उद्धरण के या उस स्त्रोत की बात की संक्षिप्त व्याख्या के तुरंत बाद, स्त्रोत के संदर्भ को दे कर। यदि आप इसमें देर करेंगे, या उद्धरण चिन्ह डालने को या उद्धृत करने को अपने लेखन के अंतिम चरण के लिए छोड़ देंगे, तब इसका छूट जाना या भूल जाना आपको साहित्यिक चोरी के लिए समस्या में डाल सकता है।

साहित्यिक चोरी से बचने के अनेक तरीक़े हैं। अपनी व्याख्या के अंदर ही स्त्रोत का विवरण दे देना चाहिए। ऐसी उक्तियों, जिनको नक़ल किया हुआ समझा जा सकता है, को उद्धरण चिन्हों में लिखना चाहिए। साहित्यिक चोरी न केवल अकादमिक दृष्टि से बुरी है, बल्कि यदि आप कॉपीराइट भंग करते हैं, तो वैधानिक अपराध भी माना जाएगा। सामान्य नियम यह है कि तथ्यों को कॉपीराइट नहीं किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि आप अपने लेखन का समर्थन करने के लिए जो भी तथ्य खोज सकें उसका उपयोग कर सकते हैं। हालांकि तथ्य तो कॉपीराइट नहीं किए जा सकते हैं, परंतु उनको व्यक्त करने वाले शब्द किए जा सकते हैं, विशेषकर तब जबकि वे शब्द मौलिक या विशिष्ट हों। आप अन्य सामग्रियों से प्राप्त जानकारी का उपयोग अपने लेख में कर सकते हैं, परंतु उसको अभिव्यक्त करने के लिए आपको अपने शब्दों का ही प्रयोग करना होगा। इससे बचने के लिए आप उपलब्ध तथ्य लेकर उन्हें अपने शब्दों में रख सकते हैं। उक्तियों में कितना अंतर होना चाहिए, इसकी भी कुछ तमीज़ होती है: मात्र अल्पविराम लगाना काफ़ी नहीं है, तथापि, व्याकरण बदल देना काफ़ी हो सकता है।

अकादमिक शोध में प्रत्येक चीज़ उद्धृत नहीं होनी चाहिए अन्यथा शोध करने वालों के लिए वह बहुत कष्टदायी हो जाएगा। सामान्य बुद्धि वाली टिप्पणियाँ, लोक साहित्य, किंवदंतियाँ, तथा जानी पहचानी ऐतिहासिक घटनाएँ अपने शोध या निर्णायक लेख में उद्धृत मत करिए। यदि आपने इन्हीं अनुभवों, अंतर्दृष्टियों, कृतियों, या सोचों को अकादमिक रूप से प्रस्तुत किए गए किसी पिछले या प्रकाशित हुये असाइनमेंट में दिया हो, तब उनके पुनः इस्तेमाल के लिए पहले आपको अपने प्रशिक्षक की अनुमति लेनी होगी तथा, यदि आपको अनुमति मिल जाती है, तब आत्म-उद्धरण को सम्मिलित करना होगा। आपके अपने वीडियो, प्रेजेंटेशन्स, संगीत, और अन्य मीडिया जो आपके द्वारा बनाया तथा शुरू किया गया हो। तथापि, यदि आपने यही वीडियो, प्रेजेंटेशन्स, संगीत, और अन्य मीडिया जो आपके द्वारा बनाये या शुरू किए गए हों, किसी पिछले प्रकाशित हुये अकादमिक असाइनमेंट में प्रयोग किए गए हैं, तब उनके पुनः इस्तेमाल के लिए पहले आपको अपने प्रशिक्षक की अनुमति लेनी होगी। यदि आपको अनुमति मिल जाती है, तब आत्म-उद्धरण को सम्मिलित करना होगा। यदि आपको यह चिंता है कि आपके द्वारा दी गई कोई चीज़ किसी दूसरे की लगती है, तो संभवतः यह इसलिए है क्योंकि वह दूसरे की ही होगी। कुछ विद्यालयों में ऐसे प्रोग्राम/सेवाएँ होती हैं जिनसे लेखों की जांच साहित्यिक चोरी के लिए की जा सकती है। यदि आप बहुत चिंतित हैं, तब शायद आप ये सेवाएँ लेना चाहेंगे।

यदि आप कोई ऐसी चीज़ इस्तेमाल करते हैं जो विशुद्ध आपकी ही है, तब कम से कम यह तो बताइये कि यह आपका विचार है अन्यथा, आपके अध्यापक भूल से, उसको बिना उद्धृत की गई सामग्री समझ कर, आप पर ही साहित्यिक चोरी का आक्षेप लगा देंगे। यदि आप ईमानदारी से कोई लेख या निबंध लिख रहे हों, तब साहित्यिक चोरी की संभावना बहुत कम हो जाती हैं। यदि आप इस तथ्य से अवगत हैं कि आप किसी और की कृति की नक़ल कर रहे हैं, तब आप पकड़े ही जाएँगे। चीजों को अपने शब्दों में लिखने के लिए यह एक सुझाव है। गूगल के भाषा टूल का इस्तेमाल करके लेख को किसी अन्य भाषा में अनुवादित कर लीजिये। जैसे कि अंग्रेजी से हिंदी, उर्दू में। तत्पश्चात उसे वापस गूगल के भाषा टूल में पोस्ट करिए और उसको किसी अन्य भाषा में अनुवादित कर लीजिये। उसके बाद उसका अनुवाद अंग्रेजी में कर दीजिये। अब आपके पास कठिनाई से समझ में आने वाला, टूटी फूटी अंग्रेजी में लिखा लेख होगा। लेखों को पढ़कर और शोध करके आपने जो जानकारी प्राप्त की है, उसका उपयोग करते हुये, अब आप टूटी फूटी अंग्रेजी वाले लेख को ठीक कर सकते हैं तथा उसपर अपने प्रभाव को भी डाल सकते हैं

ये भी पढ़ें- विश्व पत्रकारिता: कितनी आज़ाद, कितनी सुरक्षित

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