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तस्वीरों के ज़रिए संकट और तबाही की कहानी कहतीं आरती कुमार राव

चित्रों के जरिये कहानी कहने की कला जानती हैं आरती...ब्रह्मपुत्र और सुंदरवन इलाके से खासा लगाव...फोटोग्राफर और लेखक हैं आरती...

7th Oct 2015
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मैंने कभी भी अपने आपको एक फोटोग्राफर या लेखक नहीं माना। ये कहना है आरती कुमार राव का। जो एक बेहतरीन फोटोग्राफर और लेखक हैं। वो बताती हैं कि वो सिर्फ कहानियां बताती हैं। सच्ची कहानियां, आम लोगों से जुड़ी ऐसी कहानियां जो पारंपरिक जीवन से जुड़ी हैं और समय के साथ उनमें बदलाव देखने को मिला है। उनका कहना है कि उनका मुख्य ध्यान उन मुद्दों पर रहता है जहां पर मुख्यधारा से जुड़ा मीडिया ध्यान नहीं देता। आरती के मुताबिक वो जो कर रही हैं उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। इसके लिए वो फोटो, वीडियो, मानचित्र, ग्राफिक्स की मदद लेती हैं। 

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आरती लोगों की जिंदगी को करीब से जानने के लिए सालों तक उनके बीच रहती हैं इतना ही नहीं इस दौरान वो सरकार की नीतियों में परिवर्तन और जमीन के इस्तेमाल में हो रहे बदलाव पर नजर रखती हैं। आरती को हमेशा चित्रों के जरिये कहानी कहने की कला से लगाव रहा है। वो बताती हैं कि उनकी कहानी तब तक अधूरी है जब तक उसे केवल चित्रों या सिर्फ शब्दों के जरिये बताया जाए। इसमें दोनों का मिश्रण होना चाहिए। 

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आरती के पास ऐसे दस्तावेज हैं जो बताते हैं की पिछले दशकों के दौरान कैसे हमारे ईकोसिस्टम और आजीविका में बदलाव आया है। ‘रिवर डायरी’ ये ऐसा प्रोजेक्ट है जो मील का पत्थर साबित हुआ है। इसमें उन्होने हमारे ईकोसिस्टम और नदियों के आसपास रहने वाले समुदायों पर गहरी छानबीन की है। आरती विस्तार से बताती हैं कि उन्होने ग्रेजुएशन के दिनों में ही तय कर लिया था कि वो ब्रह्मपुत्र पर काम करेंगी। इसके लिए उन्होने ल्हासा का दौरा भी किया था जहां पर ब्रह्मपुत्र नदी को यरलुंग टसंगपो के नाम से भी जानते हैं। इतना ही नहीं सरकार ने एक ही बेसिन में 160 बांधों का निर्माण कराया। ऐसे में नदी के आसपास की जीवन रेखा पर क्या प्रभाव होगा? यहां के ईकोसिस्टम पर क्या असर पड़ेगा? ये भी कम दिलचस्प नहीं है। ब्रह्मपुत्र में काफी जटिलताएं हैं। उसकी कहानी काफी उलझी हुई है। जो आरती के दिमाग में हर वक्त घूमते रहती थी।

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आरती का कहना है कि उनके माता पिता ने कभी भी किसी मामले में रोक टोक नहीं की। वो हमेशा दूसरों से अलग और नई चीजों की जानकारी जुटाने के लिए प्रेरित करते थे। वो कई बार अपने पिता और बहन से साथ चिड़ियायें देखने जाती थी और उनके स्कैच तैयार करती थी। उनको कैलीग्राफी और टेनिस खेलने का भी काफी शौक था। बात अगर पढ़ाई की हो तो इंग्लिश लिटरेचर और साइंस आरती के लिए काफी महत्वपूर्ण विषय थे। यही वजह है कि आरती ने बॉयोफिजिक्स में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की लेकिन जल्द ही उनको महसूस हो गया कि वो अपनी सारी जिंदगी प्रयोगशाला में नहीं गुजार सकतीं। जिसके बाद उन्होने रिपोर्टर बनने का फैसला लिया। 

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लेकिन जिंदगी में कुछ ओर ही लिखा था यही वजह है कि उनको शादी के बाद अमेरिका जाना पड़ा। यहां पर उन्होने करीब आठ सालों तक कॉरपोरेट सेक्टर में काम किया। देश वापस लौटने से पहले वो जो करना चाहती थी वो सबकुछ वहां किया जैसे लिखना और फोटो लेना।

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आरती का कहना है कि अपने जुनून को हकीकत में बदलना किसी चुनौती से कम नहीं होता है। शुरूआत में उन्होने परामर्श देने का काम शुरू किया और वहां से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल उस काम में किया जिसे वो करना चाहती थी। लेकिन ये कोई नियमित आमदनी नहीं थी लिहाजा अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए उन्होने अनुदान और फैलोशिप के लिए लिखना शुरू किया। ऐसे में कई लोग सामने आये जिनको उनके काम पर विश्वास था। 

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आरती का कहना है कि उनकी कहानियों ने हमेशा उनको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। लेकिन इसके साथ साथ आरती का मानना है कि उनकी जिंदगी में कुछ लोग ऐसे भी मिले जिन्होने उन पर जुआ खेला और उनके काम को सराहा। सोसाइटी मैगजीन की सूमा वर्गीज ने उनको पहली बार रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दी और जल्द ही प्रेम पणिक्कर से उनका परिचय हुआ। आरती का मानना है कि प्रेम एक दूरदर्शी संपादक हैं। ‘रिवर डायरी’ लिखने में उन्होने आरती की काफी मदद की और उनको कई अच्छे सुझाव दिये।

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आरती को अपने काम के दौरान कई ऐसे अनुभवों से गुजरना पड़ा जिसने उनको अंदर तक झकझोर कर रख दिया। वो बताती हैं कि एक बार वो ब्रह्मपुत्र के उत्तरी किनारे पर थी जहां पर जमीन का काफी ज्यादा कटाव हुआ था। यहां पर उनकी मुलाकात एक साठ साल के व्यक्ति से हुई। उसने बताया कि वो दूध बेचने का काम करता है। उसने आरती से कहा कि जब वो अगली बार इस इलाके में आये तो वो उसके घर भी आये वो आरती के लिए खाना बनाकर रखेगा। इतना ही नहीं उस व्यक्ति ने आरती को अपना फोन नंबर भी दिया। उसके जाने के बाद आरती को पता चला की जमीन के कटाव के कारण वो व्यक्ति अपनी खेतीबाड़ी, पशु, जमीन सबकुछ ब्रह्मपुत्र के कटाव के कारण खो चुका था। बावजूद उसका दिल इतना बड़ा था कि वो सबकुछ भूल कर अपनी जिंदगी को नये सिरे से शुरू करना चाहता था। 

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इसी तरह आरती एक और उदाहरण देते हुए बताती हैं कि एक बार उनकी मुलाकात मोहम्मद इनामुल हक से हुई। वो पश्चिम बंगाल में गंगा के बेसिन में रहता था, लेकिन बार बार गंगा की धारा बदल जाने कारण उसका घर सात बार उजड़ चुका था। वो धैर्य रखकर सरकार की उदासिनता और इंजीनियरों की गलती भुगत रहा था। तब आरती ने पूछा कि उसे गुस्सा नहीं आता जिसके जवाब में उसने अपना मुंह पोछते हुए और हंसते हुए एक प्लेट उठाई और आरती से उल्टा सवाल दागा कि कब तक कोई इस प्लेट को पकड़ कर रख सकता है। उसने कहा कि इसमें इसमें काफी कुछ भरा जा सकता है उसके बाद ये खाली हो जाती है। ठीक इसी तरह उसका गुस्सा भी है जो काफी बढ़ने के बाद काफूर हो जाता है। उसने बताया कि उसकी उम्र 60 साल की है और 7 बार उसके सर से छत छिन चुकी है और वो ये नहीं जानता कि ऐसा कब तक चलेगा। बावजूद वो इस बात को लेकर खुश है कि फिलहाल उसके पास सर छुपाने के लिए जगह है।

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आरती उन चुनिंदा पत्रकारों में से एक हैं जो सुंदरबन इलाके की आपदाओं से अच्छी तरह परिचित हैं। यही वजह है कि उन्होने कई बार इस इलाके के बारे में विस्तृत रूप से लिखा है। ऐसा समझा जाता है कि महिला यात्रियों के लिए भारत ठीक जगह नहीं है लेकिन आरती इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। उनका कहना है कि जब भी वो देश के किसी कोने में होती हैं भले ही वो राजस्थान हो या असम, वो कभी भी अपने आपको असुरक्षित नहीं मानतीं। उनका कहना है कि स्थानीय लोग बिना किसी हिचक के आपकी मदद को तैयार रहते हैं। आरती फिलहाल बेंगलौर शहर के इतिहास पर काम कर रही हैं वो बताना चाहती हैं कि कैसे एक हर तरीके से समृद्ध इलाका 40 सालों में सूखे का सामना कर रहा है। बावजूद इसके जल्द ही वो ब्रह्मपुत्र और सुंदरबन जैसे इलाकों में लौटना चाहती हैं।

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