79 साल का दूल्हा और 66 साल की दुल्हन, ढेरों स्टीरोटाइप तोड़ते हुए सांगली के इस कपल ने रचाई शादी

By शोभित शील
October 08, 2021, Updated on : Fri Oct 08 2021 02:31:31 GMT+0000
79 साल का दूल्हा और 66 साल की दुल्हन, ढेरों स्टीरोटाइप तोड़ते हुए सांगली के इस कपल ने रचाई शादी
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कहते हैं रिश्ते शुरू करने की कोई निश्चित उम्र नहीं होती और अगर ये रिश्ता जीवन भर के लिए जुड़ रहा हो तो मामला और भी खास हो जाता है। महाराष्ट्र में एक ऐसे ही रिश्ते की शुरुआत हुई है जो आज लोगों के बीच मिसाल बन गया है। दरअसल महाराष्ट्र के सांगली जिले में एक बड़ी ही खास शादी का आयोजन हुआ है जहां दूल्हे की उम्र 79 साल और दुल्हन की उम्र 66 साल है।


यह खास शादी सांगली जिले के मिराज शहर के पास स्थित आस्था बेघर महिला केंद्र में सम्पन्न हुई है जहां दोनों ने अपने जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत की है। तमाम स्टीरियोटाइप तोड़ती यह शादी दरअसल उनके बेघर साथियों की मौजूदगी में ही सम्पन्न हुई है।

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इस शादी में दोनों के रिश्तेदार, गाँव वाले और संस्था के अन्य साथी शामिल हुए थे। आज इस शादी को लोग एक मिसाल की तरह देख रहे हैं जहां पुरानी रूढ़िवादी सोच पर सीधी चोट हुई है।

पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश

66 वर्षीय दुल्हन शालिनी की शादी 79 साल के दादा साहेब सालुंखे के साथ हुई है। इस अनूठे विवाह समारोह को कोरोना प्रोटोकॉल के सभी नियमों को ध्यान में रखते हुए आयोजित किया गया है। शादी के कार्यक्रम के दौरान रीति-रिवाज़ का पालन किया गया और दोनों ने उम्र के बंधनों को तोड़ते हुए एक दूसरे को माला पहनाई।


वरमाला पहना लेने के बाद दोनों ने ही महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले की तस्वीरों को प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद भी लिया। इतना ही नहीं, शादी के कार्यक्रम के दौरान ही शालिनी और दादा साहेब ने एक पौधे को सींचते हुए लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया।

अकेलेपन से जूझ रहे थे दोनों

पुणे की रहने वाली शालिनी पाशन खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रही थीं लेकिन एक दिन अचानक उनके बेटे और पति की अकाल मृत्यु हो जाने के बाद से वे बिल्कुल अकेली पड़ गईं। इसके बाद शालिनी का जीवन एकदम खाली सा हो गया और उन्होने बेघर महिला आश्रम पहुँचकर अपना बचा हुआ जीवन यहीं बिताने का फैसला कर डाला।


जबकि तसगांव के मूल निवासी दादा साहेब सालुंखे एक रिटायर्ड शिक्षक हैं और अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद वे भी पूरी तरह अकेले पड़ गए थे। इस दौरान दादा साहेब सालुंखे के बच्चे अपने जीवन में पूरी तरह व्यस्त थे जबकि दादा साहेब सालुंखे अपने इस अकेलेपन से बाहर आना चाहते थे। 

दादा साहेब सालुंखे इसके बाद ही आस्था बेघर महिला केंद्र के संपर्क में आए और तब उनकी मुलाक़ात शालिनी से हुई। आखिर में दादा साहेब सालुंखे ने अपने बच्चों से इस बारे में बात की और उनके बच्चों ने उनकी इस शादी के लिए खुशी-खुशी सहमति दे दी।

की गई थी काउंसलिंग

शादी से पहले बुजुर्ग वर-वधू दादा साहेब सालुंखे और शालिनी की काउंसलिंग भी की गई थी और इसी के बाद ही दोनों ने एक-दूसरे को समझते हुए अपना बचा हुआ उज्ज्वल जीवन एक-दूसरे के साथ बिताने का फैसला किया था। शादी के रस्मों के साथ ही यहाँ पर सारी कानूनी औपचारिकताएँ भी पूरी की गई हैं।


इस शादी में दोनों के रिश्तेदार, गाँव वाले और संस्था के अन्य साथी शामिल हुए थे। आज इस शादी को लोग एक मिसाल की तरह देख रहे हैं जहां पुरानी रूढ़िवादी सोच पर सीधी चोट हुई है।


Edited by Ranjana Tripathi

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