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HIV पाॅज़ीटिव होने के बावजूद नहीं मानी हार, दुनिया को दिखाई ‘ज्योति’

1st Jul 2015
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जबरदस्ती के हुए तीन गर्भपातों में संक्रमित खून के चलते आई जानलेवा बीमारी की चपेट में....

बचपन से सौतेली माँ और विवाह के बाद जिद्दी पति भी नहीं तोड़ पाए ज्योति धावले का जीवट...

पहले पति से तलाक के बाद कई आशंकाओं के बीच की दूसरी शादी और अब जी रही हैं सफल और खुशहाल जिंदगी...

महिला सशक्तिकरण और एचआईवी और एड्स पडितों की मदद को बनाया जीवन का उद्देश्य...


वर्ष 2004 से 2006 के बीच ज्योति धावले को तीन बार गर्भपात के मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा। उन्हें ऐसा बेहद मजबूरी में करना पड़ा था और घृणा और शर्मिंदगी के भाव से ग्रस्त ज्योति ने उन तीनों अस्पतालों की रिपोर्ट्स को नष्ट कर दिया जहां उन्हें इन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा था। इसके बाद वे वर्ष 2006 में एक बार फिर एक नए अस्पताल में अपना चौथा गर्भपात करवाने गईं लेकिन इस बार शायद तकदीर को कुछ और ही मंजूर था और उन्हें बिना गर्भपात करवाये ही लौटना पड़ा। ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि उनकी रिपोर्ट नकारात्मक थी - वे एचआईवी पाजीटिव थीं यानी एड्स की मरीज।

जीवन के 38 बसंत पार कर चुकी ज्योति का जीवन बचपन से ही बेहद विषम परिस्थितियों में बीता। एक वायुसेना अधिकारी की बेटी होने के नाते सबको लगता था कि उनका बचपन बेहद शानदार बीता होगा लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी। ज्योति कहती हैं ‘‘मैं एक टूटे हुए परिवार का हिस्सा थी और अपनी सौतेली माँ की वजह से मेरा जीवन बचपन में पढ़ी सिंड्रेला की कहानी जैसा ही हो गया था। वह मुझे कमरे में बंद कर देती थी और भूखा रखती थी। दोपहर का भोजन मेरे लिये एक विलासिता की तरह था। मेरी दुनिया में दूसरों की सहायता का भी कोई स्थान नहीं था।’’ अपनी सौतेली बहन को मिलने वाला प्यार और दुलार अकसर उन्हें उनके व्यर्थ होने की भावना से रूबरू करवाता।

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अपने साथ बचपन में हुए इस बर्ताव के बावजूद ज्योति के मन में अपने पिता के प्रति किसी भी प्रकार की शिकायत का भाव नहीं है। ‘‘मैं उनकी पहली पैदाइश हूँ। घर के माहौल के मद्देनजर वे मेरे प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते थे, लेकिन सबकुछ कहा और व्यक्त भी नहीं किया जाता। उसे सिर्फ समझा जा सकता है।’’

इसके अलावा ज्योति कुछ तंत्रिकीय दिक्कतों के चलते सुनने की एक बीमारी से भी ग्रसित हैं। वे बताती हैं, ‘‘मैं सिर्फ 80 डेसिबल या उससे अधिक की ध्वनि ही सुन सकती हूँ। यह एक रेल के इंजन की सीटी के बराबर की आवाज है। मैं आमने-सामने होने वाली बातचीत को होठों के हिलने के माध्यम से पढ़ने में सक्षम रहती हूँ। इसके अलावा मैं संवाद के लिये सिर्फ लिखित माध्यम पर ही निर्भर रहती हूँ। मैं कई प्रकार के वाणी दोष से भी पीडित हूँ। मैं सी, एक्स और एस जैसे शब्दों का ठीक उच्चारण नहीं कर पाती हूँ। ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही नहीं है बल्कि मेरे जैसे सुनने में परेशानी से पीड़ित और भी लोग इस प्रकार से कुछ शब्दों के उच्चारण में या उन्हें समझने में परेशानी महसूस करते हैं।’’

और वे मात्र 3 वर्ष की उम्र से इस अक्षमता के साथ अपना जीवन जी रही हैं। उन्हें यह बताया गया था कि वे अपने पिता के साथ बाइक पर कहीं जा रही थीं और अचानक पंचर होने के चलते वे गिर गईं और सुनने की शक्ति खो बैठीं, हालांकि उन्हें इस बारे में कुछ भी याद नहीं है। वे आगे कहती हैं, ‘‘डाक्टर मेरे परिवार द्वारा सुनाई गई इस कहानी को सिरे से झुठलाते हैं। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मेरे सुनने की शक्ति इतनी क्षीण है कि ऐसा सिर्फ शारीरिक शोषण यानी की मारपीट के चलते ही संभव हो सकता है।’’

बड़े होकर ज्योति भी अपने पिता की तरह एक फाइटर पाइलट बनना चाहती थीं। वे कहती हैं, ‘‘मैं भी एक हवाई जहाज को उड़ाकर, आसमान को छूना चाहती थी, अपने सपने पूरा करना चाहती थी। इसी सपने के चलते मैंने अनगिनत बार ‘टाप गन’ फिल्म को देखा। मैं अब भी एविएटर चश्मा पहने हुए टाम क्रूज की उस छवि की दीवानी हूँ। बचपन से लेकर एयरफोर्स कैंप में बड़े होने तक फाइटर प्लेनों की आवाज मेरे रोम-रोम को रोमांचित कर देती थी। मैं इन उड़ने वाली मशीनों से कैसे प्यार न करती?’’

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वे आगे कहती हैं, ‘‘दुर्भाग्य से मेरी अक्षमता ने मेरे सपनों को चूर-चूर कर दिया लेकिन मुझे इसका कोई पछतावा नहीं होता। मैं अब इस बात पर विश्वास करती हूँ कि जो होता है भले के लिये होता है। मेरी विकलांगता दुख के रूप में एक अप्रत्यक्ष सुख है।’’

लेकिन उनके सिर्फ उड़ने के सपनों ने ही नहीं बल्कि हर महत्वाकांक्षा ने एक गौण रूप ले लिया जब उनकी जैविक माँ दोबारा उनके जीवन में लौट आई। हालांकि यह किसी भी लिहाज से एक बेहतर पुर्नमिलन नहीं था लेकिन वे इस बारे में और बताने से इंकार करती हैं। उस समय ज्योति नवीं कक्षा में पढ़ रही थीं और उनकी जैविक माँ की वापसी ने उनके जीवन को इतना प्रभावित कर दिया कि उनका उकादमिक प्रदर्शन भी प्रभावित हुआ और वे उस वर्ष अनुत्तीर्ण हो गईं। इसके बाद उन्होंने किसी तरह दिल्ली के नेश्नल इंस्टीट्यूट आफ ओपन स्कूलिंग से दसवी की परीक्षा उत्तीर्ण की लेकिन वे कभी कालेज का मुंह नहीं देख पाईं।

ऐसे में जब उनके पूर्व पति ने उनके जीवन में दस्तक दी तो उन्हें लगा कि जैसे उनकी हर प्रार्थना का जवाब मिल गया हो। कई वर्षों से लगातार उत्पीड़न बेरुखी के दौर से गुजर रही ज्योति को लगा कि यही वह व्यक्ति है जो उन्हें इस नरकीय जीवन से मुक्ति दिलवा सकता है। ‘‘यह एक प्रेम विवाह था और मैं उनके व्यवहार और सादगी की कायल हो गई थी।’’ सबकुछ बिल्कुल ठीक चल रहा था और वे अपने जीवन से बहुत खुश थीं। ‘‘उसी दौरान मुझे पता चला कि मैं गर्भवती हूं और दूसरी महिलाओं की तरह मैं भी एक माँ बनने के सपने देख रही थी।’’ लेकिन उनकी यह खुशी क्षणिक थी और जैसे ही उन्होंने यह बात अपने पति को बताई तो उनकी प्रतिक्रिया बेहद चैकाने वचाली थी। वे याद करते हुए कहती हैं, ‘‘उन्होंने मुझे तुरंत जाकर गर्भपात करवाने की सलाह दी।’’

ज्योति कहती हैं कि उन्होंने जोरदार विरोध किया लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। इसके बाद दूसरी बार जब उन्हें पता चला कि वे गर्भवती हैं तो वे हर्ष की अनुभूति करने के बजाय भय से कांप गईं। ‘‘मैंने अपने पति से पूछा कि वे कण्डोम का प्रयोग क्यों नहीं करते। उन्होंने तुरंत जवब दिया ‘मुझे पसंद नहीं।’’ ज्योति के शरीर को खाने की गोलियों से विपरीत प्रतिक्रिया यानी रिएक्शन हो जाता था। ‘‘मैं पूरी तरह से वैजाइनल गर्भनिरोधकों पर निर्भर थी। लेकिन इनकी असफलता की दर बहुत अधिक है विशेषकर अगर सही प्रक्रिया का पालन न किया जाए तो। इनके लिये आपको 10 से 15 मिनट की प्रतीक्षा अवधि की आवश्यकता होती है। कल्पना कीजिये कि आप आधी रात के समय यौन संबंध बनाने के इच्छुक एक व्यक्ति के साथ हैं और आप पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। और ऐसे में अगर आप पति से कुछ समय रुकने का अनुरोध करें और वह आपके आपके इस अनुरोध को दरकिनारे करते हुए आपके साथ जबरदस्ती करे।’’

वे कहती हैं कि उन्हें उस समय तो पता नहीं लगा लेकिन अब उन्हें अहसास होता है कि वे वैवाहिक बलात्कार की शिकार बनीं। ‘‘बलात्कार आखिरकार बलात्कार ही होता है, फिर चाहे वह शादीशुदा जीवन में हो या कहीं और। कोई भी चीज जो आपके शरीर पर जबरदस्ती थोपी जाए वह बलात्कार ही है। अगर एक पुरुष को कण्डोम का प्रयोग करना पसंद नहीं है तो एक महिला चाहे वह उसकी पत्नी ही क्यों न हो उसे भी ‘न’ कहने का अधिकार है। फिर क्यों मैं दा दौर से तीन बार गुजरी और आखिरकार एक एचआईव पाजीटिव बनकर रुकी? मैं इस कलंक और भेदभाव के साथ क्यों जी रही हूँ और मैं इसके लिये पहले तो सरकार को और फिर समाज को दोषी मानती हूँ। सरकार को इसलिये क्योंकि वह वैवाहिक बलात्कार को कोई अपराध नहीं मानती है और समाज को इसलिये क्योंकि वह महिला की ही किसी भी बात का दोषी साबित करने पर तुला रहता है।’’

ज्योति अब तक खुद को गर्भपात के इस पाप में धकेले जाने में एक साथी होने के अहसास से खुद को मुक्त नहीं कर पाती हैं। उन्हें अब भी इस बात का यकीन नहीं होता कि उनके पास और कोई विकल्प नहीं था। ‘‘मैं आर्थिक और भावनात्मक हर रूप में उस इंसान के ऊपर निर्भर थी। मैं बेहद भोली और सीधी-सादी भी थी। और उस समय तक को मुझे घरेलू हिंसा कानून के अस्तित्व तक के बारे में मालूम नहीं था। यह तो केवल गाली सुनने और बुरी तरह होने वाली मारपीट के कई दौर के बाद मुझे समझ में आया कि आत्मसम्मान क्या बला है।’’

जब ज्योति को यह मालूम हुआ कि वे एचआईवी पाजीटिव हैं उस समय में तीन माह की गर्भवती थीं। पूर्व में हुए तीन गर्भपातों में से किसी एक में उन्हें संक्रमित खून चढ़ाया गया था। चूंकि वे अनजाने में पिछले तीनों गर्भपातों से जुड़े तमाम कागजात नष्ट कर चुकी थीं इसलिये ऐसे में यह पमा करना कि उन्हें कहां से यह बीमारी लगी नामुमकिन था।

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अपनी इस चौथी और अंतिम गर्भावस्था के फलस्वरूप उन्होंने एक स्वस्थ बेटे को जन्म दिया जो भाग्य से एचआईवी से मुक्त है। उन्हें लगातार गर्भपात करवाने के लिये मजबूर करने वाले उनके पति ने इस लड़के के जन्म के तुरंत बाद उनके तलाक ले लिया और बच्चे को अपने साथ लेकर चला गया। अब वे अपने ही बेटे से मिलने के अधिकार पाने के लिये एक कठिन कानूनी लड़ाई का सामना कर रही हैं। ज्योति कहती हैं कि वह उनके जीवन का सबसे बुरा समय था।

‘‘मैं उस समय यह जानकर सदमें में थी कि मैं एचआईवी पाजीटिव हूँ और इसके अलावा मैं प्रसवोत्तर अवसाद से भी गुजर रही थी। इसी दौरान मेरे पति नें मुझे बताया कि उनका किसी महिला के साथ विवाहेत्तर संबंध भी है और वे उसके लिये मुझे छोड़ने जा रहे हैं। ऐसे में मैंने आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के लिये नौकरी तलाशना शुरू कर दिया। मैं अभी भी अपनी शादी तोड़ने के लिये तैयार नहीं थी। लेकिन जब मेरी नौकरानी ने मुझे बताया कि मेरे पति मेरी गैरमौजूदगी में अपनी प्रेमिका को घर पर लाते रहते हैं तो मैं जान गई कि अब कुछ बाकी नहीं रहा है।’’

ज्योति को अपनी असफल शादी का कोई पछतावा नहीं है और उनके पूर्व पति भी अपनी प्रेमिका के साथ घर बसाकर रह रहे हैं। उन्हें सबसे अधिक कष्ट तब होता है जब उन्हें इस बात का अहसास होता है कि उनका बेटा अपनी असली माँ के होते हुए एक दूसरी महिला को माँ समझता है। एक सौतेली माँ के साये में अपनी बचपन बिताने के नाते मुझे लगता है कि मेरे बेटे को भी उसी दौर से गुजरना पड़ेगा। ‘‘तलाक के समझौते में जो कुछ भी लिखा था वह बिल्कुल भी पारस्परिक नहीं था। अदालती कार्रवाई के अनुसार जज को दोनों पति और पत्नी को बुलाकर उनका पक्ष सुनना चाहिये था और मेरे मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। मैं किसी भी कोर्ट के या जज के समक्ष पेश नहीं हुई। जबरदस्ती करवाये गए दस्तखत का कोई मोल नहीं होता है,‘‘ वे गुस्से में कहती हैं। एक शांत दृढ़संकल्प के साथ वे आगे कहती हैं, ‘‘मैं बस इस लड़ाई में अपना साथ देने के लिये एक अच्छे वकील का इंतजार कर रही हूँ।’’

ज्योति अपने वर्तमान पति जो कि एचआईवी निगेटिव हैं से एक आलाइन चैटरूम में मिली। ‘‘वह एक चैट मित्र थे। उन्होंने मुझे एक या दो या तीन बार नहीं बल्कि पांच यी 6 बार अनुरोध भेजा। मैं उन्हें लगातार ठुकराती रही और आखिरकार एक दिन मैंने उनके प्रोफाइल को देखने का फैसला किया। उनकी बाइकर जैकेट और पास में खड़ी हौंडा फायरब्लेड ने मुझे मोहित किया (वे स्पष्ट करती हैं कि आकर्षित नहीं)। इस वजह से आखिरकार मैंने उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया। उस समय मैं एक आईटी कंपनी के साथ काम कर रही थी और करीब 6 महीनों तक सिर्फ चंद शब्दों तक सीमित चैट चलती रही। इसके बाद उनके जीवन में वह क्षण आया जिसकी उन्होंने कल्पना ने भी नहीं थी।’’

28 जून 2011 को उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। वह अपने पिता को अंतिम श्रृद्धांजलि अर्पित करना चाहती थीं लेकिन उनकी सौतीली माँ ने उन्हें ऐसा भी नहीं करने दिया। ‘‘वह मेरे लिये सबकुछ थे,’’ वे कहती हैं। ‘‘अपनी सौतेली माँ के प्रति घृणा और गुस्से की भावना और अपने पिता की मौत का दुख मुझे भीतर ही भीतर सताये जा रहा था। मेरी सबसे अच्छी दोस्त दुबई में थी। मेरे नए मित्र विवेक मेरे साथ भावनात्मक और शारीरिक दोनों रूप से सहायता के लिये सीधे मेरे पास चले आए।’’ उन्होंने अगले सप्ताहांत मिलने का फैसला किया। ज्योति बताती हैं, ‘‘मेरे पति कहते हैं कि यह उनके लिये दूसरी नजर में होने वाला प्यार था।’’

ज्योति अपने पति विवेक सुर्वे के साथ

ज्योति अपने पति विवेक सुर्वे के साथ


हालांकि विवेक के माता-पिता प्रारंभ में अपने बेटे के एक एचआईवी पाजीटिव साथी के साथ विवाह करने को लेकर काफी सशंकित थे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि उसकी वजह से उनका बेटा कितना खुश था तो उनकी चिंताएं काफूर हो गईं। ज्योति कहती हैं, ‘‘उनकी तमाम अनभिज्ञता के चलते थीं और वक्त के साथ उनकी सभी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं।’’ एक बार उनकी समझ में यह आया कि एचआईवी भी अन्य बीमारियों की तरह ही एक बीमारी है जिसे दवाओं के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है तो उन्होंने खुले दिल से ज्योति को स्वीकार कर लिया। इस शादी ने ज्योति के लिये एक नयी दुनिया के रास्ते खोल दिये और उन्हें जीवन में पहली बार सच्चे प्रेम का अहसास हुआ।

ज्योति कहती हैं कि उनके जीवन के दुख और पीड़ा ने उन्हें सिर्फ सहानूभूति का भाव सिखाया लेकिन विवेक के साथ शादी के बाद वे दया और क्षमा के मुल्य को भी समझने में सफल रही हैं। ‘‘मेरे जीवन में विवेक के आने से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता और मेरे जीवन में उनकी उपस्थिति मेरा सर्वश्रेष्ठ निकालने में सफल रही है। अब मैंने अपने पास जो कुछ भी है उसमें संतोष करना सीख लिया है और दूसरों से सिर्फ उम्मीद रखने के अलावा देना भी सीख लिया है। इसके अलावा मैंने नफरत को पीछे छोड़ते हुए दूसरों को माफ करना भी सीख लिया है। इसके अलावा अब मैं पहले से अधिक समझदार और परिपक्व भी हो गई हूँ।’’ ज्योति जारी रहती हैं, ‘‘मेरी दूसरी शादी ने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी और और मैं जो कुछ भी हूँ इसी की वजह से हूँ। इस शादी के बाद मैं एचआईवी एड्स के कलंक और भोदभाव को पीछे छोड़ते हुए दुनिया को रहने के लिये एक बेहतर स्थान के रूप में देखने में सफल रही हूँ। मैंने ऐसा सपनों में सोचा था और इसका पीछा किया था। और अब यह सच हो गया है।’’

ज्योति आज अपने पेशेवर जीवन की ऊँचाइयों को छू रही हैं और उनमें मंद पड़ने के कोई संकेत नहीं दिखाई देते। वे सफलतापूर्वक ब्लैक स्वान एंटरटेनमेंट के साथ क्रिएटिव मैनेजर के अलावा सोशल मीडिया और पब्लिक रिलेशन की प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं और वे और उनकी टीम दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले एक शो ‘स्त्री शक्ति’ के लिये महिला सशक्तीकरण पर आधारित कहानियों पर काम करते हैं। 

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इसके अलावा वे एचआईवी और एड्स के रोगियों के अधिकारों के लिये आवाज उठाने वाली एक सक्रिय कार्यकर्ता हैं। वह कई सामाजिक संगठनों के साथ एंबेसडर के रूप में जुड़ी हुई हैं और कई एनजीओ उनके कार्यों का सम्मान करते हैं जिनमें हाल ही में पाकिस्तानी एनजीओ बेदार भी शामिल हुआ है। लेकिन उनका मानना है कि लोगों तक उनकी आसान पहुंच उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। ‘‘मुझे अपने बारे में यह सबसे अधिक पसंद है कि मैं प्रसिद्धी के फेर में न पड़कर आसानी और सुलभता से लोगों की पहुंच में हूं। मैं बाहर निकलकर लोगों के साथ जुड़ने में यकीन करती हूँ। चूंकि मैं खुद प्रेम और देखभाल से वंचित रही हूँ इसलिये मैं समझती हूँ कि समाज से कटकर जीवन बिताने इन लोगों को कैसा महसूस होता है। इसी वजह से मैं इस काम को करती हूँ। समाज में प्र्रेम की कितनी भूख है!’’

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एक बार सक्रियता का चोला ओढ़ने के बाद उन्होंने खुद के विपरीत परिस्थितियों से पार पाने के तरीके से सीखना प्रारंभ कर दिया। वे सोशल मीडिया पर अपने जीवन से जुड़ी हर बात को संकोच से परे हटकर स्वीकार करती हैं, फेसबुक पर किसी के भी साथ और हरकिसी के साथ बात करती हैं, हर सवाल का जवाब देती हैं, हर शंका का समाधान करती हैं और अपने अनुयाइयों और चाहने वालों पर तारीफो की बरसात करती हैं।

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ज्योति मानती हैं कि वे इतने लंबे समय तक जीवन में खुशी से दूर रही क्योंकि वे खुशी के सही अर्थ को पूरी तरह से समझने में नाकाम रहीं। ‘‘खुशी आपके भीतर कहीं से आती है। आप इसे दूसरों में नहीं पा सकते। अगर आप खुश रहना चाहते हैं तो बिल्कुल रहें! अपने सासपास की स्थितियों, माहौल या परिणमों से प्रभावित न हों। इसके अलावा आपको प्रेरणा भी उन्हीं लोगों से मिलती है जो आपको उत्साहित करते हों।’’ ज्योति कहती हैं कि एक बार उन्होंने अपने जीवन में प्रेरणा पा ली तो फिर खुशी ने भी उनका रास्ता तलाश ही लिया। ‘‘मेरे रोल माडल मदर टेरेसा और प्रिंसेस डायना हैं। मदर टेरेसा ने मुझे बिना शर्त के प्रेम करना सिखाया और प्रिंसेस डायना ने निःस्वार्थ भाव से दूसरों को देना। मैं अपने छोटे से तरीके से ऐसा ही दूसरों को सिखाने का करने का प्रयास कर रही हूँ।’’

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