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सोन हँसी हँसते हैं लोग, हँस-हँसकर डसते हैं लोग

डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत के प्रतिष्ठापक और प्रगतिशील कवि रहे हैं।

18th Jun 2017
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डॉ. शंभुनाथ सिंह की गिनती देश के ऐसे शीर्ष कवियों में होती है, जिन्होंने एक वक्त में गीत-नवगीत आंदोलन की दिशा में ऐतिहासिक हस्तक्षेप किया था। उन्होंने नवगीतकारों की एकजुटता के स्वर मुखर करने के उद्देश्य से नवगीत के तीन ’दशक’, ’नवगीत अर्द्धशती’ और 'नवगीत सप्तक' का सम्पादन किया था।

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एक दुर्लभ तस्वीर, मंच पर कविता पाठ करते हुए डॉ. शंभुनाथ सिंह। फोटो साभार: shambhunathsingh.coma12bc34de56fgmedium"/>

डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत के प्रतिष्ठापक और प्रगतिशील कवि रहे हैं। उन्होंने नवगीत के तीन ’दशकों’ का सम्पादन, ’नवगीत अर्द्धशती’ का सम्पादन तथा 'नवगीत सप्तक' का सम्पादन किया।

डॉ. सिंह की प्रमुख कृतियां संग रूप रश्मि, माता भूमिः, छायालोक, उदयाचल, दिवालोक, जहाँ दर्द नीला है, वक़्त की मीनार पर हैं। खास बात यह हैं, कि ये सभी कृतियां गीत संग्रह हैं।

कवि-कथाकार डॉ. गंगा प्रसाद विमल कहा करते हैं- 'डॉ. शंभुनाथ सिंह शब्दों के ऐसे कुम्हार थे, जो गीत और कविताओं को इस तरह गढ़ा करते थे कि वह समाज के लिए उपयोगी होने के साथ- साथ युवा पीढ़ी के लिए लगातार मार्गदर्शन का का कार्य करें।' डॉ. शंभुनाथ सिंह की कई कविताएं सृजनकाल का मुहावरा सी बन गई थीं, जो उनकी चर्चा होते ही जुबान से बरबस फूट आती हैं, 'सोन हँसी हँसते हैं लोग, हँस-हँसकर डसते हैं लोग।' नवगीतकार डॉ. सिंह के मुहावरा बने शब्दों वाला एक और ऐसा ही प्रसिद्ध गीत है,

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने,

किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए।

किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी,

किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूँद पानी,

इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी के,

गई घुल जवानी, गई मिट निशानी,

विकल सिन्धु के साथ के मेघ कितने

धरा ने उठाए, गगन ने गिराए।

डॉ. शंभुनाथ सिंह के नेतृत्व में ऐतिहासिक 'नवगीत दशक' के संपादन की एक अंतर्गत कथा है, जिसे प्रसिद्ध कवि राम सेंगर कुछ इस तरह सुनाते हैं, 'डॉ. शंभुनाथ सिंह और उनकी नवगीत दशक योजना से जुड़ने के दौरान वर्ष 1980 में रेलवे बोर्ड ने उन्हें (राम सेंगर) डीएलडब्ल्यू वाराणसी के एक भव्य आयोजन में काव्य पाठ के लिए बुलाया था। डॉ. शंभुनाथ सिंह उन्हें सुनकर गदगद थे। अगली सुबह उन्होंने अपने आवास पर बुलाया। क्षेमजी और सुरेश व्यथित वहाँ पहले से थे। राम सेंगर कहते हैं, 'डॉ.शंभुनाथ सिंह ने मेरे दर्जनभर नवगीत रिकार्ड किये, बार-बार सुने। तभी वे 1962 की नवगीत दशक की धूल खायी एक पुरानी योजना की फाइल भीतर से ढूंढ लाये।'

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साहित्यकार डॉ. शंभुनाथ सिंह का जन्म 17 जून 1916 को लार के रावतपार अमेठिया गांव में हुआ था। वह नवगीत के प्रतिष्ठापक और प्रगतिशील कवि के रूप में याद किए जाते हैं। उन्होंने काशी विद्यापीठ वाराणसी और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में हिंदी विभागाध्यक्ष के रूप में करीब तीन दशक तक सेवाएं प्रदान कीं। 

उस मुलाकात के दैरान डॉ. शंभुनाथ सिंह ने राम सेंगर को बताया था, कि किस तरह उन्होंने 1962 में नवगीत दशक नाम से एक समवेत संकलन निकालने की योजना बनायी थी, जिसमें तब की योजनानुसार जो दस कवि चुने गये थे वे- शंभुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, उमाकान्त मालवीय, माहेश्वर तिवारी, रामचन्द्र चन्द्रभूषण, देवेन्द्र कुमार (बंगाली), शलभ श्रीरामसिंह, वीरेन्द्र मिश्र, महेन्द्र शंकर, मणिमधुकर थे। नवगीत में इधर आये बदलाव को वे रेखांकित करना चाहते हैं, लिहाजा वे अंतिम चार कवियों को बदल कर उनके स्थान पर नये चार कवियों की तलाश में हैं। कुछ और वृहद रूप देकर वे इस योजना को नये सिरे से शुरू करना चाहते हैं। चर्चायें हुईं और अन्तत: नईम, भगवान स्वरूप सरस, ओम प्रभाकर और शिव बहादुर सिंह भदौरिया को पहले दशक में लिया जाना सुनिश्चित हो गया। कुछ और नाम छूट रहे थे तो दूसरा खण्ड निकालने की भी बात आयी। फिर सूचियां बनीं।

एक सूची डॉ. शंभुनाथ सिंह ने बनायी और एक उन्होंने। मिलान हुआ। काट-छाँट हुई औैर अन्तत: दूसरे खण्ड के लिए दस कवि और चुन लिए गए। उनकी सूची के रमेश रंजक, शलभ श्रीराम सिंह, मुकुट बिहारी सरोज और कैलाश गौतम को डॉ. साहब ने निहायत हलके तर्क देकर सिरे से खारिज कर दिया। देवेन्द्र शर्मा इन्द्र और सूर्यभानु गुप्त के नाम पर सहमति तो जतायी, लेकिन बड़ी ना-नुकर के बाद (बाद में सूर्यभानु गुप्त को हटा कर कुमार रवीन्द्र को शामिल कर लिया गया)।

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दूसरे खण्ड के दस कवि पूरे होने के बाद कुछ और कवि छूट रहे थे, तो तीसरे खण्ड की बात आयी। दिनेश सिंह, विनोद निगम और डॉ. सुरेश को तीसरे खण्ड के लिये चुन लिया गया। सोम ठाकुर और बुद्धिनाथ मिश्र के लिए पहले तो डा.साहब मना करते रहे कि ये दोनों कवि सम्मेलन याद करते हैं, लिखते-लिखाते कम हैं। इसी तरह श्रीकृष्ण तिवारी को लेकर उनके मन में नाटकीय किस्म की दुविधा थी, बाद में खुद ही उनके मन की गुत्थी सुलझ गयी और इन तीनों को ले लिया। अंत में आयु के अनुसार चयनित कवियों की सूची (दशक-एक और दो के लिए) को अंतिम रूप दिया गया। तीसरे दशक के लिए बाकी छूटे कवियों की तलाश का काम वे खुद ही करेंगे, यह तय हुआ।

राम सेंगर रहस्योद्घाटन करते हैं, कि 'पत्र व्यवहार अधिकांश मैंने ही किया। सीनियर्स से शंभुनाथ खुद भी पत्र व्यवहार करते रहे। कुछ सामग्री सीधे मेरे पास आयी और कुछ डॉ. साहब के पास, जो उन्होंने मुझे सौंप दी। पाण्डुलिपि तैयार करने का काम उन्होंने मुझे ही सौंपा। संशोधन मैंने किसी की कविता में नहीं किया। छोटी-मोटी छांदसिक या लयात्मक गड़बड़ियों को जरूर ठीक करता गया। बहुत कवियों की कविताओं के शीर्षक भी मैंने बदले। नवगीतों की लहर-बहर और प्रभाव के मद्देनजर यह काम करता गया। मेरे लिये यह नया काम था, कुछ सीखने को भी मिल रहा था, इसलिए अपनी अतिव्यस्त जीवनचर्या में से जैसे-तैसे समय निकाल कर बड़ी लगन के साथ मैंने बहुत कम समय में पाण्डुलिपियां उनको सौंप दीं। इस दौरान मैं तीन-चार बार वाराणसी उनसे मिलने गया। उनके लगभग दो सौ पत्र हैं मेरे पास, जिनमें नवगीत और नवगीत के कवियों के बारे में, नवगीत दशक योजना के बारे में उनके विचार और चिन्ताएं बड़े ही सहज ढंग से खुलकर प्रकट हुई हैं। नवगीत दशक एक, दो और तीन के लोकार्पण के अवसर पर भी दिल्ली, भोपाल और लखनऊ के कार्यक्रमों में उनके साथ रहा।'

इस तरह राम सेंगर नवगीतकार डॉ. शंभुनाथ सिंह के साथ जुड़ी कई दुर्लभ यादों और बातों की चर्चा करते हैं और नवगीत के एक युग की कई पुरानी यादों में खो जाते हैं...

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