घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को मिला 'समाधान', महिलाओं द्वारा, महिलाओं के लिए

By Harish Bisht
November 29, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:19:23 GMT+0000
घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को मिला 'समाधान', महिलाओं द्वारा, महिलाओं के लिए
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17सौ रेप सर्वाइवर बनी वकील...

“समाधान” की अपनी “मोबाइल लीगल क्लिनिक”

“समाधान” जगह जगह जाकर देती हैं कानूनी जानकारी...


लखनऊ की एक शाम, करीब 14-15 साल की एक लड़की स्कूल से घर बाइक पर लौटती है तो रास्ते में देखती है कि राशन की एक दुकान पर एक बच्ची खड़ी है, जिसकी हालत काफी दयनीय है। जैसे ही दोनों की नजरें एक दूसरे से मिलती हैं तो बाइक पर सवार लड़की को लगा कि दूसरी लड़की उसको मदद के लिए पुकार रही है। जैसे ही वो उसके पास आई, राशन की दुकान पर खड़ी लड़की जल्दी से बाइक के पीछे बैठ गई और चिल्लाकर कहने लगी- “दीदी हमको बचा लो”।

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बाइक पर सवार वो लड़की थी रेणु डी सिंह। जो आज देहरादून में “समाधान” नाम से घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को बचाने का काम कर रहीं हैं, उनके लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं और ऐसी महिलाओं के लिए पुनर्वास का काम कर रही हैं। रेणु उस दिन को याद करते हुए बताती हैं कि जब वो उस लड़की को अपने घर लाईं तो पता चला की उसका अपना पिता उसके साथ रेप करता था और जब वो गर्भवती हो गई तो सौतेली मां ना सिर्फ उसकी पीटाई करती थी, बल्कि घर का काम भी करवाती थी। जबकि उसकी अपनी मां गांव में रहती थी। पुलिस जब उसकी असली मां को गांव से लेकर आई तो रेणु को मजबूरी में उस लड़की को उसकी मां के साथ गांव भेजना पड़ा। इस घटना के कुछ दिन बाद रेणु ने तय किया कि वो उस बच्ची के हालात जानने के लिए उससे मिलेंगी और एक दिन स्कूल जाने के बजाय वो उसके गांव पहुंच गईं। यहां पर उस लड़की की मां ने उनको रोते हुए बताया कि जब बच्ची को गांव लाया गया तो पंचायत हुई और फैसले के मुताबिक उसकी शादी एक अधेड़ व्यक्ति के साथ कर दी गई। लेकिन शादी के चौथे दिन लड़की का शव गांव के एक तालाब में मिला। इस घटना से रेणु सन्न रह गईं। करीब एक महीने तक गुमसुम रहने के बाद रेणु ने सारी घटना अपनी दादी को बताई। तब उनकी दादी ने उनसे कहा कि “किसी दुख को लेकर दुखी नहीं होना चाहिए उससे समस्या दूर नहीं होती बल्कि तुमको ये सोचना चाहिए कि तुमको करना क्या है।” तब उन्होने अपनी दादी से कहा कि वो समाज में पिछड़ी जाति की महिलाओं की मदद करना चाहती हैं।

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इस घटना के बाद रेणु ने लखनऊ के क्रिश्चियन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद उन्होने एलएलबी की पढ़ाई की। वो बताती हैं कि उन्होने देश में आपातकाल का दौर काफी करीब से देखा है। हालांकि उस वक्त उनकी उम्र 14-15 के आसपास थी लेकिन वो जयप्रकाश नारायण के भाषणों और स्वामी विवेकानंद के सिद्धांतों से प्रभावित रहीं। इस वजह से उनके अंदर आंदोलनकारी स्वभाव पैदा हो गया था। आज उनका संगठन “समाधान” ना सिर्फ उत्तराखंड और यूपी में काम कर रहा है बल्कि राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश, सौराष्ट्र, विदर्भ में घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए काफी कुछ कर रहा है। रेणु के मुताबिक "जब मैंने अपने इस काम की शुरूआत की तो सबसे पहले कुछ महिलाओं मेरे साथ जुड़ीं। इसके बाद कई वकील, डॉक्टर और वैज्ञानिक भी जुड़ने लगे जिन्होंने हमारे लिए गाइड की भूमिका निभाई ।

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रेणु बताती हैं कि शुरूआत में उन्होने जेलों के कैद महिलाओं के लिए काम किया। उन्होने वहां के हालात को समझा साथ ही ये जानने की कोशिश की कि वहां की महिलाओं की क्या जरूरते हैं। धीरे धीरे इनके पास बलात्कार से जुड़े मामले आने लगे तब इनको एक बाद समझ में आई कि अगर रेप पीड़ित को पीड़ित बनाकर रखा जाये तो गलत होगा। ऐसे में उसे सर्वाइवर कहना ज्यादा ठीक होगा। आज रेणु और उनकी टीम भी रेप कि शिकार किसी महिला को रेप विक्टिम कहने की जगह रेप सर्वाइवर कहना ज्यादा उचित मानती हैं। रेणु और उनके संगठन से जुड़ी टीम गांवों में जाकर महिलाओं को मौजूदा कानून को लेकर जागरूक करती हैं ताकि उनको अपने अधिकारों के बारे में पता चल सके। घरेलू हिंसा या यौन हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद के लिए “समाधान” करीब 20 सालों से हेल्पलाइन चला रहा है। इसके जरिये घरेलू हिंसा की शिकार पीड़ित महिलाओं की ना सिर्फ तकलीफ जानने की कोशिश की जाती है बल्कि उनको इससे बाहर आने का रास्ता भी बताया जाता है। जरूरत पड़ने पर ये पीड़ित महिला को अपने यहां शरण भी देती हैं।

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रेणु का कहना है कि “मैंने सोचा कि अगर रेप सर्वाइवर को अपने पैरों पर खड़ा करना है तो उनको छोटे मोटे घरेलू काम या अचार, चटनी, पापड़ बनाने की जगह उनको शिक्षित कर उनको वकील बनाना चहिए। इससे ना सिर्फ वो अपने पैरों में खड़ी हो सकती हैं बल्कि अपनी जैसी दूसरी महिलाओं का भी केस लड़ने में मदद कर सकती हैं।” आज रेणु के प्रयासों की बदौलत 17 सौ रेप सर्वाइवर महिलाएं देश की अलग अलग अदालतों में या तो वकील की भूमिका में हैं या फिर कानून के क्षेत्र में काम कर रही हैं। बार काउंसिल ऑफ इलाहाबाद से रेणु ने वकील के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन किया हुआ है। शुरूआत में लोग रेणु को गलत दृष्टि से देखते थे क्योंकि लोग ये मानते थे कि ये रेप पीडित महिलाओं का केस लड़ती हैं। जो कि समाज कि सोच के विपरीत काम था। रेणु बड़े फ़क्र से बताती हैं कि वो किसी भी तरह के हादसे की शिकार महिलाओं का केस मुफ्त में लड़ती हैं। उनके लिए समाधान के दरवाजे हर वक्त खुले हैं। आज रेणु और उनकी टीम 38 सौ से ज्यादा घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को मुक्त करा चुकी हैं।

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रेणु का एक सपना था और वो था न्याय हर घर तक पहुंचे। इसके लिए इन्होने घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को पैरा लीगल वॉलेंटियर की ट्रेनिंग दी और आज इनके पास ऐसी वॉलेंटियर की अच्छी खासी टीम है। उत्तर भारत में समाधान अकेला ऐसा संगठन है जिसके पास मोबाइल लीगल क्लिनिक है। इसमें एक बस के अंदर पूरा ऑफिस होता है। ये वैन उत्तराखंड की 122 तहसीलों का दौरा कर रही है। ये बस पिछड़े इलाकों में जाकर जितने भी घरेलू हिंसा या यौन हिंसा के मामले हैं, उसमें अपना परामर्श देती है। ये ऐसी लीगल क्लिनिक बस है जो महिलाओं के द्वारा, महिलाओं के लिए है। इस टीम में एक भी पुरुष नहीं होता। इस बस में 6 लड़कियों की टीम होती है और सभी कानून की छात्राएं होती हैं। इनमें से 4 सेंटर की लड़कियां होती हैं जबकि 2 इंटर्न होती हैं, जो अलग-अलग विश्वविद्यालयों से यहां इंटर्नशिप करने के लिए आती हैं। इस लीगल क्लिनिक का हिस्सा बनने वाली लॉ की छात्राएं ना सिर्फ इस बस को चला सकती हैं बल्कि जरूरत पड़ने पर बस में कोई खराबी को भी ठीक कर सकती हैं। इसके अलावा टीम के सदस्यों को सेल्फ डिफेंस में भी महारत हासिल होती है। इस मिशन को पिछले साल नवंबर में शुरू किया गया।

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महिलाओं के उत्थान के खातिर रेणु ने आज तक अपना घर नहीं बनाया। उसकी जगह उन्होने देहरादून में अपना एक सेंटर बनाया है। जहां पर एक साथ 50 लड़कियों के ठहरने की जगह है। ये वो महिलाएं हैं जो घरेलू हिंसा की शिकार हैं। यहां पर उनकी पहचान छुपा कर रखी गई है। यहां रहकर वो महिलाएं अपनी शिक्षा पूरी कर सकती हैं, रोजगार ढूंढ सकती हैं। समाधान में आने वाली महिलाओं की सभी मेडिकल जरूरतों को पूरा किया जाता है। उनको कानूनी मदद दी जाती है। यहां पर आने वाली महिलाएं 18 साल से ज्यादा उम्र की होती हैं। जरूरतमंद कोई भी महिला इनसे फोन या ईमेल के जरिये सम्पर्क कर सकती है और अपनी कहानी बता सकती है। जिसके बाद ये तय करते हैं कि किस महिला को किस तरह की जरूरत पूरी करनी है। इसके लिये बकायदा इनकी एक टीम सर्वाइवर से मिलती है और हकीकत जानने की कोशिश करती है। जिसके बाद कोई महिला पढ़ना चाहे, तो फीस जहां वो पढ़ना चाहती है वहां दी जाती है। इसके अलावा “समाधान” हर महीने स्कूल और कॉलेजों में कैम्प भी लगाता है और छात्रों को मौजूदा कानून की जानकारी देता है।

Website : www.samadhanngo.org