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श्रम-अभिशप्त हर चौथा बच्चा स्कूल से वंचित

आज 'विश्व बालश्रम निषेध दिवस' है, यानी मासूम बचपन की चिंताओं से साझा होने का दिन...

Ranjana Tripathi
12th Jun 2017
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"निर्धनता और बेरोजगारी ने बालकों के नियोजन के आधार प्रदान किए हैं। अशिक्षा, संयुक्त परिवार की संस्कृति, पारंपरिक एवं पारिवारिक मूल्य, वैश्वीकरण, निजीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास के साथ-साथ सस्ते श्रम की आवश्यकता से देश में बालश्रम को बढ़ावा मिल रहा है और देश का प्रत्येक चौथा बच्चा स्कूल न जा पाने के लिए मजबूर है..."

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"सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 2 करोड़ और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठनों के अनुसार लगभग 5 करोड़ बाल श्रमिक हैं। यूनिसेफ के अनुसार भारत में लगभग 1.02 करोड़ बच्चे बालश्रम के शिकार हैं।"

आज विश्व बालश्रम निषेध दिवस है, यानी मासूम बचपन की चिंताओं से साझा होने का दिन। बालश्रम को ऐसे कार्यों के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो एक बालक के लिए हानिकारक समझे जाते हैं और काम के घंटों की न्यूनतम संख्या को पार कर, उनके शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक क्षमता को प्रभावित कर व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास को प्रभावित करते हैं। दुकान एवं स्थापना अधिनियम, 1948 की धारा 2 (2) में कहा गया है कि एक बालक वह है जिसने 15 वर्ष की उम्र पूरी न की हो। फैक्टरी अधिनियम, 1948 की धारा 2 (2) में बालक को 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के रूप में परिभाषित किया गया है। महिलाओं एवं बालिकाओं में अनैतिक तश्करी के प्रतिषेध अधिनियम, 1956 के अनुसार एक बालक 21 वर्ष से अनधिक आयु का व्यक्ति है। राष्ट्रीय सेंपल सर्वे संगठन के अनुसार देश का प्रत्येक चौथा बच्चा बाल श्रम के कारण स्कूल नहीं जा पा रहा है।

हमारे देश में आज मुख्यतः सामंती अवशेष बाल श्रम के कारकों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। निर्धनता और बेरोजगारी ने बालकों के नियोजन के आधार प्रदान किए हैं। अशिक्षा, संयुक्त परिवार की संस्कृति, पारंपरिक एवं पारिवारिक मूल्य, वैश्वीकरण, निजीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास के साथ सस्ते श्रम की आवश्यकता से देश में बालश्रम को बढ़ावा मिल रहा है। इससे व्यापक स्तर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। इसीलिए ‘एगमार्क’ जैसे बाल श्रम के मानक अस्तित्व में आये हैं। सामूहिक रूप से बालकों के शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक विकास और क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। कुपोषण और बाल अपराध जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 2 करोड़ और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठनों के अनुसार लगभग 5 करोड़ बाल श्रमिक हैं। यूनिसेफ के अनुसार भारत में लगभग 1.02 करोड़ बच्चे बालश्रम के शिकार हैं।

"बालकों के अधिकारों पर अभिसमय, जिसे 1989 में अपनाया गया था, का अनुच्छेद-32 कहता है, सरकारों को यह महसूस किये जाने की आवश्यकता है कि आर्थिक शोषण को हटाकर बालकों के अधिकारों का संरक्षण किया जाए। पिछले वर्ष जुलाई, 2016 में भारत सरकार ने बालश्रम कानून में बदलाव किया था। परिवर्तित कानून के मुताबिक यदि 14 साल से कम उम्र के बच्चे से किसी भी प्रकार का काम करवाया गया तो नियोक्ता को 50 हजार रुपए जुर्माना और दो साल की जेल हो सकती है।"

सभी तरह के बालश्रम परिवर्तित कानून के दायरे में शामिल हैं। बालक श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2016 में 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए श्रम निषेध के साथ ही 18 साल तक के किशोरों से भी खतरनाक क्षेत्रों में काम न लेने का प्रावधान किया गया है। इसके उल्लंघन को संज्ञेय अपराध बनाया गया है, साथ ही बच्चों के लिए पुनर्वास कोष का प्रावधान किया गया है जिसे बालक किशोर कोष कहा गया है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री बंडारू दत्तात्रेय इसे ऐतिहासिक और मील का पत्थर बताते हैं। वह कहते हैं, कि इस कानून का उद्देश्य भारत में बाल श्रम को पूरी तरह से समाप्त करना है। यह संगठित और असंगठित क्षेत्र दोनों पर लागू होता है। इसे शिक्षा का अधिकार, 2009 से भी जोड़ा गया है।

पूर्व केंद्रीय श्रम मंत्री मल्लिकाजरुन खड़गे इस संशोधित विधेयक पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, कि वर्ष 2012 में संप्रग सरकार के समय जो विधेयक लाया गया था, उसमें सरकार को ऐसी क्या बुराई नजर आई, मुझे पता नहीं चला। विधेयक में संशोधन का उद्देश्य सुधार लाना होता है, प्रतिगामी दिशा में चलना नहीं। 2012 का विधेयक सही है लेकिन सरकार उसमें अनावश्यक रूप से खामियां दिखाना चाहती है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष ने भी भारत में बाल श्रम विधेयक में संशोधन को लेकर चिंता जताते हुए कहा है, कि इससे पारिवारिक काम को वैधता मिल सकती है और गरीब परिवारों के बच्चों को नुकसान पहुंच सकता है। उसने ‘परिवार के कारोबारों में बच्चों द्वारा मदद करने’ के प्रावधान को हटाने की सिफारिश की है।

ऐसे में प्रश्न उठता है, कि सामाजिक, राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में क्या किसी कानून के कारगर परिणाम संभव हैंजनसंख्या वृद्धि पर रोक के प्रति असंवेदनशीलता भी बालश्रम के समूचे पक्ष को भयानक बनाने वाले प्राथमिक कारकों में से एक है। एक तरफ गरीबी और बेरोजगारी का रोना, दूसरी तरफ एक-एक गरीब-वंचित पिता की एकाधिक संतानें। अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए ऐसे अभिभावक क्यों नहीं सोचना चाहते हैं, कि सीमित-शून्य संसाधनों के भरोसे वह अपने एकाधिक बच्चों को किस तरह का भविष्य सौंपना चाहते हैं? आज इन्हीं प्रश्नों से जुड़ा है, हमारी पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक इच्छाशक्तियों का सवाल।

हम जब तक इन बुनियादी प्रश्नों के प्रति गंभीर नहीं होते हैं, किसी जादू की छड़ी अथवा सिर्फ कानून के भरोसे बालश्रम से देश को मुक्ति नहीं दिलाई जा सकती है।

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