संस्करणों
विविध

कभी बेटी को जूता खरीदने का बूता न था, आज दुनिया के पैर सजा रहीं मुक्तामणि

जय प्रकाश जय
23rd Jun 2018
Add to
Shares
11
Comments
Share This
Add to
Shares
11
Comments
Share

अपने चार बच्चों की परवरिश के लिए खेतों में काम करने वाली मणिपुर की एक आम औरत मोइरांगथेम मुक्तामणि देवी अपनी मेहनत और हुनर से उस 'मुक्ता शूज' कंपनी की मालकिन बन गईं, जिसके जूतों की आज भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस, मेक्सिको और अफ्रीकी देशों तक डिमांड है।

मुक्तामणि (फोटो साभाप- डेलीहंट)

मुक्तामणि (फोटो साभाप- डेलीहंट)


मुक्तामणि को इस बेमिसाल कामयाबी पर एक पुरस्कार समारोह में 'ट्रू लीजेंड अवॉर्ड्स 2018' से सम्मानित किया गया। मुक्तामणि देवी ने कहा कि वह घर लौटने के बाद इस पुरस्कार को उन महिलाओं को समर्पित कर देंगी, जो इस कामयाबी को हासिल करने में निरंतर उनके साथ काम करती रही हैं।

पच्चीस साल पहले मणिपुर में मोइरांगथेम मुक्तामणि देवी ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके जीवन में कामयाबी का ऐसा दौर भी आएगा। पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के लिए मात्र 200 से 800 रुपए मूल्य के हस्तनिर्मित जूते, सैंडल बनाने वाली कंपनी 'मुक्ता शूज' के प्रोडक्ट की आज पूरी दुनिया में डिमांड है। मुक्तामणि की जिंदगी में एक वक्त ऐसा भी रहा, जब स्कूल जाने के लिए उनकी बेटी के पास एक मात्र ऐसा टूटा जूता होता था, जिसकी आए दिन मरम्मत करानी पड़ती। ऐसे में वह बेटी के लिए ऊन के जूते बनाने लगीं लेकिन वह स्कूल यूनीफॉर्म के लिए फिट नहीं होता था। स्कूल में टीचर उसके साथ टोकाटाकी करने लगे। उस समय उनके पास इतने पैसे नहीं होते थे कि अपनी बेटी के लिए यूनीफॉर्म के हिसाब से एक जोड़ी जूते खरीद सकें। आज 'मुक्ता शूज' कंपनी हस्तशिल्प से जूते, पुरुषों के लिए सैंडल, यहां तक कि महिलाओं और बच्चों के लिए चप्पल बना रही है। उसके जूते ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस, मेक्सिको और कुछ अफ्रीकी देशों को भी निर्यात हो रहे हैं।

मुक्तामणि को इस बेमिसाल कामयाबी पर एक पुरस्कार समारोह में 'ट्रू लीजेंड अवॉर्ड्स 2018' से सम्मानित किया गया। मुक्तामणि देवी ने कहा कि वह घर लौटने के बाद इस पुरस्कार को उन महिलाओं को समर्पित कर देंगी, जो इस कामयाबी को हासिल करने में निरंतर उनके साथ काम करती रही हैं। जिंदगी के तल्ख अनुभव साझा करती हुई वह बताती हैं कि शुरुआत के दिनो में उन्हे केवल इतना पता होता था कि वह अपना परिवार कैसे चलाएं लेकिन आज वह अपने सपनों का कारोबार चला रही हैं। उन्हे इस पर गर्व है। उनकी मुश्किलों ने ही मुक्ता शूज़ उद्योग को जन्म दिया। उनकी बेटी की एक मामूली सी दिक्कत सुलझाते-सुलझाते हस्तशिल्प निर्मित अपने जूतों से वह पूरी दुनिया के पैर सजाने लगीं। आज न सिर्फ भारत, बल्कि ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड सहित तमाम देशों में उनके प्रोडक्ट की गूंज है। उनके शूज ने लोगों को दीवाना बना रखा है।

मुक्तामणि बताती हैं कि वह कभी मामूली जूते, चप्पल बेचकर अपना घर चलाती थीं। एक दिन जब उनकी बेटी उन्हीं के बनाए जूते पहनकर स्कूल गर्इ तो टीचर्स ने बाकी बच्चों को उसी जैसे जूते पहनकर आने को कहा। इसके साथ ही शुरू हुआ मुक्तामणि की जिंदगी की कामयाबियों का सिलसिला। उन्होंने वर्ष 1990 में 'मुक्ता शूज' नाम से खुद की कंपनी भी बना ली। आज उनकी कंपनी के जूते ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम, मैक्सिको और कई एक अफ्रीकी देशों को एक्सपोर्ट हो रहे हैं। आज वह सिर्फ जूते ही नहीं बना रहीं बल्कि ऐसे स्टॉइलिश जूते बनाने की एक हजार लोगों को ट्रेनिंग भी दे रही हैं। मुक्ता इंडस्ट्री के जूते महिलाओं, पुरुषों, और बच्चों में खूब पसंद किए जाते हैं।

मुक्तामणि आज मणिपुर की प्रसिद्ध जूता व्यवसायी बन चुकी हैं। उनका जूतों का कारोबार काफी बड़ा आकार ले चुका है। मुक्तामणि का जन्म दिसम्बर 1958 में हुआ था और उन्हें उनकी विधवा मां ने पाल-पोसकर बड़ा किया। जब वह 17 वर्ष की थीं, उनका विवाह हो गया। उनके चार बच्चे हैं। अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए एक वक्त में मुक्तामणि को खेतों में काम करना पड़ा। वह दिन भर खेतों में काम करतीं और शाम को घर में ही तैयार कर खाने के सामान बेचतीं। चूंकि बुनाई करने में भी सिद्धहस्त थीं, रात में बैग, बालों के बैंड भी बनाकर बेचने लगीं। उस दिन उनको बड़ी खुशी मिली जब उनकी बेटी के स्कूल की एक टीचर ने उनसे कहा कि उसे अपने बच्चों के लिए भी वैसे ही जूते चाहिए। फिर तो मुक्तामणि ने सोचा कि क्यों न वह इसी काम को आगे बढ़ाएं और इसी आइडिया के साथ वह कामयाबी के सफर पर चल पड़ीं।

यह भी पढ़ें: खुद को आग के हवाले करने के बाद समझ आया जिंदगी का मकसद, जली हुई औरतों की करती हैं मदद

Add to
Shares
11
Comments
Share This
Add to
Shares
11
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें