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पुरुष प्रधान व्यवसाय प्रिंटिंग में, अपनी पहचान बनाने वाली निधि अग्रवाल

प्रिंटरों के लिये साॅफ्टवेयर तैयार करने वाली कंपनी Design ‘N’ Buy की सीईओ हैं निधि अग्रवालबहन की शादी के चलते आार्थिक तंगी ने निबटने के लिये खुद बैंक से ऋण लिया और प्राप्त की उच्च शिक्षावर्ष 2007 मेें विवाह के बाद पति की कंपनी में हाथ बंटाकर व्यापार की बारीकियों से हुई रूबरूमहिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिये एक महिला प्रधान टीम की की है स्थापना

Pooja Goel
18th Jul 2015
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‘‘वर्ष 2012 में अमरीका की सबसे बड़ी मुद्रण प्रदर्शनी ग्राफ एक्स्पो में अपनी पहली औपचारिक भागीदारी के दौरान जब मैं अपने बूथ पर खड़ी थी के तभी एक युवक ने मुझसे पूछा कि इस कंपनी का सीईओ कौन है। मैंने बहुत उत्साह से उसे जवाब दिया, ‘मैं ही हूँ!‘ उसने मुझे कुछ क्षणों तक घूरा और फिर बिना एक भी शब्द बोले वह पलटकर चला गया। इस वाकये के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं एक ऐसे व्यवसाय में हूँ जहां किसी को मेरी मौजूदगी की उम्मीद नहीं है,’’ यह संस्मरण है प्रिंटरों के लिये साॅफ्टवेयर तैयार करने वाली कंपनी Design ‘N’ Buy (डिजाइन ‘एन’ बाय) की सीईओ निधि अग्रवाल का।

मुद्रण यानि प्रिंटिंग की दुनिया पर पुरुषों का पूर्ण वर्चस्व है और इस क्षेत्र में उतरने के लिये यही निधि की इकलौती प्रेरणा रही। 33 वर्षीय उद्यमी कहती हैं,

‘‘मैंने हमेशा से ही अपनी खुद की एक अलग पहचान बनाने का प्रयास किया है और कभी भी उपेक्षित या प्रत्याशित करने की शौकीन नहीं रही हूँ।’’

मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर मंदसौर में पैदा हुई और पली-बढ़ी निधि पांच बहनों में सबसे छोटी हैं और परिवार में उनसे छोटा एक भाई है। वह उनके व्यापारी पिता थे जिन्होंने अपने सभी 6 बच्चों को अपने मन का काम करने और अपने जुनून को पाने के लिये कुछ भी कर गुजरने के लिये प्रोत्साहित किया। निधि ने कक्षा दा तक की अपनी पढ़ाई एक हिंदी माध्यम के स्कूल से पूरी की और उसके बाद चीजों को एक अलग तरीके से करने का फैसला किया।

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निधि कहती हैं, ‘‘एक संयुक्त परिवार में बड़े होना वास्तव में बहुत मजेदार था। मेरे पिता 11 भाई-बहनों में से एक थे और हम सभी चचेरे भाई-बहन एक साथ पले-बढ़े और बड़े हुए।’’ जब निधि ने अपनी दसवीं कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण की तभी उनकी बड़ी बहन का विवाह हुआ और ऐसे में जब निधि ने मंदसौर से बाहर जाकर पढ़ने के लिये अपने पिता से पैसे मांगे तो उन्होंने उनकी बड़ी बहन की विवाह में अधिक खर्चा होने की मजबूरी के चलते अपनी बेटी का साथ देने में असमर्थता जाहिर की। निधि ने एक अप्रत्याशित फैसला लिया और पास हि स्थित एक राष्ट्रीयकृत बैंक की शाखा से लोन लेने के लिये संपर्क किया। चूंकि वे स्कूल दिनों से ही एक प्रतिभाशाली छात्र रहीं थीं और उनका अकादमिक रिकाॅर्ड इसकी गवाही देता था इसलिये उनके ऋण को जल्द ही मंजूरी मिल गई।


स्थानीय भाषा से अंग्रेजी माध्यम में स्थानांतरित होने की यात्रा

और इस प्रकार निधि की मंदसौर से बाहर की यात्रा शुरू हुई और उन्होंने 11 कक्षा में एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में दाखिला लिया। इंटर करने के बाद में उच्च शिक्षा के लिये इंदौर चली गईं।

निधि बेहद विनम्रतापूर्वक बताती हैं, ‘‘पहले-पहल मेरे लिये प्रतिस्पर्धा में बने रहना काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ क्योंकि मेरे लिये अंग्रेजी शिक्षा के अंग्रेजी माध्यम के साथ खुद को समायोजित करना काफी मुश्किल था। लेकिन मैंने भी अच्छा करने की ठान रखी थी और मैं पहले ही वर्ष से सभी विषयों में अव्वल रहने में कामयाब रही।’’ इसके बाद निधि कंप्यूटर विज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री पाने में सफल रहीं।

इसके बाद उनका पेशेवर जीवन में उतरने का समय आया। उन्होंने एक कंपनी में नौकरी कर ली और कोडिंग और डिजाइनिंग पर अपना हाथ आजमाने लगीं। इसके बाद वे तकनीकी बैठकों का हिस्सा बनने लगीं और कंपनी के कामकाज का बहुत नजदीकी से अध्ययन करना शुरू कर दिया। उनके पहले ही सस्थान में 150 लोग कार्यरत थे और जल्द ही उन्हें वर्ष 2006 में अमरीका में आयोजित होने वाले तीन महीने के कार्य असाइनमेंट के लिये भेजा गया।

निधि कहती हैं, ‘‘कंपनी नंबर पोर्टेबिलिटी से संबंधित एक स्वचलित उपकरण का शुभारंभ कर रही थी और मैं इस पूरी परियोजना की प्रभारी थी। यह मेरे जैसी एक छोटे शहर से आने वाली लड़की के लिये सीखने और अनुभव लेने का एक बेहतरीन मौका था और निश्चित रूप से इसने मेरा दृष्टिकोण ही बदल दिया।’’


निधि का उद्यमशीलता की दुनिया का सफर

वर्ष 2007 में अमरीका से वापस आने के बाद निधि का विवाह अभिषेक से हो गया और वे अपने पति के साथ अहमदाबाद आ गईं जहां वे अपने दो मित्रों के साथ एक आईटी कंपनी राइटवे साॅल्यूशंस इंडिया प्रा. लि. (आरडब्लूएस) का संचालन कर रहे थे। समय के साथ उन्होंने भी कंपनी के कामकाज में हंथ बंटाना शुरू कर दिया और वे एचआर, प्रशासन, सेल्स और मार्केटिंग से लेकर विकास और वितरण तक के कामों में निपुण हो गईं। इस दौरान उन्हें अपने भीतर की उद्यमशीलता की भावना से रूबरू होने का मौका मिला और वे भी व्यावार के क्षेत्र में अपने हाथ आजमाने के लिये प्रेरित हुईं। दोनों परिवारों के निरंतर प्रोत्साहन के चलते वे आरडब्लूएस के इंजीनियरिंग विभाग की निदेशक बनने के लिये तैयार हो गईं।

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थोड़े ही समय में निधि ऐसा कुछ करने से ऊब गईं जिसे पहले से ही उनके पति कर रहे थे और उन्होंने अपना कुछ करने का फैसला किया और ‘डिजाइन ‘एन’ बाय’ की स्थापना की। निधि बताती हैं, ‘‘बाजार में भारी मांग को देखते हुए मैंने एक इन-हाउस तकनीकी टीम तैयार की और अपने पहले उत्पाद के विकास का काम प्रारंभ कर दिया। वर्ष 2009 के अंत में हमारा उत्पाद जो टी-शर्ट पिंटरों और व्यक्तिगत उत्पादों के प्रिंटरों के लिये पहला वेब से प्रिंट समाधान उपलब्ध करवाने वाला पहला उत्पाद था। हमें पहले ही वर्ष में उपभोक्ताओं से बेहतरीन प्रतिक्रिया और प्रोत्साहन मिला और हमने अपने समाधान के 100 से भी अधिक लरइसेंस बेचे। हमने अपने इस उत्पाद को ‘डिजाइन‘एन’बाय’ का नाम दिया और इसके बाद से हमें पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी।’’


विकास की कहानी

जैसे ही उनके कारोबार ने बाजार में गति पकड़नी प्रारंभ की तभी निधि को मालूम पड़ा कि उनका पहला बच्चा उनके गर्भ में पल रहा है। निधि कहती हैं,

‘‘मैं उस समय सोच में पड़ गई और मुझे लगा कि मैं एक नवजात बच्चे और बढ़ते हुए व्यापार दोनों के साथ न्याय नहीं कर पाऊँगी। उस समय मैं एक परामर्शदाता के पास गई जिसने मुझे अपनी प्राथमिकताओं को तय करने की राय देते हुए बताया कि लगभग हर कामकाजी महिला को ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है और इसलिये मुझे अपनी भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाना सीखना होगा।’’

जल्द ही निधि काम पर लौट आईं और अपनी बेटी को भी अपने साथ ले जाना शुरू कर दिया। इस प्रकार से वह अपनी बेटी की देखभाल करते हुए अपने कार्यलय के कामकाज को भी सफलतापूर्वक निबटाने में सफल रहीं।

निधि कहती हैं कि उस समय उन्हें पहली बार एक स्त्री की शक्ति का सही मायनों में अहसास हुआ। उन्हें यह समझ आ या कि महिलाएं आसानी से कई कामों को एकसाथ संचालित कर सकती हैं और इसी वजह से उन्होंने एक महिला प्रधान और केंद्रित टीम तैयार की।

निधि शक्तिशाली किरदार और विपरीत परिस्थितियों में भी डटकर खड़े रहने की क्षमताओं के मामले में इंदिरा गांधी को अपना आदर्श मानती हैं। जब निधि पुस्तकें नहीं पढ़ रही होती हैं तो वे या तो अपनी बेटी के साथ ख्ेाल रही होती हैं या फिर इंदिरा गांधी से सीख ले रही होती हैं। अंत में यह माता उद्यमी कहती है, ‘‘ऐसी कई बातें हैं जो हम उनसे सीख सकते हैं और इनकी बदौलत हम अपने चारों तरफ सभी चाजों को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने लगते हैं।’’

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