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एक बैंक ऐसा जिसे बनाया है गांव की महिलाओं ने, जहां कर्ज में दिया जाता है सिर्फ गेहूं

Vijay Pratap Singh
25th Dec 2015
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कानपुर देहात में महिलाओं ने बनाया अनोखा गेहूं बैंक...

गांव की हर महिला को जरुरत पर मिलता है बैंक की तरह कर्ज पर गेहूं...


प्रधानमंत्री मोदी ने जब अपनी धन योजना की शुरुआत की थी उनकी मुख्य मंशा यही थी गांव में रहने वालों के बैंक खाते खुलें और पैसे उनके खाते में जमा किए जाएं। चूंकि सीधे सादे गाँववालो को बैंको की ज्यादा जानकारी नहीं होती है जब उनके खाते में पैसे होंगे तो वो अपने पैसे से ज़रूरी काम कर सकते हैं। इसके तहत सरकार ने करोड़ों के खातों में पैसे जमा भी कराया है। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो प्रधानमंत्री की इस योजना से पहले कुछ ऐसा कर रहे हैं जो वाकई चौंकाने वाली है।

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हम आपको रू-ब-रू कराते हैं उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात की गांव की कुछ ऐसी महिलाओं से जिन्होंने एक नई सोच को अंजाम दिया और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया। कानपुर देहात के भीखमपुर गांव की महिलाओ ने ऐसा बैंक बना डाला जिसके बारे में जानकर कोई भी हैरान हो सकता है, क्योंकि इस गांव की महिलाओं ने एक गेहूं बैंक ही बना डाला। इस गेहूं बैंक में गांव की हर महिला अपना अपना गेहूं जमा कराती हैं। महिलाओं की तरफ से जमा गेहूं ठीक से रहे इसकी जिम्मेदारी गेहूं बैंक की होती है। इस बैंक से गांव के ज़रुरतमंदों को मौके पर गेहूं कर्ज पर दिया जाता है। इस बैंक से गेहूं कर्ज लेने वाली महिलाएं अपना काम होने के बाद बिना ब्याज के कर्ज लिया गेहूं वापस बैंक में जमा कर जाती हैं।

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अनाज बैंक की शुरुआत करनेवाली रश्मि ने योरस्टोरी को बताया--

“तीन साल पहले हमारे गांव में सुखा पड़ा था जिसमे कई परिवार एक एक दाना अनाज के लिए तरस गए थे। तब हम सब महिलाओं ने मिलकर इस गेहूं बैंक की शुरुआत की थी जिसमें सबने मिल कर पहले गेहूं इकठ्ठा कर ‘पूजा ग्रेन बैंक’ बनाया। फिर इस बैंक से उन महिलाओं को गेहूं का कर्ज दे दिया गया। जब फसल हुई तो उन लोगों ने अपना अपना खुद से ही गेहूं ज्यादा से ज्यादा कर वापस कर दिया। बस उसके बाद हमारा यह बैंक ऐसा सफल हुआ की आज अकबरपुर क्षेत्र के 20 से ज्यादा गावों में यह गेहूं बैंक सफलता पूर्वक चल रहा है।”

इस बैंक की यह खूबी ही है की गेहूं कर्ज लेने वाली हर महिला ठीक समय पर अपना गेहूं लोन अदा कर जाती है। और सबसे बड़ी बात यह है इस गेहूं बैंक के लिए इन महिलाओं को न किसी सरकारी सहायता की आवश्यता पड़ी, न किसी व्यापारी के सहयोग की ज़रूरत महसूस हुई।

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गांव की एक महिला विमला का कहना है---

“मेरे बेटे का जन्मदिन था। घर में गेहूं नहीं था। मैंने बैंक से गेहूं कर्ज पर लिया और बाद में जब मेरे पास गेहूं आया तो मैंने खुद से ज्यादा करके बैंक को गेहूं लौटा दिया।”

बड़ी बात यह है कि महिलाओं में आपसी तालमेल इतना अच्छा है कि हर कोई दूसरों की मदद के लिए तैयार रहती हैं। ज़ाहिर है इन सबके पीछे कोशिश एक ही है---हर घर में चूल्हा जलता रहे, कोई भी भूखा न रहे। गांव के महिलाएं अनजाने में वो काम कर रही हैं जो सरकार करती है। तभी तो कहा जाता है कि अगर महिलाएं कुछ ठान लें तो उसको सफल बनाकर रहती हैं। इसका जीता जागता उदाहरण है गेहूं बैंक।

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