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टैक्सी ने दी महिलाओं की ज़िन्दगी को रफ़्तार

भारती के दिखाए रास्ते पर चली कई महिलाएंएक मज़बूत और साहसी कदम ने बदली परंपरामर्दों के एक और अधिकार-क्षेत्र में महिलाओं का प्रवेशज़माना भी अब महिला टैक्सी ड्राइवरों के साथ

Geeta Parshuram
8th Jan 2015
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महिला जब भी कोई काम पहली बार करती है तो कई लोग उसे हैरतभरी नज़रों से देखते हैं। लोग हैरानी इस बात पर जताते है कि मर्दों द्वारा किये जाने वाले काम आखिर महिला क्यों कर रही है। सवाल पुछा जाता है कि मर्दों के कार्य-क्षेत्र में आखिर महिला क्यों आ रही है ?

बेंगलोर की भारती ने जब टैक्सी चलने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस लिया तभी कईयों को बहुत आश्चर्य हुआ। उस समय महिलाएं बड़ी गाड़ियां तो चलने लगी थीं, लेकिन टैक्सी चलना किसी महिला ने नहीं शुरू किया था। लोगों की हैरानी उस समय सबसे ज्यादा बढ़ गयी, जब वाकई भारती टैक्सी चलाने लगी। टैक्सी की ड्राइवर सीट पर एक महिला को देखकर कई लोग दंग रह गए। जब कभी भारती की टैक्सी सिग्नल्स पर रुकती तब आस-पास की गाड़ियों से लोग उसे अचरज भरी नज़रों से घूरते। लेकिन, अब भारती को ही नहीं बल्कि बेंगलोर के लोगों को भी आदत सी पड़ गयी है।

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भारती ऐसे ही टैक्सी चालक नहीं बानी। इसके पीछे भी एक कहानी है।

भारती आँध्रप्रदेश के वारंगल की रहने वाली है। रोज़ी-रोटी की तलाश में वो २००५ में बेंगलोर आ गयी थी। उसके साथ उसका भाई और माँ भी साथ आ गए थे। बेंगलोर में शरुआती दिन काफी तकलीफ भरे रहे। नौकरी आसानी से नहीं मिली। पेट भरने के लिए भारती को कभी कपडे सिलने का काम करना पड़ा तो कभी किसी दफ्तर में नौकरी करनी पड़ी। किसी तरह उसकी गुज़र-बसर होने लगी थी।

लेकिन, अच्छी और बड़ी नौकरी की उसकी तलाश जारी रही। इसी दौरान वो एक एनजीओ के संपर्क में आयी जो महिला वाहन चालकों की तलाश में थी। शुरू में तो भारती को भी टैक्सी चलाने का प्रस्ताव बेहद अजीब लगा। वो ये सोचने में पड़ गयी कि क्या वो टैक्सी चलाना सीख पाएगी ? सीखने के बाद क्या वो हर रोज़ टैक्सी चला पाएगी ? क्या लोग उसकी टैक्सी पर सवार होंगे? वो शुरू में थोड़ी घबरा गयी। लेकिन एनजीओ के कार्यकर्ताओं ने उसकी हौसलाअफ़ज़ाही ही। इससे भारती की हिम्मत बड़ी और उसने कार चलाना सीखने का फैसला कर लिया।

गाड़ी चलाना सीखने के बाद भारती ने लाइसेंस के लिए आवेदन किया। वो टैक्सी चलाने के लिए लाइसेंस लेने वाली पहली भारतीय महिला बनी।

२००९ में उसे दिल्ली से नौकरी का एक प्रस्ताव भी मिला। उसे महीना पंद्रह हज़ार रुपये वेतन देने की पेशकश की गयी। लेकिन, भारती बेंगलोर नहीं छोड़ना चाहती थी। इसी वजह से उसने बेंगलोर में ही टैक्सी चलाने के मकसद से अलग-अलग ट्रैवल एजेंसियों से संपर्क करना शुरू किया।

उन्हीं दिनों वो एन्जेल सिटी कैब्स के संपर्क में आयी। ये कैब सर्विस वाली कंपनी पहली ऐसी कंपनी थी जो महिला वाहन चालकों से ही अपनी गाड़ियां चलवा रही थी। चूंकि भारती काबिल थी , उसके पास लाइसेंस भी था , उसे नौकरी मिल गयी। इस नौकरी ने भारती की ज़िन्दगी को नई रफ़्तार मिली।

कुछ महीनों बाद भारती को उबेर कैब्स ने बड़ी तनख्वा पर नौकरी दी। भारती उबेर कैब्स की पहली महिला वाहन चालक बनी।

टैक्सी की रफ़्तार के साथ की भारती की ज़िन्दगी भी अब रफ़्तार पकड़ चुकी थी। आमदनी इतनी हो गयी कि कुछ ही सालों में भारती ने अपनी खुद की कर वह भी फोर्ड फिएस्ता खरीद ली। उसका हौसला अब इतना बुलंद है कि वो अब मर्सिडीज़ की लक्ज़री कार खरीदने की सोच रही है। दिलचस्प बात तो ये है कि बेंगलोर में कई ऐसी महिलायें जिन्होंने भारती से प्रेरणा लेकर टैक्सी चालक बनीं। एक बार तो भारत की मशहूर महिला उद्योगपति और बायोकॉन की मुखिया किरण मजूमदार- शाह ने अपने लिए कैब बुक की और उन्हें लेने भारती पहुँची तो वे भी भारती से प्रभावित हुए बिना नहीं रहीं।

अपने अनुभव के आधार पर भारती ये बताती हैं कि महिलाओं द्वारा टैक्सी चालक बनने के प्रति ज्यादा दिलचस्पी न दिखने की तीन बड़ी वहज हैं।

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पहली वजह ज्यादातर लोगों द्वारा महिला वाहन चालकों पर भरोसा न करना। दूसरी वजह टैक्सी चलाना अब भी पुरुषों का काम माना जाता है।

तीसरी वजह ज्यादातर महिलायें अपने पारम्परिक काम-काज छोड़ कर इस तरह के अपरम्परागत काम नहीं करना चाहती हैं।

लेकिन, पिछले दिनों दिल्ली में हुई एक वारदात ने देश-भर में कई शहरों में महिला टैक्सी चालकों की मांग को अचानक बढ़ा दिया है। पिछले साल एक कैब ड्राइवर ने कैब में एक महिला सवार का बलात्कार किया। इस घटना के बाद कई सारी महिलाएं अब महिला कैब चालकों की मांग कर रही हैं। यही वजह है कि आने वाले दिनों में भारती की तरह ही सडकों पर बहुत सारी महिलाएं कैब और टैक्सियां चलाती दिखेंगी।

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