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गुजरात में स्टाइलिश मूंछ रखने पर दलित की पिटाई, बरपा हंगामा

जय प्रकाश जय
29th Sep 2017
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गुजरात की राजधानी गांधीनगर से 15 किमी दूर दरबार समुदाय के कुछ लोगों ने स्टाइलिश मूंछ रखने पर दलित पीयूष परमार की पिटाई कर दी। परमार की शिकायत पर पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है।

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- सोशल मीडिया)


कुछ साल पहले एक खबर आई थी, जिसमें बताया गया था कि कुछ लोग इसलिए नाराज हैं कि जिलेट के एक विज्ञापन में औरतों को दाढ़ी-मूंछ के खिलाफ एकजुट होते दिखाया गया है।

 यह कैसा जाति दंभ है, कितना खोखला, और पूरी भारतीय संस्कृति का सिर शर्म से झुका देने वाला। कभी सियासत में मूंछ का सवाल तो कभी सुरक्षा में पुलिस की मूंछ का सवाल। 

बाल को लेकर भारतीय लोक जीवन में तरह-तरह की कहावतें प्रचलित हैं, मूंछ का सवाल बना लेना, बाल की खाल निकालना, बाल बांका न कर पाना आदि-आदि। मगर ये कैसा पागलपन है, किसी को मूंछ रखने पर पीट दिया जाए तो किसी को घोड़ी पर चढ़कर शादी रचाने पर। और इसलिए कि वह दलित है! मजहब, जात-पांत ने भी जीवन में कुछ कम उथल-पुथल नहीं मचा रखी है। मूंछ तो शान का प्रतीक मानी जाती है लेकिन गुजरात की ताजा घटना ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है। प्रदेश की राजधानी गांधीनगर से 15 किमी दूर दरबार समुदाय के कुछ लोगों ने स्टाइलिश मूंछ रखने पर दलित पीयूष परमार की पिटाई कर दी। परमार की शिकायत पर पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है।

हमलावरों के नाम हैं मयूर सिंह वाघेला, राहुल विक्रम सिंह सर्थिया और अजित सिंह वाघेला। मामले की जांच डीएसपी स्तर के अधिकारी कर रहे हैं। परमार गांधीनगर की एक निजी कंपनी में काम करता है। घटना के समय वह अपने चचेरे भाई के साथ गरबा खेलकर घर वापस लौट रहा था। परमार ने बताया कि पहले उन्होंने उनके भाई के साथ मार पीट की और फिर उसके साथ। कुछ साल पहले एक खबर आई थी, जिसमें बताया गया था कि कुछ लोग इसलिए नाराज हैं कि जिलेट के एक विज्ञापन में औरतों को दाढ़ी-मूंछ के खिलाफ एकजुट होते दिखाया गया है।

सर्वे हुआ है कि दाढ़ी-मूंछ वाले मर्दों को औरतें पसंद नहीं करतीं। कंपनी अपने प्रोडक्ट की सेल के लिए पब्लिक में इमोशंस जगा रही है। नाराज लोग संगठन बनाकर विरोध करने लगे। कहने लगे कि दाढ़ी-मूंछ रखना या नहीं रखना, उनकी मर्जी। इसे गलत आदत बताना और महिलाओं को इसके खिलाफ उकसाना एक मर्दाना पसंद की बेइज्जती है। उस विज्ञापन पर जेंडर भेदभाव का आरोप लगाया गया। क्या हमारे यहां मूंछ को उस तरह मुद्दा बनाना सामाजिक सौहार्दता की दृष्टि से उचित है, कत्तई नहीं। पहलवान हों या राजा-महाराजा, यहां तक कि साधु-संत भी, दाढ़ी-मूंछ रखना पसंद करते हैं। चित्रों में तो भगवान शिव भी मूंछें रखे दिखाए जाते हैं। आदिम समाजों में देवता मूंछों वाले होते थे।

इंडियन सोसायटी में अब तो आजकल के फिल्म स्टार भी मूंछों में शूटिंग कराने लगे हैं। दरअसल हमारी सोसायटी में मूंछ को लेकर तरह तरह की ठकुरसुहातियां भी हैं। मूंछ ठाकुर साहब ही रख सकते हैं, चांद राम नहीं। संतोष यादव भी मूंछ रख लें तो चलेगा लेकिन नवाजुद्दीन की इतनी हिम्मत की हमारे सामने मूंछों पर ताव देगा! तो ये है बेमतलब जोश में होश खो देने की बेअक्ली। भारतीय समाज में जात-पांत की घृणा कितने गहरे तक जहन में बैठी है। एक पंडित जी रोजाना दो बाल्टी पानी से अपने दरवाजे पर लगा हैंडपंप इस अंदेशे में धुलवाते हैं कि कोई दलित या मुस्लिम जरूर उससे पानी पीया होगा! मुंशी प्रेमचंद ने इसी सामाजिक पीड़ा को 'ठाकुर का कुंआ' में रेखांकित कर चुके हैं। कवि अशोक चक्रधर ने तो मूंछ और पूछ (सम्मान) पर एक लंबी कविता ही लिख डाली-

सवाल पूंछ और मूंछ का

जिसके पास पूंछ है, उसी की पूछ है

एक के पास मूंछ थी, एक के पास पूंछ थी,

मूंछ वाले को कोई पूछता नहीं था पूंछ वाले की पूछ थी।

मूंछ वाले के पास तनी हुई मूंछ का सवाल था,

पूंछ वाले के पास झुकी हुई पूंछ का जवाब था।

पूंछ की दो दिशाएं नहीं होती हैं

या तो भयभीत होकर दुबकेगी

या मुहब्बत में हिलेगी, मारेगी या मरेगी

पर एक वक़्त में एक ही काम करेगी।

मूंछें क्यों अशक्त हैं, क्योंकि दो दिशाओं में विभक्त है।

एक झुकी मूंछ वाला झुकी पूंछ वाले से बोला-

यार, मैं ज़िंदगी में उठ नहीं पा रहा हूं।

पूंछ वाला बोला- बिलकुल नहीं उठ पाओगे,

कारण एक मिनट में समझ जाओगे।

बताता हूं, तुम बिना हाथ लगाए

अपनी मूंछ उठाकर दिखाओ

मैं अपनी पूंछ उठाकर दिखाता हूं।

जो उठा सकता है, वही उठ सकता है,

इसीलिए पूंछ वालों की सत्ता है।

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध किए जाने वाले नए तरह के अपराधों में उनके सिर और मूंछ की बालों का मुंडन करा देना, बेवजह गालियां देना, मारना-पीटना इस बात का संकेत है कि बड़ी जात कहे जाने वाले लोगों के मन से अभी सामंती घृणा का विष सूखा नहीं है। यह कैसा जाति दंभ है, कितना खोखला, और पूरी भारतीय संस्कृति का सिर शर्म से झुका देने वाला। कभी सियासत में मूंछ का सवाल तो कभी सुरक्षा में पुलिस की मूंछ का सवाल। लगता है कि हर कोई मूंछ को सवाल बनाए हमारे समाज में डोल रहा है, गुर्रा रहा है, ऐंठ रहा है, खामख्वाह ताव देते हुए अपना पगलापन झाड़ रहा है। अगर हम इस गलतफहमी में रहने लगें कि देश और समाज आधुनिक हो गया है और आज की पीढ़ी पुरातनवादी सोच से ऊपर उठ चुकी है तो अपने को सुधार लें। अंग्रेजों के जमाने में जब देश गुलाम था, फैज साहब कुछ यूं लिख गए थे, जो आज भी मौजू लगते हैं-

निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ

चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले

जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले

नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले।

यह भी पढ़ें: मर्दों को झूठे केस के दुष्चक्र से बचातीं हैं दीपिका नारायण

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