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'marketwarket.com' सस्ते सामान का बढ़िया अड्डा...

-23 वर्षीय इंजीनियरिंग के छात्र प्रशांत महाले और पुष्पक देशमुख ने रखी ऑनलाइन किराना स्टोर 'marketwarket.com' की नीव।- अमरावती जैसे इलाके में ई-कॉमर्स कंपनी खोलने के लिए किया चुनौतियों का सामना। - विदर्भ की लोकल भाषा मराठी को चुना कंपनी के प्रचार-प्रसार के लिए।

Ashutosh khantwal
16th Aug 2015
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कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारत का हर राज्य, हर क्षेत्र अपने में बहुत कुछ समाए हुए है। यहां आपको संस्कृति के विभिन्न रंग देखने को मिलेंगे। विदर्भ भारत का एक ऐसा भाग है जहां से लगातार किसानों की गरीबी के कारण आत्महत्या की खबरें कई सालों से सुनाई दे रही हैं। जो भी सरकार आती है वह इस समस्या को हल करने का वादा करती है लेकिन स्थिति वैसे की वैसे ही बनी हुई है। यह एक ऐसा इलाका है जहां गरीबी बहुत ज्यादा है। इस इलाके में नई कंपनियां अपना रुख नहीं कर रही हैं। लोगों के पास रोजगार नहीं है। खेती ही एक मात्र विकल्प है उसके लिए भी संसाधनों की भारी कमी है। विकास की रेखा यहां बहुत ही ज्यादा धीमी गति से चल रही है। ऐसे क्षेत्र में दो 23 वर्षीय इंजीनियरिंग के छात्र प्रशांत महाले और पुष्पक देशमुख ने एक ऑनलाइन किराना स्टोर 'मार्केटवार्केट' की नींव रखी। इस ऑनलाइन स्टोर का आइडिया पुष्पक के दिमाग में काफी पहले से था वे ग्रोसरी आइटम्स को लोगों के घरों तक पहुंचाना चाहते थे। इस काम को अंजाम देने में उन्हें अपने मित्र प्रशांत का साथ मिला।

प्रशांत और पुष्पक दोनों का जन्म किसान परिवार में हुआ। दोनों की मुलाकात इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में हुई दोनों के सपने एक जैसे थे इसलिए जल्द ही दोनों में गहरी दोस्ती हो गई उसके बाद दोनों एक दूसरे से अपने विचार शेयर किया करते और उन पर गहराई से सोच विचार करते।

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पुष्पक जब भी घर के लिए किराने का सामान खरीदते तो उन्हें काफी भटकना पड़ता था। यह काम पुष्पक को काफी थकाऊ और उबाऊ लगता था। इसी दौरान उन्हें खयाल आया कि अगर किराने का सामान लोगों के घरों में पहुंचने लगे तो उन जैसे काफी लोगों को सहूलियत मिल जाएगी उन्होंने इस बात को प्रशांत के साथ शेयर किया। यह वर्ष 2011 की बात थी। इसी दौरान उनके कॉलेज में भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉ. अब्दुल कलाम आए और उन्होंने बच्चों को संबोधित किया। डॉक्टर कलाम की बात सुनकर दोनों ने तय किया कि वे भी अपने प्रयासों से कुछ नया काम करेंगे और अपने काम से नाम कमाएंगे। और लोगों की जिंदगी में परिवर्तन लाकर उनके जीवन को आसान बनाने का प्रयास करेंगे। पुष्पक ने हाईपर लोकल स्रर्विस कंपनी पर रिसर्च करनी शुरू की। उनके दिमाग के कोने में किराना बाजार था और वे इससे जुड़कर ही कुछ करना चाहते थे। उन्होंने अपने इस आइडिया को प्रशांत के साथ डिसकस किया। प्रशांत ने बताया कि आजकल ई-कॉमर्स कंपनी काफी तेजी से फैल रही हैं ऐसे में यदि वे किराना और ई-कॉमर्स को साथ में रखकर कुछ काम करेंगे तो काफी अच्छा रहेगा। काफी सोच विचार के बाद उन्होंने तय किया कि वे एक ई-कॉमर्स कंपनी शुरु करेंगे और किराने का सामान लोगों के घरों तक पहुंचाएंगे।

जिस समय दोनों ने अपने स्टोर की नींव रखी उस समय उस इलाके में एक भी ई-कॉमर्स कंपनी नहीं थी। साथ ही उनको आय दिन नई-नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था जोकि उनके काम में बाधा डाल रहा था। सबसे पहले उन्होंने तय किया कि वे अपने कामकाज में वहां की लोकल भाषा का इस्तेमाल ज्यादा करेंगे। फिर उन्होंने मराठी भाषा के जरिए ही अपनी कंपनी का प्रचार प्रसार शुरु किया। वहां के लोग ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे और लोकल भाषा ही ढंग से समझ पाते थे इसलिए बैनर, लोकल फैस्टिवल में प्रचार करना , घरों में पैंप्लेट्स वगैरा छपवाना आदि सभी काम मराठी भाषा में ही किए गए।

दो ऐसे युवा जिनके पास अनुभव नहीं था। पहली बार कोई काम शुरु कर रहे थे अपने आप में बहुत ही रोमांचक और चुनौतियों से भरा था। वह भी अमरावती जैसे इलाके में एक ई-कॉमर्स कंपनी खोलना काफी चैलेंजिंग था। वहां के लोग अक्सर उनसे पूछते - कहीं आप पुराना सामान तो नहीं बेच रहे? कहीं आपका सामान डुप्लीकेट तो नहीं है? वहां के लोगों को कंपनी द्वारा दिए जा रहे डिस्काउंट पर भी शक होता कि आखिर यह कैसा माल बेचते हैं जो बाकी जगहों से सस्ता है और सामान को घर तक भी मुफ्त में पहुंचा देते हैं।

पिछड़ा इलाका होने के कारण यह सब प्रश्न लोगों के मन में उत्पाद को लेकर सदैव एक शंका डाले रहते थे। सन

2012 में ई-कॉमर्स एक नया कांसेप्ट था अत: एफएमसीजी कंपनियों को भी उन्हें अपने बारे में और अपनी कार्यप्रणाली के बारे में समझाने में दिक्कत होती थी। कीमत तय करना व लोगों को डिस्कांउट की कैलकुलेशन भी एक मुश्किल कार्य था। साथ ही एक बेहतरीन सप्लाई चेन का निर्माण करना जो सामान को सही समय पर सही तरीके से पहुंचा दे, इन सब की व्यवस्था करना भी मुश्किल कार्य था। लेकिन प्रशांत और पुष्पक अपने काम में लगे रहे। अपनी मेहनत के बल पर बहुत जल्दी ही इस इलाके में उन्होंने अपनी पहचान बना ली। आज कंपनी के पास 95 प्रतिशत रिटर्रिंग कस्टमर हैं जो कि बहुत बड़ी बात है। कहने का मतलब है जो एक बार इस कंपनी के जरिए सामान खरीदता है वो वापस इनके पास ही आता है।

मोबाइल और इंटरनेट क्षेत्र में आई क्रांति ने इनके काम को बहुत फायदा पहुंचाया लेकिन ऑनलाइन पेमेंट को लेकर लोग आज भी थोड़ा असमंजस में रहते हैं इसलिए ज्यादातर लोग कैश ऑन डिलीवरी पेमेंट ऑप्शन को ही ज्यादा चुनते हैं। आज मार्किटवार्किट के पास 1500 रजिस्टर्ड कस्टमर हैं। और 1450 रुपये का औसतन खरीदारी होती है। फिलहाल कंपनी को फंड की जरूरत है और वो नए इंवेस्टर्स की तलाश में है जिनकी मदद से वे कंपनी का विस्तार कर सकें और उसे नई ऊंचाईयों तक पहुंचा सकें। कंपनी का दावा है कि वे मात्र 3 घंटे में लोगों को सामान की डिलीवरी कर देती है। कंपनी फिलहाल इंवेन्ट्री बेस्ड, वेयरहाउज मॉडल अपना रही है।

प्रशांत और पुष्पक बहुत जल्द कंपनी का एक मोबाइल एप लांच करने पर विचार कर रहे हैं ताकि ग्राहक आसानी से मोबाइल के माध्यम से ही सामान बुक करा सकें।

एक आंकड़े के मुताबिक भारतीय ई-कॉमर्स मार्किट इस साल के अंत तक 6 बिलयन अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को छू लेगी। इस बाजार में अब भारत के टीयर 2 और टीयर 3 शहर भी जुड़ गए हैं। इंटरनेट और स्मार्टफोन के प्रचार प्रसार के बाद ये क्षेत्र काफी तेजी से आगे बड़ रहा है। इसी कड़ी में प्रशांत और पुष्पक भी अपनी कंपनी को अपनी मेहनत और लगन के बूते बहुत आगे तक ले जाना चाहते हैं। इसका विस्तार करना चाहते हैं। इसे भारत की अग्रणीय ई-कॉमर्स साइट की श्रेणी में लाना चाहते हैं।

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