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'बिचित्र पाठशाला', पढ़ाई का सचित्र माध्यम

- 'बिचित्र पाठशाला' ने सहारा लिया सचित्र माध्यम से पढ़ाने का। - 2010 में कोलकाता से की शुरुआत। - आयोजित कराता है छात्रों व अध्यापकों के लिए सेमिनार व कार्यशालाएं। - मकसद है परंपरागत पढ़ाई के तरीकों से अलग व्यवहारिक व रोचक तरीकों से छात्रों का ज्ञानवर्धन करना।

Ashutosh khantwal
14th Aug 2015
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पिछले दस सालों में शिक्षा के स्तर में काफी सकारात्मक सुधार दिखाई दे रहे हैं। जहां पहले शिक्षा केवल किताबों तक सीमित थी और शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के लिए मात्र पाठ्यक्रम में निर्धारित की गई पुस्तकों का ही प्रयोग करते थे। इससे कुछ बच्चे तो चीज़ों को जल्दी समझ जाते थे लेकिन बच्चों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसे चीज़ें पूरी तरह से समझ नहीं आती थीं इसलिए वे बच्चे परीक्षाओं में प्रश्नों के जवाब रटकर लिख दिया करते थे। ऐसे में बच्चों का ज्ञान केवल पाठ्यक्रम की उक्त किताब तक ही सिमटा हुआ था। पिछले कुछ सालों में हमने देखा कि सरकार व कई गैर सरकारी संगठनों ने इस दिशा में बहुत प्रयास किए जिसका सकारात्मक असर भी हमें समाज में दिखाई दे रहा है। विज्ञान और तकनीक का असर अब शिक्षा में भी दिखने को मिल रहा है। अब पढ़ाने में भी अध्यापक तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं। इस तकनीक के माध्यम से बच्चों को समझने में काफी आसानी होती है, वे विषयवस्तु को बहुत गहराई से समझ पाते हैं।

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सन 2010 में शुरु हुई 'बिचित्र पाठशाला' का मकसद बच्चों को किताबी ज्ञान को व्यवहारिक ठंग से तकनीक के माध्यम से समझाना है। यह लोग बच्चों को पढ़ाने के लिए फिल्मों, विडियो और चित्रों का सहारा लेते हैं। बच्चे अक्सर फिल्मों विडियो या फिर इस तरह की चीज़ों के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं। ऐसे में इन माध्यमों के द्वारा बच्चों को पढ़ाने से वे विषय को जल्दी समझते हैं। इस माध्यम से सभी बच्चों के ज्ञान व विषय वस्तु को समझने का स्तर लगभग समान हो जाता है जोकि बहुत जरूरी है।

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जुलाई 2012 में 'बिचित्र पाठशाला' को एक सोसाइटी के रूप में नामांकित कर दिया गया। बिचित्र पाठशाला लगातार अध्यापकों और बच्चों के लिए सेमिनार आयोजित कराती रहती है। जिसमें यह बताने का प्रयास किया जाता है कि पढ़ाई करने या कराने का मात्र एक तरीका नहीं होता। हम बच्चों का ज्ञानवर्धक फिल्मों के माध्यम से भी कर सकते हैं। ज्ञानवर्धक फिल्मों के माध्यम से बच्चों को इतिहास, भूगोल, गणित व विज्ञान जैसे विषयों को रुचिकर बनाकर समझाने का प्रयास किया जा सकता है। ऐसा ही बिचित्र पाठशाला करती है। सन 2010 में बिचित्र पाठशाला ने कोलकाता में 25 वर्कशॉप आयोजित कीं जिसे बहुत अच्छा समर्थन मिला। इन तरीकों से प्रभावित होकर कई स्कूलों व शिक्षकों ने यह तरीके अपनाने शुरु किए। जिसके इन्हें बहुत ही सकारात्मक परिणाम मिले। फिल्म छात्रों का मनोरंजन तो करती ही है साथ ही इसमें छोटे-छोटे संदेश भी छिपे होते हैं। बिचित्र पाठशाला फिल्म दिखाने के बाद बच्चों के साथ उन संदेशों को शेयर करती है और बच्चों के साथ चर्चा करते हुए उनकी राय जानने की कोशिश भी करती है।

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आज इंटरनेट में बहुत ज्ञानवर्धक सामग्री मौजूद है। बिचित्र पाठशाला अध्यापकों को प्रोत्साहित करती है कि उस सामग्री को बच्चों को दिखाया जाए। जिससे छात्रों को बहुत ज्यादा फायदा होगा। तकनीक केवल नए-नए अविष्कारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए यदि उस तकनीक का हर जगह प्रयोग नहीं किया गया तो वह सही नहीं होगा। हमें चाहिए कि हर अच्छी चीज़ का सब जगह प्रयोग हो। वह केवल एक स्थान तक सीमित न रहे।

रौशनी दास गुप्ता कोलकाता में अंग्रेजी की अध्यापिका हैं वे बताती हैं कि बिचित्र पाठशाला के माध्यम से उन्हें बच्चों को पढ़ाने का एक नया तरीका मिल गया है जोकि बहुत ज्यादा प्रभावशाली है। इस माध्यम से बच्चों को पढ़ाते वक्त उन्हें खुद भी बहुत मजा आता है और बच्चे भी बहुत खुशी-खुशी और जल्दी ही चीज़ों को समझ जाते हैं। यह अनुभव केवल शैरानी के ही नहीं है बल्कि रौशनी की तरह ही कई और भी अध्यापिकाओं के अनुभव हैं जिन्हें बिचित्र पाठशाला ने पढ़ाने के नए-नए व रोचक तरीके सिखाए। अब तक न जाने कितने ही बच्चों की शिक्षा के स्तर में बिचित्र पाठशाला सुधार ला चुका है। उसका यह प्रयास जारी है।

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