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ज़िंदगी का खेल हो या खेल की दुनिया, अपने नियमों को सरल ही रखते हैं उद्यमी इंजीनियर कुमार पुष्पेश

अपने बनाये तौर-तरीकों से जीने की चाह से कुमार पुष्पेश ने बसायी स्टार्टअप की दुनिया

Arvind Yadav
22nd Jun 2016
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कुमार पुष्पेश को उन खेलों से नफ़रत है, जिनके नियम-क़ायदे बहुत लम्बे-चौड़े होते हैं। जिन खेलों की नियम-पुस्तिका एक पन्ने से ज्यादा हो जाती है, वे उन खेलों की तरफ अपनी नज़र डालने से भी बचते हैं। कुमार पुष्पेश को वो खेल बहुत पसंद हैं, जिनके नियम काफी सरल होते हैं, आसानी से समझ में आते हैं। नियमों को समझने के लिए वक्त जाया करने को वे गुनाह समझते हैं। खेलों से जुड़ी इसी मानसिकता, सोच और नज़रिए को उन्होंने अपनी ज़िंदगी में भी उतारा है। कुमार पुष्पेश ऐसी जगह काम करने से नफरत करते हैं, जहाँ नियम-कायदे सब पर भारी हों। नियम-कायदे के बंधनों में जकड़े रहना उन्हें पसंद नहीं है। खेल हो या नौकरी, या फिर ज़िंदगी, कुमार पुष्पेश को नियम सरल चाहिए न कि जटिल। उनका मानना है कि कठोर नियमों और लम्बे-चौड़े कायदों में घिरने से आदमी की सृजनशीलता बेकार हो जाती है और इन्हीं बंधनों में घुटते हुए धीरे-धीरे दम तोड़ देती है।

अपने बनाये तौर-तरीकों से जीना और अपने बनाये नियमों के मुताबिक काम करना ही कुमार पुष्पेश की फितरत है। यही फितरत उन्हें स्टार्टअप की दुनिया में रहने-जीने को प्रेरित करती है। प्रेरणा भी ऐसी असरदार और ताक़तवर रही कि कुमार पुष्पेश ने स्टार्टअप की अनोखी और दिलचस्प दुनिया में अपनी प्रतिभा को निखारा, क़ाबिलियत को बढ़ाया और अपनी अलग पहचान बनाई। गेमिंग की दुनिया में अपनी पकड़ मजबूत करते हुए आगे बढ़ रहे कुमार पुष्पेश ने एक मुलाक़ात में “मन की बात” की और उस मुलाक़ात को ख़ास बनाया।

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आईआईटी-खड़गपुर से पासआउट इस इंजीनियर और उद्यमी ने एक सवाल के जवाब में हम ही से सवाल किया। पुष्पेश का सवाल था – क्या आप पांच पन्नों की रूलबुक वाले गेम को खेलना पसंद करेंगे? अपने इस सवाल का जवाब मिलने से पहले ही उन्होंने आगे कहना शुरू किया, “ज्यादातर लोगों को सिंपल रूल्स वाले गेम्स खेलना ही पसंद हैं। रूलबुक लम्बी हो तो लोग उसे पढ़ते ही नहीं हैं। मेरी ज़िंदगी के मामले में भी यही है। मैं बड़े-बड़े नियमों में बंधकर काम करने के लिए बना ही नहीं हूँ।”

इन्हीं भावों से भरे कुमार पुष्पेश के मन को उस समय चैन और सुकून मिला जब उन्होंने अपने चार साथियों के साथ मिलकर ‘मूनफ्रॉग’ नाम से स्टार्टअप शुरू किया। गेमिंग इंडस्ट्री के इस स्टार्टअप में सह-व्यवस्थापक होने के नाते कुमार पुष्पेश ने काम करने के अपने तौर-तरीके बनाये। कुमार पुष्पेश कहते हैं,

 “मुझे डेडलाइन के दबाव में रहकर काम करना बिलकुल पसंद नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि मैं डेडलाइन के अंदर काम को पूरा नहीं कर सकता। वैसे तो मैं डेडलाइन से काफी पहले भी काम पूरा कर लेता, लेकिन मुझे ये बंधन पसंद नहीं हैं। इस समय से इस समय तक काम करना है, इस समय इस काम को शुरू कर इस समय इस काम को पूरा करना है – इस तरह के नियम मुझे अच्छे नहीं लगते। मुझे ऐसी आज़ादी चाहिए, जहाँ मैं जब चाहे काम करूँ। मन करे तो रात के दो-तीन बजे तक भी काम करूँ और मन न करे तो दिन में भी काम न करूँ। वही वजह थी कि मैंने अब तक अपना ज्यादातर समय स्टार्टअप में ही लगाया है।"
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मन की इच्छाओं के मुताबिक काम करने का मौका जब कुमार पुष्पेश को ‘मूनफ्रॉग’ में मिला तब उन्होंने इसका भरपूर फायदा भी उठाया। मन लगाकर काम किया और मेहनत भी की। चूँकि दूसरे सभी साथी भी ऐसे ही काम कर रहे थे, नतीजे अच्छे आने लगे। स्टार्टअप की चर्चा हर जगह होने लगी, कंपनी ने भी दिन दोगुनी-रात चौगुनी तरक्की की। ‘मूनफ्रॉग’ ने गेमिंग की इंडस्ट्री में धमाल मचाना शुरू किया। शुरुआती दिनों में ही ‘मूनफ्रॉग’ को अच्छी-ख़ासी फंडिंग भी मिली। विस्तार का काम तेज़ी से बढ़ा। कामकाज और विकास ने ऐसी रफ़्तार पकड़ी की फिर कम होने का नाम ही नहीं लिया। पांच साथियों द्वारा बैंगलोर के आर्थर रोड पर एक गेराज में शुरू की गयी कंपनी ‘मूनफ्रॉग’ इन दिनों भारत में सबसे तेज़ गति से आगे बढ़ रही गेमिंग कंपनी है।

एक सवाल के जवाब में कुमार पुष्पेश ने माना कि उन्हें ये उम्मीद नहीं थी कि ‘मूनफ्रॉग’ इतनी तेज़ी से आगे बढ़ेगी और कम समय में इतना नाम कमा लेगी। उन्होंने कहा, “मैं हमेशा सेल्फ क्रिटिकल रहा हूँ। मेरे मन में कई तरह के सवाल थे। कुछ नेगेटिव पॉइंट्स भी थे। सवाल ये भी उठता था कि आखिर ये चलेगा भी या नहीं। हम सब काफी अनुभव लेकर आये थे। सभी को अपनी ताकत का अहसास था, लेकिन सवाल अपनी जगह थे। लेकिन जब फंडिंग हुई तब बात तेज़ी से बनने लगी। फंडिंग हमारे लिए बड़ी बात थी। अचानक सब कुछ बदल गया। कई सारे आर्टिस्ट, इंजीनियर और दूसरे एक्सपर्ट कंपनी में शामिल हो गए। शुरुआत में ऐसा सोचा नहीं था कि जल्द ही कंपनी इतनी बड़ी हो जाएगी।”

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कुमार पुष्पेश बातचीत के दौरान गेराज-हाउस के उन शुरुआती दिनों का ज़िक्र करना भी नहीं भूले। भावुक होते हुए उन्होंने कहा, “हम लोग सब टिफ़िन बॉक्सेस शेयर करते थे। साथ में खाते-पीते थे। काम करने में बहुत मज़ा आता था। हम पांच थे, अब नब्बे-सौ हो गए हैं।” कुमार पुष्पेश ये कहते हुए फूले नहीं समाते कि ‘मूनफ्रॉग’ की अब तक की यात्रा बेहद शानदार और उत्साहवर्धक रही है। उनकी खुशी ये कहते हुए दुगुनी हो जाती है कि ‘मूनफ्रॉग’ की कामयाबी की कहानी में उनकी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। कुमार पुष्पेश कहते हैं, “ मैं बहुत खुश हूँ , संतुष्ट हूँ और मुझे पूरा भरोसा है कि आगे की जर्नी और भी शानदार रहेगी। उत्साह इतना ज़बरदस्त है कि अब वे ये कहने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाते कि ‘मूनफ्रॉग’ को भारत की नंबर एक मोबाइल गेमिंग कंपनी बनना ही उनका अगला लक्ष्य है, लेकिन वे ये कहने से नहीं चूकते, “हम हवा में काम नहीं कर रहे हैं और न ही कामयाबी हमारे सर पर सवार है। हमारे पाँव ज़मीन पर मज़बूती से जमे हैं और रहेंगे। हम कभी भी हकीक़त से दूर नहीं होंगे।

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दिलचस्प बात ये भी है स्टार्टअप के ज़रिए ज़बरदस्त कामयाबी और शोहरत हासिल कर रहे कुमार पुष्पेश चाहते तो बड़ी-बड़ी कंपनियों में बड़ी-बड़ी नौकरियाँ पा सकते थे। आईआईटी- खड़गपुर से बीटेक और एमटेक की डूअल डिग्री लेने वाले कुमार पुष्पेश बहुत ही प्रतिभाशाली और होनहार इंजीनियर हैं। वो अपने समय के श्रेष्ट छात्र थे और उन्हें आईआईटी-खड़गपुर में डूअल डिग्री कोर्स के दौरान उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए डॉ ज्ञानचन्द्र घोष गोल्ड मैडल से नवाज़ा गया था।

2008 में कुमार पुष्पेश का कैंपस सलेक्शन हो गया था। उन्हें बैंकिंग सेक्टर की मशहूर कंपनी ‘लेहमन ब्रदर्स’ में नौकरी मिल गयी, लेकिन दुनिया-भर में छाई आर्थिक मंदी का असर इस वित्तीय कंपनी पर भी पड़ा। कंपनी घटे में चली गयी। दुनिया-भर में उसके कई कर्मचारियों की छंटनी की गयी। कंपनी के मुंबई दफ्तर जहाँ पुष्पेश काम कर रहे थे, वहां से भी कई लोगों को निकाला गया। कुछ महीनों बाद इस कंपनी को एक चीनी कंपनी ने अधिग्रहित कर लिया था। उन दिनों की यादें ताज़ा करते हुए कुमार पुष्पेश कहते हैं, “मेरे पास ज्यादा काम नहीं था। वैसे भी आर्थिक मंदी के दौर में कंपनी के पास ही कोई ख़ास काम नहीं था। मेरी पहली नौकरी थी। मुझे लगा कि मेरा समय बेकार जा रहा है। मैंने फैसला कर लिया कि मैं अपने पसंदीदा और सबसे ताक़तवर क्षेत्र टेक्नोलॉजी में ही काम करूँगा। मेरी ताकत टेक्नोलॉजी में ही थी।

पहली नौकरी ने कुमार पुष्पेश को बहुत बड़ा सबक सिखाया था। पसंद और ताकत के मुताबिक ही काम करने की बड़ी सीख दी थी। ‘लेहमन ब्रदर्स’ को छोड़ने के बाद कुमार पुष्पेश ने मुंबई में ही डिजिटल विज्ञापन के दुनिया में शुरू हुई नई कंपनी ‘कोमली मीडिया’ ज्वाइन की। पुष्पेश ने यहाँ अपनी पसंद और ताकत के मुताबिक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का काम किया। अपनी क़ाबिलियत और प्रतिभा के दम पर खूब नाम कमाया और तरक्की की।

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जब गेमिंग इंडस्ट्री की बड़ी नामचीन कंपनी ‘ज़िंगा’ ने भारत में अपनी गतिविधियाँ शुरू कीं, तब उसे कुमार पुष्पेश जैसे प्रतिभा संपन्न और अनुभवी इंजीनियरों की तलाश थी। पुष्पेश ने ‘ज़िंगा’ में नौकरी की पेशकश को स्वीकार लिया। कोमली मीडिया को चलाने वाले लोगों ने पुष्पेश से ना जाने की गुज़ारिश की। चूँकि वे अपना मन बना चुके थे, इसी वजह से डिजिटल मीडिया की दुनिया को अलविदा कहकर गेमिंग की दुनिया में चले आये। ‘ज़िंगा’ में काम करते हुए कुमार पुष्पेश ने गेमिंग की दुनिया से जुड़े कई सारे पहलुओं को करीब से जाना और समझा।

इस बाद जब 2013 में एक के बाद एक दोस्तों-साथियों ने ‘ज़िंगा’ से नाता तोड़ा तब कुमार पुष्पेश भी बाहर आये और तनय तायल, अंकित जैन, ओलिवर जोंस और डिम्पल मैसुरिया के साथ मिलकर अपनी खुद की कंपनी ‘मूनफ्रॉग’ शुरू की। कुमार पुष्पेश ने कहा, “ज़िंदगी में एक ठहराव सा आ गया था। कुछ अलग करने की सोचने लगा था मैं। एक जैसी सोच रखने वाले हम सभी साथ आ गए और हमने कंपनी शुरू की। उन दिनों स्टार्टअप के लिए माहौल भी अनुकूल था। बाज़ार में उत्साह था। हर तरफ नया काम हो रहा था। आईआईटी-खड़गपुर से पासआउट होने वाले ज्यादातर इंजीनियर, करीब 60 से 70 फीसदी इंजीनियर, स्टार्टअप के फाउंडर थे या फिर किसी स्टार्टअप से जुड़े थे। मुझे भी लगा कि ट्राई करना चाहिए। लगभग दस साल तक मैं यही सोचता रहा कि मुझे कोशिश करना चाहिए या नहीं। लेकिन इस बार मैंने फैसला ले लिया।” जोखिम उठाने और कुछ नया करने की कोशिश करने का फैसला कुमार पुष्पेश के लिए भी बहुत ही यादगार और फ़ायदेमंद साबित हुआ। ‘मूनफ्रॉग’ की कामयाबी की कहानी में कुमार पुष्पेश की भी कहानी हमेशा के लिए दर्ज हो गयी। 

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कुमार पुष्पेश की कामयाबी की कहानी के कई सारे दिलचस्प पहलू हैं। उनके माता-पिता की इच्छा थी कि वे डाक्टर बनें। पिता डाक्टर थे इसी वजह से घर-परिवार की ख़्वाहिश थी कि पुष्पेश भी डाक्टर बनें और अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाएं, लेकिन पुष्पेश ने अपने पिता की डॉक्टरी विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी अपने छोटे भी पर डाल दी और खुद इंजीनियरिंग से मोहब्बत कर ली। बड़े होने का फायदा था कि उन्होंने खुद पर आ रही ज़िम्मेदारी को अपने छोटे भाई पर डाल दिया था। माता-पिता की भी यही इच्छा थी कि उनके दो बेटों में कोई एक डाक्टर बन जाय, लेकिन छोटे भाई ने भी पुष्पेश की तरह ही इंजीनियरिंग को अपना बनाया। भले ही पुष्पेश और उनके भाई डाक्टर न बन पाए हों, लेकिन उन्होंने अपनी कामयाबियों से माता-पिता को बहुत खुशी दी है।

एक और दिलचस्प पहलू ये भी है कि कुमार पुष्पेश ने सातवीं से दसवीं तक की पढ़ाई एक सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालय राजा राममोहन रॉय सेमिनरी स्कूल से की। हुआ यूँ था कि पुष्पेश के पिता का ट्रांसफर पटना हो गया था और चूँकि साल के बीच में ट्रांस्फर हुआ था पुष्पेश का दाख़िला कान्वेंट स्कूल में नामुमकिन था। एक साल बेकार न चला जाय इस मकसद ने पिता ने पुष्पेश का दाख़िला राजा राममोहन रॉय सेमिनरी स्कूल में करवा दिया। पुष्पेश ने ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई पटना के मशहूर साइंस कॉलेज से की। चूँकि घर-परिवार में डाक्टर बनाने की इच्छा थी पुष्पेश ने इंटरमीडिएट में मैथ्स, फिजिक्स और केमिस्ट्री के साथ बायोलॉजी को भी अपना मुख्य विषय बनाया था।

आईआईटी में दाखिले के लिए पुष्पेश ने पटना में ही ट्रेनिंग भी ली थी। पहले प्रयास में पुष्पेश का रैंक उतना अच्छा नहीं था कि उन्हें आईआईटी में दाख़िला मिल जाता, लेकिन जो रैंक उन्होंने हासिल की थी उससे एनआईटी जैसे कॉलेज में दाख़िला मिल जाता। लेकिन, पुष्पेश पर आईआईटी का जुनून सवार था, जिसकी वजह से उन्होंने साल-भर सिर्फ आईआईटी-जेईई की तैयारी की। तैयारी इतनी तगड़ी थी कि इस बार उन्हें ऐसा रैंक मिला जिससे आईआईटी में सीट पक्की हो गयी। आईआईटी-खड़गपुर से पास आउट होकर इंजीनियर बनने वाले ज्यादातर लोगों की तरह ही कुमार पुष्पेश भी स्टार्टअप की निराली दुनिया में अपने निराले सपनों को साकार कर रहे हैं।

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