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बाल श्रम को कालीन उद्योग से खत्म करने में जुटा 'गुडवीव'

बाल श्रमिको को मुक्त करवाकर उनके पुर्नवास और शिक्षा की व्यवस्था करता है गुडवीवकालीन के आयातकों और निर्यातकों से इसने बाल-श्रम से मुक्त होने का प्रमाणपत्र लेना पड़ता हैवर्ष 2005 में सामाजिक उद्यमिता के लिये स्कोल पुरस्कार जीतने वाली नीना स्मिथ के दिमाग की उपज है गुडवीवइनका मानना है कि अगर उपभोक्ता जागरुक हो जाए तो बाल मजदूरी को जड़ से खत्म किया जा सकता है

10th Jul 2015
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जब कभी भी आप अपने घर के लिये एक नया कालीन या गलीचा खरीदते हैं तो आपने कभी स्वयं से उसको तैयार करने वालों के बारे में या फिर उनके काम करने के हालातों के बारे में एक बार भी सोचते है? एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में दक्षिण एशिया के बेहद मजबूत कालीन की बुनाई के उद्योग में करीब 2.5 लाख बाल मजदूर बेहद अमानवीय स्थितियों में फंसे हुए है और इनके अलावा इस क्षेत्र में काम कर रहे व्यस्क श्रमिक भी रोजाना स्वास्थ्य और श्रम अधिकारों की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और यह एक ऐसा कटु सत्य है जिसकी जानकारी समाज का भला-बुरा सोचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जरूर होनी चाहिये।

आजादी के 68 वर्षों बाद भी देश के कई हिस्सों में अभी भी गुलामी के चिन्ह बाल श्रम के रूप में करीब पूरे भारतवर्ष में एक अनकही कहानी के रूप में मौजूद हैं। यूनिसेफ के अनुमान के अनुसार भारत में 5 वर्ष से 14 वर्ष की उम्र के करीब 12 प्रतिशत बच्चों का शोषण उन्हें बाल श्रम से संबंधित गतिविधियों में लगाकर किया जाता है। कुछ अनुमानों का तो यहां तक कहना है कि भारत में एक तरफ तो करीब 65 मिलियन युवा बेरोजगार घूम रहे हैं और वहीं दूसरी तरफ करीब 60 मिलियन बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं। भारत में कालीन बुनाई के उद्योग में फैली बाल मजदूरी की कुप्रथा को जड़ से समाप्त करने का उद्देश्य लेकर वर्ष 1994 में एक व्यापार और एनजीओ के गठजोड़ के रूप में GoodWeave (गुडवीव) की स्थापना की गई।

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गुडवीव कालीनों इत्यादि उत्पादों को बाल श्रम मुक्त उत्पादों के रूप में प्रमाणित करने के अलावा कालीन निर्माताओं के चंगुल से मुक्त करवाये गए बच्चों को पुनर्वास और शिक्षा के अवसर उपलब्ध करवाने का काम करता है। वर्तमान में भारत के अलावा नेपाल और अफगानिस्तान में काम रहा यह संगठन अबतक यूरोप और उत्तरी अमरीका के बाजारों में 7.5 मिलियन से अधिक प्रमाणित कालीन बेच चुका है। यह उनके ही प्रयासों का नतीजा है कि समूचे दक्षिणी एशिया में कालीन उद्योग में काम करने वाले बाल मजदूरों की अनुमानित संख्या करीब 1 मिलियन से घबटकर 2.5 लाख तक आ गई है। कालीनों के निर्यातक और आयातक कानूनी रूप से बाध्यकारी एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करते हैं जिनमें उन्हें बाल श्रम मुक्त कारखाने सहित कई मानकों के पालन करने का वादा करने के अलावा आक्समिक निरीक्षणों के लिये सहमति देनी पड़ती है। गुडवीन अपनी कमाई का 20 प्रतिशत हिस्सा इन आयातकों और निर्माताओं से मिलने वाली लाइसेंस फीस से इकट्ठा करते हैं जो ये लोग गुडवीव के शैक्षणिक कार्यक्रमों और निगरानी के कामों का समर्थन करने के लिये देते हैं।

अगर गुडवीव द्वारा किये गए आकस्मिक निरीक्षण में कोई बाल श्रमिक पाया जाता है तो तुरंत ही उस कालीन निर्माता को लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है और उस बच्चे को फौरन मौके से हटा दिया जाता है। इसके बाद उस बच्चे को उसके परिवार के हवाले करते हुए उसकी शिक्षा इत्यादि की व्यवस्था इनके स्थानीय पुनर्वास और शिक्षा भागीदारों के माध्यम से की जाती है। यह सुनिश्चित करने के लिये कि छुड़ाया गया बात श्रमिक दोबारा वहां न पहुंचने पाए और लगातार शिक्षा प्राप्त करता रहे गुडवीव प्रतिमाह उसके परिवार को कुछ भुगतान करता है जो स्कूल के रिकाॅर्ड और नियमित रूप से किये गए निरीक्षणों के बाद ही दिया जाता है।

वर्तमान में भारत में बाल श्रम और शिक्षा को लेकर कानून और भी कड़े होते जा रहे हैं जो गुडवीव के मिशन में और अधिक सहायक स्थिति का निर्माण कर रहे हैं। फिर चाहे वे 14 वर्ष से कम आयुवर्ग के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त शिक्षा की गारंटी देने वाला शिक्षा का अधिकार कानून हो या फिर 14 वर्ष कम आयु के बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाने वाले बाल श्रम अधिनियम 1986 में होने वाले संशोधन। वर्तमान कानून 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सिर्फ ऐसे उद्योगों में काम करने की अनुमति देता है जो उनके जीवन के लिये खतरनाक न हो।

वर्ष 2005 में सामाजिक उद्यमिता के लिये स्कोल पुरस्कार जीतने वाली और गुडवीव की कार्यकारी निदेशक नीना स्मिथ कहती हैं, ‘‘बाल श्रम की घटनाओं को देखना और यह देखना कि इसमें समय के साथ किस तरह से परिवर्तन आ रहा है वास्तव में काफी कठिन होता है।’’ एक बाजार-संचालित माॅडल के रूप में गुडवीव अपने प्रभाव का आंकलन बाजार और मैदान दोनों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर करता है। स्मिथ कहती हैं, ‘‘हमारा सिर्फ एक ही सिद्धांत है। जैसे-जैसे हमारी स्वीकार्यता बढ़ेगी और बाजार में हमरी हिस्सेदारी में इजाफा होगा और हम अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचेंगे वैसे-वैसे ही बालश्रम में कमी आएी और अधिक पीडि़त सामने आने में सफल रहेंगे।’’

स्मिथ आगे बताते हैं कि जैसे-जैसे कारोबारी माहौल अधिक विकसित हो रहा है उपभोक्ताओं के बीच स्थिरता को लेकर जागरुकता बढ़ती जा रही है और ऐसे में बाल श्रम से जुुड़े मुद्दों के अनुपालन को लेकर बड़े काॅर्पोरेट घरानों की चिंता भी सामने आती जा रही है। गुडवीव ने हाल ही में अपने प्रमाणीकरण के मानकों को दक्षिण एशिया के कालीन उद्योग के श्रम अधिकारों और पर्यावरण संबंधी मुद्दों को ध्यान में रखते हुए संशोधित किया है। इन नए समग्र मानकों का विकास एक बेहद जटिल समावेशी प्रक्रिया थी जिसे पूरा होने में तीन वर्षों का समय लगा। यह संशोधन गुडवीव के संस्थापकों के बाल श्रम से मुक्त विश्व के मुख्य मुद्दे को केंद्र में रखते हुए श्रमिकों के स्वास्थ्य इत्यादि संबंधी बातों का भी ख्याल रखता है।

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स्मिथ कहती हैं कि जब बाल श्रम के वैश्विक मुद्दे को संबोधित करने का समय आता है तो प्रत्येक नागरिक, सरकार, व्यावसाइयों सबको आगे आना होगा और साथ ही आने वाली पीढ़ी को इसकी शिक्षा भी देनी होगी। इसके अलवा स्मिथ कहती हैं कि उपभोक्ता बाल श्रम को रोकने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि अगर वे सोच लें कि उन्हें बाल-श्रम मुक्त उत्पादों को ही खरीदना है तो बहुत बड़ा फर्क पड़ेगा। इसके अलावा उपभोक्ताओं को व्यापार के स्तर को बदलने के लिये आगे बढ़कर सवाल पूछने की प्रवृत्ति को भी जगाना होगा। स्मिथ कहते हैं, ‘‘जब भी आप कोई उत्पाद खरीदने जाएं तो उसके बारे में सवाल पूछें। उत्पाद को खरीदते समय और अधिक सक्रियता का प्रदर्शन करें और यह समझने की कोशिश करें कि वी कहां से आया है और इसके अलावा यह भी सुनिश्चित करें कि आपको उस उत्पाद को बेचने वाले को भी उस उत्पाद के बारे में और वह कहां से और कैसे लाया गया है इसकी पूरी जानकारी हो।’’

यह एक ऐतिहासिक प्रवृत्ति है कि बाजार आधारित माॅडलों की वजह से ही बच्चों के एक व्यवस्थित शोषण की शुरुआत होती है। गुडवीव के बारे में सबसे अच्छी बात सही है कि वे बाजार में उसी सोच के साथ प्रवेश करते हैं लेकिन समस्या को हवा देने की जगह उसका समाधान तलाशने में मदद करते हैं।

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