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इंग्लैंड सरकार की नौकरी छोड़कर आदिवासियों को रोजगार के लायक बना रहे हैं अमिताभ सोनी

आदिवासियों के बेहतर भविष्य के लिए इस भारतीय ने छोड़ दी इंग्लैंड सरकार की नौकरी...

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26th Feb 2018
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दोस्तों से फंड जुटाकर अमिताभ ने फरवरी 2015 में भोपाल, मध्य प्रदेश से 25 किलोमीटर दूर एक आदिवासी गांव केकड़िया में अपना काम शुरू किया। उन्होंने उसी महीने अपना एनजीओ अभेद्य शुरू कर दिया। 

अमिताभ सोनी

अमिताभ सोनी


जहां एक तरफ बेहतर नौकरियों की खोज के लिए गांवों से शहरी इलाकों की तरफ पलायन एक बढ़ता हुआ ट्रेंड था। तो वहीं अमिताभ के लिए गांव के स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने की प्रेरणा थी।

जीवन क्या है? वही जो दूसरों के काम आए! लेकिन मौजूदा समाज में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं। दूसरों की मदद करने के लिए अपनी जिंदगी को समर्पित करना कोई आसान बात नहीं, लेकिन यह स्वाभाविक रूप से अमिताभ सोनी के लिए आसान सी लगती है। अमिताभ सोनी ने लंदन में एक दशक से अधिक समय तक समाज कल्याण विभाग के लिए काम करते हुए बिताया। वह जुलाई 2014 में भारत लौट आए और 'अभेद्य' शुरू किया।

इंटरनेशनल बिजनेस में मास्टर की डिग्री करने वाले अमिताभ कहते हैं "यूके में काम करने का विचार लोकतंत्र के बारे में सीखना था- कैसे सिस्टम काम करता है, विभाग कैसे काम करता है और कैसे सरकार और लोग अपने प्रयासों को सिंक्रनाइज करते हैं। मैं हमेशा वापस आना चाहता था और हमारे देश के लिए कुछ करना चाहता था, लेकिन क्योंकि मुझे बहुत कुछ सीखना था इसलिए मुझे वापस भारत आने में काफी समय लगा।"

दोस्तों से फंड जुटाकर अमिताभ ने फरवरी 2015 में भोपाल, मध्य प्रदेश से 25 किलोमीटर दूर एक आदिवासी गांव केकड़िया में अपना काम शुरू किया। उन्होंने उसी महीने अपना एनजीओ अभेद्य शुरू कर दिया। जिसने अपनी विंग केकड़िया और तीन अन्य आसपास के गांवों के तक फैला लीं। संगठन ने शिक्षकों और आदिवासी युवाओं के साथ मिलकर काम किया और चार क्षेत्रों - शिक्षा, रोजगार और आजीविका, जल प्रबंधन और शासन में सुधार पर ध्यान दिया।

विलेज क्वेस्ट - एक जनजातीय आईटी पहल

जहां एक तरफ बेहतर नौकरियों की खोज के लिए गांवों से शहरी इलाकों की तरफ पलायन एक बढ़ता हुआ ट्रेंड था। तो वहीं अमिताभ के लिए गांव के स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करने की प्रेरणा थी। एक साल पहले टीम अभेद्य ने 'विलेज क्वेस्ट' की शुरुआत की ये गांव के युवाओं के स्वामित्व वाली एक आईटी पहल थी। इसके संचालन की देखरेख करने वाले पांच निदेशकों की एक टीम भी थी।

इस टीम ने सेकेंड हैंड कंप्यूटरों को खरीदने के साथ-साथ फर्नीचर में थोड़ा निवेश एक साधारण कार्यालय को पेशेवर आईटी कार्यालय जैसा बना दिया। अमिताभ कहते हैं कि "ये युवा लोग खेती करने वाले समुदाय से आते हैं और वे कामकाज के आदी हैं। इसलिए कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठना उनके लिए किसी केक-वॉक की तरह था। इन लोगों के बारे में एक खास बात ये भी है कि एक बार जब आप उन्हें उद्देश्य की भावना दे देते हैं और उन्हें अंतिम लक्ष्य समझाते हैं, तो वे बहुत ही केंद्रित हो जाते हैं और लक्ष्य को पाने की दिशा में काम करना शुरू कर देते हैं।"

कंप्यूटर सेंटर

कंप्यूटर सेंटर


युवाओं में ज्यादातर स्नातक हैं। आईटी के क्षेत्र में ज्यादा जानकारी तो नहीं है लेकिन एमएस ऑफिस चला लेते हैं। अधिकांश ने केवल कॉलेज में कंप्यूटर का इस्तेमाल किया है। इन युवाओं को उन वोलेंटियर्स ने डेटा एंट्री की ट्रेनिंग दी जो खुद भोपाल के इंजीनियरिंग छात्र या स्नातक हैं। तीन दिल्ली में वेब प्रौद्योगिकियों और कोडिंग की ट्रेनिंग भी कर रहे हैं।

कोई उचित मार्केटिंग टीम के साथ न होने के चलते अभेद्य ने उन आईटी कंपनियों से संपर्क किया जो उनके दोस्तों और परिचितों की थीं। विलेज क्वेस्ट गांव में होने के कारण 16 सदस्यों की टीम ही काम कर सकी। इनका ये ऑफिस गैर-आदिवासियों के लिए भी खुला रहता है। डेटा एंट्री आईटी क्षेत्र में एक छोटा कदम था लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अब बिजली आपूर्ति थी क्योंकि बिजली कटौती अक्सर और बिना निर्धारित समय पर होती है। इस पर काबू पाने के लिए अभेद्य टीम ने क्राउड फंडिंग कैंपेन शुरू कर दिया। इस धन का प्रयोग सौर पैनलों को स्थापित करने के लिए किया गया ताकि ग्रामीण लोग अपने उद्देश्यों के लिए काम कर सकें।

अभेद्य के तहत प्रोजेक्ट्स

अभेद्य टीम गांव में स्थानीय स्कूल के साथ काम कर रही है ताकि डेस्क और बेंच, शौचालय, दोपहर के भोजन और बिजली कनेक्शन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। उन्होंने गांव के बेहतर लाभ के लिए पंचायत के माध्यम से नेविगेट करने के लिए युवाओं को प्रशिक्षित करना शुरू किया। संगठन (अभेद्य) के हस्तक्षेप के बाद से साक्षर युवाओं ने पंचायत के शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के सेक्शन में हिस्सा लिया है।

अमिताभ कहते हैं कि "अठारह बच्चों (17 लड़कियों और 1 लड़के) को अठारह परिवारों द्वारा एक निजी स्कूल में जाने के लिए स्पोन्सर किया गया है। छात्रों में से एक को भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट ऑफ यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिला है, जबकि दूसरा एक दिल्ली में श्रीजान नामक आईटी कंपनी में पेड इंटर्नशिप कर रहा है। गुरुकुल नामक संस्थान में दिल्ली में दो सॉफ्टवेयर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। ये अद्भुत जीत है उनकी जो हमारे प्रयासों का समर्थन करते हैं और हमें और अधिक करने के लिए प्रेरित करते हैं।"

गांव में आईटी लैब्स बच्चों को कंप्यूटर की बुनियादी चीजों जैसे कि टाइपिंग, एमएस सॉफ्टवेयर और एमएस पेंट पर शिक्षित करने में भी काम करती है, और लगभग 200 लोग क्लास अटेंड करते हैं। सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करने वाले गांव के साथ अभेद्य अब छोटे-छोटे चेक डैम, स्टॉप डैम, और झीलों की एक श्रृंखला बनाने की योजना बना रहा है।

यह भी पढ़ें: पुलिस की नौकरी छोड़ शुरू की खेती, सिर्फ आलू से सालाना कमाते हैं 3.5 करोड़ 

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